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इथियोपिया की लोक कथाएँ - 1 // 14 मगर और बन्दर // सुषमा गुप्ता

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एक बार अवाश नदी के किनारे एक छोटा मगर और एक छोटा बन्दर रहा करते थे। बन्दर तो सचमुच ही बहुत छोटा था परन्तु मगर अपनी उमर में छोटा होते हुए भी अपने आकार में बहुत बड़ा था।

ये दोनों आपस में बड़े गहरे दोस्त थे। बन्दर तो नदी के किनारे वाले बड़े पेड़ पर रहता था और मगर नदी में रहता था। कभी कभी धूप खाने के लिये वह नदी के किनारे पर आ जाया करता था।

ये लोग आपस में बहुत कुछ करते रहते थे। कभी अगर मगर खेलना चाहता तो वह बन्दर को किनारे पर से ही आवाज लगाता - "आओ बन्दर भाई, पानी में खेलेंगें।" और दोनों पानी में बहुत देर तक खेलते रहते।

और कभी अगर बन्दर का सवारी करने का मन करता तो मगर उसको अपनी पीठ पर बिठा कर पानी में दूर दूर की सैर करा लाता। बन्दर अक्सर अपने पेड़ से तोड़ कर मगर को मीठे मीठे फल खिलाया करता।

एक दिन राजा मगर बीमार पड़ा तो डाक्टर मगर उसको देखने आया। उसने देख कर राजा मगर से कहा कि उसकी बीमारी की दवा केवल बन्दर का कलेजा है। अगर बन्दर का कलेजा कहीं से मिल जाये तो वह बहुत जल्दी ठीक हो सकता था।

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राजा मगर जानता था कि एक बन्दर उसके राज्य के एक मगर का बहुत अच्छा दोस्त था सो उसने उस मगर को बुलवाया।

उसने मगर से कहा - "मुझे एक बन्दर के कलेजे की जरूरत है। हमारे राज्य में तुम ही एक ऐसे मगर हो जो मुझे बन्दर का कलेजा ला कर दे सकते हो।"

मगर समझ गया कि राजा मगर उसके दोस्त बन्दर के बारे में बात कर रहा था। वह राजा की आज्ञा को टाल तो नहीं सकता था पर वह मन ही मन अपने दोस्त के लिये बहुत दुखी था।

वह अपने दोस्त को किसी भी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाना चाहता था पर वह राजा की आज्ञा मानने के लिये भी मजबूर था। सो वह दुखी मन से बन्दर से मिलने चल दिया।

किनारे पर जा कर उसने आवाज लगायी - "आओ बन्दर भाई, मेरी पीठ पर बैठ जाओ, आज मैं तुमको नदी के सबसे ज़्यादा गहरे हिस्से की सैर करा कर लाता हूं।"

बन्दर खुशी खुशी पेड़ से कूदा और मगर की पीठ पर बैठ गया। यह बन्दर के लिये कोई नयी बात नहीं थी क्योंकि वह अक्सर ही मगर की पीठ पर बैठ कर नदी की सैर के लिये जाता था इसलिये बन्दर को कोई शक ही नहीं हुआ कि मगर उसका कलेजा चाहता था इसलिये वह उसको आज सैर कराने ले जा रहा था।

तैरते तैरते मगर बन्दर को नदी के बीच में ले गया। वहाँ जा कर मगर ने बन्दर से कहा - "बन्दर भाई, मुझे माफ कर दो, मुझे बहुत दुख है पर मैं मजबूर हूं। हमारे राजा मगर को एक बन्दर के कलेजे की जरूरत है।

वह बहुत बीमार है और वह केवल बन्दर के कलेजे से ही ठीक हो सकता है इसलिए मुझे तुम्हारे कलेजे की जरूरत है।"

बन्दर को यह सुन कर बड़ा आश्चर्य हुआ। वह डर भी गया कि अब वह मगर से अपनी जान कैसे बचाये। उसके दिमाग ने तेज़ी से काम करना शुरू कर दिया।

कुछ पल बाद वह मगर से बोला - "मेरे दोस्त, तुमने मुझे पहले नहीं बताया वरना मैं अपना कलेजा अपने साथ ले कर आता। तुमको शायद हम लोगों के बारे में पता नहीं है।

बन्दर लोग अपना कलेजा अपने साथ ले कर नहीं घूमते हैं। वे जब बाहर जाते हैं तो अपना कलेजा अपने घर पर ही रख कर जाते हैं। खैर, कोई बात नहीं। तुम मेरे घर वापस चलो, मैं वहाँ पहुंच कर तुमको अपना कलेजा तुरन्त ही दे दूंगा।"

मगर को बन्दर पर पूरा भरोसा था सो वह बन्दर को ले कर वापस किनारे पर आया। किनारे पर आते ही बन्दर मगर की पीठ से कूद कर पेड़ पर चढ़ गया और चिल्ला कर बोला - "मगर भाई, तुमने मेरे साथ चालाकी खेली, मैंने तुम्हारे साथ चालाकी खेली, हिसाब बराबर। अब नमस्कार।"

मगर भी तुरन्त ही तैर कर दूर चला गया। वह बन्दर की होशियारी पर बहुत खुश था क्योंकि इस तरह वह अपने दोस्त को मारने के पाप से बच गया था।

इसके बाद दोनों को कभी किसी ने एक साथ नहीं देखा पर मगर को किनारे पर आ कर अक्सर बन्दर को बहुत देर तक देखते पाया गया।

यह कहानी भारत की पंचतन्त्र की कहानियों में पायी जाती है। यह तो पता नहीं कौन सी कहानी पहले लिखी गयी और कौन सी बाद में।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं.

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सुषमा गुप्ता का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में सन् 1943 में हुआ था। इन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र में ऐम ए किया और फिर मेरठ विश्वविद्यालय से बी ऐड किया। 1976 में ये नाइजीरिया चली गयीं। वहां इन्होंने यूनिवर्सिटी औफ़ इबादान से लाइब्रेरी साइन्स में ऐम ऐल ऐस किया और एक थियोलोजीकल कौलिज में 10 वर्षों तक लाइब्रेरियन का कार्य किया।

वहां से फिर ये इथियोपिया चली गयीं और वहां एडिस अबाबा यूनिवर्सिटी के इन्स्टीट्यूट औफ़ इथियोपियन स्टडीज़ की लाइब्रेरी में 3 साल कार्य किया। तत्पश्चात इनको दक्षिणी अफ्रीका के एक देश़ लिसोठो के विश्वविद्यालय में इन्स्टीट्यूट औफ़ सदर्न अफ्रीकन स्टडीज़ में 1 साल कार्य करने का अवसर मिला। वहॉ से 1993 में ये यू ऐस ए आगयीं जहॉ इन्होंने फिर से मास्टर औफ़ लाइब्रेरी ऐंड इनफौर्मेशन साइन्स किया। फिर 4 साल ओटोमोटिव इन्डस्ट्री एक्शन ग्रुप के पुस्तकालय में कार्य किया।

1998 में इन्होंने सेवा निवृत्ति ले ली और अपनी एक वेब साइट बनायी- www.sushmajee.com <http://www.sushmajee.com>। तब से ये उसी वेब साइट पर काम कर रहीं हैं। उस वेब साइट में हिन्दू धर्म के साथ साथ बच्चों के लिये भी काफी सामग्री है।

भिन्न भिन्न देशों में रहने से इनको अपने कार्यकाल में वहॉ की बहुत सारी लोक कथाओं को जानने का अवसर मिला- कुछ पढ़ने से, कुछ लोगों से सुनने से और कुछ ऐसे साधनों से जो केवल इन्हीं को उपलब्ध थे। उन सबको देखकर इनको ऐसा लगा कि ये लोक कथाएँ हिन्दी जानने वाले बच्चों और हिन्दी में रिसर्च करने वालों को तो कभी उपलब्ध ही नहीं हो पायेंगी- हिन्दी की तो बात ही अलग है अंग्रेजी में भी नहीं मिल पायेंगीं.

इसलिये इन्होंने न्यूनतम हिन्दी पढ़ने वालों को ध्यान में रखते हुए उन लोक कथाओं को हिन्दी में लिखना पा्ररम्भ किया। इन लोक कथाओं में अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिका के देशों की लोक कथाओं पर अधिक ध्यान दिया गया है पर उत्तरी अमेरिका और यूरोप के देशों की भी कुछ लोक कथाएँ सम्मिलित कर ली गयी हैं।

अभी तक 1200 से अधिक लोक कथाएँ हिन्दी में लिखी जा चुकी है। इनको "देश विदेश की लोक कथाएँ" क्रम में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि इस प्रकाशन के माध्यम से हम इन लोक कथाओं को जन जन तक पहुंचा सकेंगे.

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