गुरुवार, 3 अगस्त 2017

इथियोपिया की लोक कथाएँ - 1 // 10 एक कुत्ता और एक गधा // सुषमा गुप्ता

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एक कुत्ता और एक गधा दोनों अपने मालिक की बड़ी वफादारी से सेवा किया करते थे। एक दिन वह गधा कुत्ते से बोला - "क्या बात है कुत्ते भाई, जो भी बोझा आदमी से नहीं उठता वह उसे मेरे ऊपर रख कर ले जाता है।

मैं उसे ले कर ऊपर नीचे चढ़ता उतरता हूं, मैं उसे ले कर घाटियों में से गुजरता हूं, पहाड़ पर चढ़ता हूं। पीने का पानी भी मैं ही ले जाता हूं। फिर भी मेरा मालिक मुझे पूरा खाना नहीं देता। यही नहीं, वह मेरी हंसी भी उड़ाता है कि जो यह ले जाता है वह यह खा नहीं सकता। क्या किस्मत है इसकी।"

कुत्ते ने गधे की बात ध्यान से सुनी और फिर कुछ सोच कर बोला - "तुमने मुझसे अभी जो कुछ भी कहा, यह बड़े दुख की बात है। जैसा कि तुमको मालूम है कि मैं भी दिन भर मालिक के जानवरों की भेड़ियों और शेर चीतों से देखभाल करता हूं।

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रात को भी अपनी नींद छोड़ कर मैं इधर उधर पहरेदारी करता हूं, मालिक की भी, जानवरों की भी और अनाज की भी। और जब जरूरत पड़ती है तो भौंकता भी हूं।

जब मालिक लोग खाना खाते हैं तो मैं इस उम्मीद में दरवाजे के बाहर मक्खियों से लड़ता रहता हूं कि वे मुझे अपने खाने में से कुछ बचा हुआ खाना दे देंगे, और फिर भी वे कहते हैं कि यह कुत्ता बदबू फैलाता है इसे बाहर रखो।

क्या यही मेरी इतनी सख्त मेहनत का फल है? गधे भाई, मैं बहुत परेशान हूं। यह सब मुझे यहाँ इस लिये सहना पड़ता है क्योंकि मेरा यहाँ कोई अपना रिश्तेदार नहीं है।"

इतनी बातें करने के बाद वे दोनों वहाँ से चले गये कि कहीं उनका मालिक उन दोनों की बातें न सुन ले। फिर वे कुछ दूर जा कर और बातें करते रहे। इस तरह बात करते करते वे अपने घर से बहुत दूर निकल गये।

शाम ढल गयी, रात हो गयी। अब उनको चिन्ता हुई कि वे रात कहाँ गुजारें। तभी पास में उनको एक झोंपड़ी दिखायी दी। झोंपड़ी खाली थी सो वे दोनों उसी में चले गये।

कुत्ते ने न तो सुबह नाश्ता किया था, न दोपहर का खाना खाया था और न शाम का खाना। वह भूख के मारे एक कोने में सिकुड़ कर लेट गया।

परन्तु गधे को झोंपड़ी के बाहर हरी हरी मुलायम घास मिल गयी थी सो उसने वहाँ वह घास बड़े प्रेम से खायी। पेट भरने के बाद वह जमीन पर दो चार बार लोटा तो उसका मन गाना गाने को करने लगा सो दो चार बार उसने ढेंचू ढेंचू की आवाज लगायी।

उसकी ढेंचू ढेंचू की आवाज से कुत्ते की ऑख खुल गयी तो कुत्ता बोला - "गधे भाई, तुम गाओ नहीं। यह तुम्हारा गाना हम लोगों को मुसीबत में डाल देगा।"

परन्तु गधे का तो पेट भरा था और चाँदनी रात थी इसलिये उसका तो गाना गाने का मन कर रहा था। उसने फिर ढेंचू ढेंचू की आवाज लगानी शुरू की।

कुत्ता भूखा था। उसने फिर कहा - "मैंने कहा न गधे भाई, तुम इस समय गाओ नहीं। तुम्हारे पहली बार के गाने से ही हयीना को पता चल गया होगा कि तुम कहाँ हो और अब यह दूसरी बार का गाना तो यकीनन ही उसको यहाँ ले आयेगा। अच्छा हो अगर तुम अभी अपना गाना न गाओ तो।"

लेकिन गधा तो बस अपने में मग्न था। उसको कुत्ते की सलाह बिल्कुल अच्छी नहीं लग रही थी सो उसने अपना गाना एक बार फिर गाया।

अभी गधे ने अपना गाना खत्म ही किया था कि पास की झाड़ियों से एक हयीना बाहर निकल आया और गधे को मार डाला। फिर वह झोंपड़ी के अन्दर आया जहाँ कुत्ता अभी भी सिकुड़ा पड़ा था।

हयीना ने पूछा - "तुम कौन हो?"

कुत्ता डर गया और हकला कर बोला - "मैं, मैं, मैं तो भगवान का बनाया एक छोटा सा प्राणी हूं।"

ऐसा कह कर वह उठ कर खड़ा हो गया और बोला - "आप यहाँ बैठें, मैं आपके लिये गधे के सारे हिस्से एक एक करके यहीं ला कर दे देता हूं।" हयीना राजी हो गया।

कुत्ते ने बाहर जा कर गधे का कलेजा फाड़ा और उसका दिल निकाल कर खा गया। इसके बाद उसने गधे के शरीर के दूसरे हिस्से हयीना को देने शुरू किये।

हयीना चिल्लाया - "मुझे गधे का दिल चाहिये, उसका दिल कहाँ है, मुझे उसका दिल ला कर दो।"

इस पर कुत्ता बोला - "ओह मेरे स्वामी, उसके तो दिल ही नहीं है, अगर उसके दिल होता तो आज उसकी यह हालत ही क्यों होती।" और यह कह कर वह बाहर निकल गया।

बेवकूफ का साथ ज़िन्दगी तक ले सकता है जैसा कि गधे के साथ से कुत्ते का होने वाला था, पर अक्लमन्दी से कठिन से कठिन परेशानी को हल किया जा सकता है जैसा कि कुत्ते ने किया।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं.

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सुषमा गुप्ता का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में सन् 1943 में हुआ था। इन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र में ऐम ए किया और फिर मेरठ विश्वविद्यालय से बी ऐड किया। 1976 में ये नाइजीरिया चली गयीं। वहां इन्होंने यूनिवर्सिटी औफ़ इबादान से लाइब्रेरी साइन्स में ऐम ऐल ऐस किया और एक थियोलोजीकल कौलिज में 10 वर्षों तक लाइब्रेरियन का कार्य किया।

वहां से फिर ये इथियोपिया चली गयीं और वहां एडिस अबाबा यूनिवर्सिटी के इन्स्टीट्यूट औफ़ इथियोपियन स्टडीज़ की लाइब्रेरी में 3 साल कार्य किया। तत्पश्चात इनको दक्षिणी अफ्रीका के एक देश़ लिसोठो के विश्वविद्यालय में इन्स्टीट्यूट औफ़ सदर्न अफ्रीकन स्टडीज़ में 1 साल कार्य करने का अवसर मिला। वहॉ से 1993 में ये यू ऐस ए आगयीं जहॉ इन्होंने फिर से मास्टर औफ़ लाइब्रेरी ऐंड इनफौर्मेशन साइन्स किया। फिर 4 साल ओटोमोटिव इन्डस्ट्री एक्शन ग्रुप के पुस्तकालय में कार्य किया।

1998 में इन्होंने सेवा निवृत्ति ले ली और अपनी एक वेब साइट बनायी- www.sushmajee.com <http://www.sushmajee.com>। तब से ये उसी वेब साइट पर काम कर रहीं हैं। उस वेब साइट में हिन्दू धर्म के साथ साथ बच्चों के लिये भी काफी सामग्री है।

भिन्न भिन्न देशों में रहने से इनको अपने कार्यकाल में वहॉ की बहुत सारी लोक कथाओं को जानने का अवसर मिला- कुछ पढ़ने से, कुछ लोगों से सुनने से और कुछ ऐसे साधनों से जो केवल इन्हीं को उपलब्ध थे। उन सबको देखकर इनको ऐसा लगा कि ये लोक कथाएँ हिन्दी जानने वाले बच्चों और हिन्दी में रिसर्च करने वालों को तो कभी उपलब्ध ही नहीं हो पायेंगी- हिन्दी की तो बात ही अलग है अंग्रेजी में भी नहीं मिल पायेंगीं.

इसलिये इन्होंने न्यूनतम हिन्दी पढ़ने वालों को ध्यान में रखते हुए उन लोक कथाओं को हिन्दी में लिखना पा्ररम्भ किया। इन लोक कथाओं में अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिका के देशों की लोक कथाओं पर अधिक ध्यान दिया गया है पर उत्तरी अमेरिका और यूरोप के देशों की भी कुछ लोक कथाएँ सम्मिलित कर ली गयी हैं।

अभी तक 1200 से अधिक लोक कथाएँ हिन्दी में लिखी जा चुकी है। इनको "देश विदेश की लोक कथाएँ" क्रम में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि इस प्रकाशन के माध्यम से हम इन लोक कथाओं को जन जन तक पहुंचा सकेंगे.

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