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इथियोपिया की लोक कथाएँ - 1 // 13 अक्लमन्द भेड़िया // सुषमा गुप्ता


एक समय की बात है कि इथियोपिया के एक जंगल में एक शेर रहता था। समय गुजरता गया तो वह शेर बूढ़ा होता गया और साथ में कमजोर भी होता गया।

अब उसको शिकार करने में कठिनाई होने लगी। धीरे धीरे उसकी यह कठिनाई इतनी बढ़ी कि अब उसको खाना खाये बिना कई कई दिन गुजर जाते।

इस भूख से बचने के लिये एक दिन उसके दिमाग में एक तरकीब आयी जिससे उसको घर बैठे खाना मिल सकता था। उसने चारों तरफ यह अफवाह उड़ा दी कि शेर बहुत बीमार है और वह अपने बिस्तर से उठ भी नहीं सकता।

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यह खबर तो बहुत बड़ी खबर थी। अब क्या था जंगल के सभी जानवर निडर हो कर शेर को देखने के लिये आने लगे। इधर जो कोई भी जानवर शेर को देखने जाता, शेर मौका देख कर उसको मार कर खा जाता।

एक सुबह एक भेड़िया भी बीमार शेर को देखने के लिए गया। पर वह गुफा के अन्दर नहीं गया। उसने शेर जी को भी बाहर से ही सलाम करके उनकी कुशल पूछी।

शेर बीमार की सी आवाज में बोला "अरे कौन है भाई? क्या तुम भेड़िये हो? आओ भाई अन्दर आ जाओ। मेरी तबियत तो बहुत दिनों से खराब चल रही है।"

भेड़िये ने कहा - "नहीं शेर जी, मैं अन्दर नहीं आ पाऊंगा। आप मुझे वहीं से अपना हाल बता दें।"

शेर ने कई बार उससे पूछा भी कि वह अन्दर क्यों नहीं आ पायेगा और कई बार उसे प्रेम से अन्दर बुलाने की कोशिश भी की परन्तु भेड़िया अन्दर नहीं गया।

उसको शेर की नीयत पर शक हो चुका था इसलिए वह शेर के कई बार बुलाने पर भी गुफा के अन्दर नहीं गया और इस तरह उसने अपनी जान बचायी।

क्या तुमको मालूम है कि भेड़िये ने अपनी जान कैसे बचायी?

भेड़िये ने देखा कि शेर की गुफा में जानवरों के जाते हुए पैरों के निशान तो थे पर बाहर आते पैरों के किसी के निशान नहीं थे। बस वह समझ गया कि जो भी जानवर अन्दर गया वह बाहर नहीं आया।

इसलिये अगर वह भी गुफा के अन्दर गया तो वह भी बाहर नहीं आ पायेगा। इसलिए वह अन्दर गया ही नहीं और इस तरह उसने अपनी जान बचायी।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं.

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सुषमा गुप्ता का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में सन् 1943 में हुआ था। इन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र में ऐम ए किया और फिर मेरठ विश्वविद्यालय से बी ऐड किया। 1976 में ये नाइजीरिया चली गयीं। वहां इन्होंने यूनिवर्सिटी औफ़ इबादान से लाइब्रेरी साइन्स में ऐम ऐल ऐस किया और एक थियोलोजीकल कौलिज में 10 वर्षों तक लाइब्रेरियन का कार्य किया।

वहां से फिर ये इथियोपिया चली गयीं और वहां एडिस अबाबा यूनिवर्सिटी के इन्स्टीट्यूट औफ़ इथियोपियन स्टडीज़ की लाइब्रेरी में 3 साल कार्य किया। तत्पश्चात इनको दक्षिणी अफ्रीका के एक देश़ लिसोठो के विश्वविद्यालय में इन्स्टीट्यूट औफ़ सदर्न अफ्रीकन स्टडीज़ में 1 साल कार्य करने का अवसर मिला। वहॉ से 1993 में ये यू ऐस ए आगयीं जहॉ इन्होंने फिर से मास्टर औफ़ लाइब्रेरी ऐंड इनफौर्मेशन साइन्स किया। फिर 4 साल ओटोमोटिव इन्डस्ट्री एक्शन ग्रुप के पुस्तकालय में कार्य किया।

1998 में इन्होंने सेवा निवृत्ति ले ली और अपनी एक वेब साइट बनायी- www.sushmajee.com <http://www.sushmajee.com>। तब से ये उसी वेब साइट पर काम कर रहीं हैं। उस वेब साइट में हिन्दू धर्म के साथ साथ बच्चों के लिये भी काफी सामग्री है।

भिन्न भिन्न देशों में रहने से इनको अपने कार्यकाल में वहॉ की बहुत सारी लोक कथाओं को जानने का अवसर मिला- कुछ पढ़ने से, कुछ लोगों से सुनने से और कुछ ऐसे साधनों से जो केवल इन्हीं को उपलब्ध थे। उन सबको देखकर इनको ऐसा लगा कि ये लोक कथाएँ हिन्दी जानने वाले बच्चों और हिन्दी में रिसर्च करने वालों को तो कभी उपलब्ध ही नहीं हो पायेंगी- हिन्दी की तो बात ही अलग है अंग्रेजी में भी नहीं मिल पायेंगीं.

इसलिये इन्होंने न्यूनतम हिन्दी पढ़ने वालों को ध्यान में रखते हुए उन लोक कथाओं को हिन्दी में लिखना पा्ररम्भ किया। इन लोक कथाओं में अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिका के देशों की लोक कथाओं पर अधिक ध्यान दिया गया है पर उत्तरी अमेरिका और यूरोप के देशों की भी कुछ लोक कथाएँ सम्मिलित कर ली गयी हैं।

अभी तक 1200 से अधिक लोक कथाएँ हिन्दी में लिखी जा चुकी है। इनको "देश विदेश की लोक कथाएँ" क्रम में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि इस प्रकाशन के माध्यम से हम इन लोक कथाओं को जन जन तक पहुंचा सकेंगे.

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