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इथियोपिया की लोक कथाएँ - 1 // 11 सीधा कुत्ता और चालाक लोमड़ा // सुषमा गुप्ता

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एक बार एक कुत्ता और एक लोमड़ा शिकार करने के लिये निकले। कुत्ता तो सीधा था पर लोमड़ा बहुत चालाक था। रास्ते में बारिश शुरू हो गयी तो दोनों भीगने से बचने के लिये एक गुफा में घुस गये।
वह गुफा इत्तफाक से एक शेर की थी और इन दोनों के पीछे पीछे वह शेर भी बारिश से बचने के लिये अपनी गुफा में आ पहुंचा।
शेर को देख कर कुत्ते की तो सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी। वह डर के मारे काँपने लगा और उसके मुंह से घुटी घुटी सी आवाजें निकलने लगीं।
पर लोमड़ा बहुत चालाक था। उसने तुरन्त ही कुछ सोचा और कुत्ते को ज़ोर से पुकारा और बोला - "ए कुत्ते, यह अपना भौंकना बन्द करो और जा कर बाहर से उस बकरे के माँस का एक टुकड़ा ले कर आओ जो हमने पास में ही छोड़ा था।"

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कुत्ता सीधा तो जरूर था पर थोड़ा समझदार भी था। वह तुरन्त समझ गया कि उसे क्या करना है। उसने तुरन्त ही लोमड़े की बात मानी और गुफा के बाहर की तरफ भाग लिया।
इधर शेर कुछ सन्तुष्ट सा दिखायी दे रहा था क्योंकि उसे इस बारिश में भी घर बैठे खाना मिल रहा था। जब कुछ देर के बाद भी कुत्ता वापस नहीं आया तो लोमड़ा कुछ परेशान सा दिखायी।
शेर ने पूछा - "लोमड़े भाई, क्या बात है, परेशान क्यों हो?"
लोमड़ा बोला - "यह हमारा कुत्ता जो है न, बस बहुत ही डरपोक और आलसी किस्म का है। मुझे बहुत ज़ोर की भूख लगी है और एक यह कुत्ता है जो अभी तक उस बकरे का माँस ले कर ही नहीं आया। मैं सोचता हूं कि मैं खुद ही जा कर वह माँस ले कर आता हूं ताकि हम दोनों पेट भर कर खाना तो खा सकें।"
शेर बोला - "हाँ भाई, भूख तो मुझे भी लगी है। अगर तुम्हारा कुत्ता ऐसा है तो ठीक है लोमड़े भाई तुम्हीं जाओ और जल्दी से माँस ले कर लौटो। मैं तब तक तुम्हारा यहीं इन्तजार करता हूं।"
"जो हुकुम" कह कर लोमड़ा भी गुफा से जल्दी जल्दी भाग गया और वह तो फिर यह जा और वह जा।
इस तरह लोमड़े ने शेर से अपनी और कुत्ते दोनों की जान बचायी। उधर शेर अभी भी अपनी गुफा में लोमड़े और कुत्ते दोनों का माँस लाने का इन्तजार कर रहा है।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं.

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सुषमा गुप्ता का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में सन् 1943 में हुआ था। इन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र में ऐम ए किया और फिर मेरठ विश्वविद्यालय से बी ऐड किया। 1976 में ये नाइजीरिया चली गयीं। वहां इन्होंने यूनिवर्सिटी औफ़ इबादान से लाइब्रेरी साइन्स में ऐम ऐल ऐस किया और एक थियोलोजीकल कौलिज में 10 वर्षों तक लाइब्रेरियन का कार्य किया।

वहां से फिर ये इथियोपिया चली गयीं और वहां एडिस अबाबा यूनिवर्सिटी के इन्स्टीट्यूट औफ़ इथियोपियन स्टडीज़ की लाइब्रेरी में 3 साल कार्य किया। तत्पश्चात इनको दक्षिणी अफ्रीका के एक देश़ लिसोठो के विश्वविद्यालय में इन्स्टीट्यूट औफ़ सदर्न अफ्रीकन स्टडीज़ में 1 साल कार्य करने का अवसर मिला। वहॉ से 1993 में ये यू ऐस ए आगयीं जहॉ इन्होंने फिर से मास्टर औफ़ लाइब्रेरी ऐंड इनफौर्मेशन साइन्स किया। फिर 4 साल ओटोमोटिव इन्डस्ट्री एक्शन ग्रुप के पुस्तकालय में कार्य किया।

1998 में इन्होंने सेवा निवृत्ति ले ली और अपनी एक वेब साइट बनायी- www.sushmajee.com <http://www.sushmajee.com>। तब से ये उसी वेब साइट पर काम कर रहीं हैं। उस वेब साइट में हिन्दू धर्म के साथ साथ बच्चों के लिये भी काफी सामग्री है।

भिन्न भिन्न देशों में रहने से इनको अपने कार्यकाल में वहॉ की बहुत सारी लोक कथाओं को जानने का अवसर मिला- कुछ पढ़ने से, कुछ लोगों से सुनने से और कुछ ऐसे साधनों से जो केवल इन्हीं को उपलब्ध थे। उन सबको देखकर इनको ऐसा लगा कि ये लोक कथाएँ हिन्दी जानने वाले बच्चों और हिन्दी में रिसर्च करने वालों को तो कभी उपलब्ध ही नहीं हो पायेंगी- हिन्दी की तो बात ही अलग है अंग्रेजी में भी नहीं मिल पायेंगीं.

इसलिये इन्होंने न्यूनतम हिन्दी पढ़ने वालों को ध्यान में रखते हुए उन लोक कथाओं को हिन्दी में लिखना पा्ररम्भ किया। इन लोक कथाओं में अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिका के देशों की लोक कथाओं पर अधिक ध्यान दिया गया है पर उत्तरी अमेरिका और यूरोप के देशों की भी कुछ लोक कथाएँ सम्मिलित कर ली गयी हैं।

अभी तक 1200 से अधिक लोक कथाएँ हिन्दी में लिखी जा चुकी है। इनको "देश विदेश की लोक कथाएँ" क्रम में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि इस प्रकाशन के माध्यम से हम इन लोक कथाओं को जन जन तक पहुंचा सकेंगे.

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