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इथियोपिया की लोक कथाएँ - 1 // 15 गधे की पूंछ // सुषमा गुप्ता

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एक बार की बात है कि इथियोपिया के एक शहर में एक बहुत ही अमीर व्यापारी रहता था। वह बहुत अमीर था परन्तु बहुत ही भला था। जो भी उसके घर आता वह उसकी अच्छी तरह से खातिरदारी करता था और अपने शहर वालों की भी हमेशा मदद करने को तैयार रहता था।

उस व्यापारी के पास बहुत सारा सोना था और यह बात सभी जानते थे। एक दिन एक आदमी ने देखा कि वह व्यापारी अपने खच्चर पर सवार हो कर कहीं बाहर जा रहा था।

अच्छा मौका देख कर वह आदमी उस व्यापारी के घर में घुस गया और उसकी चारपायी के नीचे रखे बक्से में से उसका सारा सोना निकाल कर तुरन्त ही वहाँ से भाग गया। बक्सा वह वहीं छोड़ गया।

कुछ समय बाद जब वह व्यापारी अपने घर आया तो उसको अपने घर का टूटा हुआ दरवाजा देख कर कुछ शक हुआ। वह जल्दी जल्दी अपने घर में घुसा। वहाँ चारों तरफ देखने के बाद उसे पता चला कि कोई चोर उसका सारा सोना चुरा कर भाग गया है।

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वह जज के पास गया और बोला - "जज साहब। किसी ने मेरा सोना चुरा लिया है और मुझे शक है कि हमारे ही शहर के किसी आदमी ने उसे चुराया है।"

जज बोला - "अगर ऐसा है तो तुम बिल्कुल भी चिन्ता न करो मैं उस चोर का पता तुरन्त ही लगा लूंगा। तुम बस ऐसा करो कि मुझे एक गधा दे जाओ।"

व्यापारी तुरन्त ही एक गधा ले आया और ला कर उसने उसे जज साहब को दे दिया। जज ने उस गधे की पूंछ में खूब सारी खुशबू लगायी और उसको एक खेमे के अन्दर बाँध दिया।

फिर उसने शहर के सारे आदमियों को बुला कर कहा - "किसी ने इस व्यापारी का सोना चुरा लिया है और मुझे शक है कि यह काम तुम लोगों में से ही किसी एक का है।

मेरे पास एक गधा है जो चोर का पता लगायेगा। इस खेमे में एक गधा बंधा है। हर आदमी खेमे में जा कर उस गधे की पूंछ छुएगा। जब भी कोई भला आदमी उसकी पूंछ छुएगा तो वह चुप रहेगा लेकिन जब चोर गधे की पूंछ छुएगा तो गधा बहुत ज़ोर से ढेंचू ढेंचू करेगा।"

एक एक कर के हर आदमी उस खेमे में जाने लगा और गधे की पूंछ छू छू कर बाहर आने लगा। जब भी कोई उस गधे की पूंछ छूता तो गधा चुपचाप रहता पर जब चोर अन्दर गया तो उसने इस डर से कि उसके पूंछ छूने से गधा चिल्ला पड़ेगा गधे की पूंछ छुई ही नहीं।

जब सब लोगों ने अपना काम खत्म कर लिया तो जज ने सबके हाथ देखे। केवल एक ही आदमी के हाथ से खुशबू नहीं आ रही थी बाकी सबके हाथ से खुशबू आ रही थी।

जज ने उस आदमी को पकड़ लिया और कहा कि तुम ही चोर हो।

उस आदमी को बड़ा आश्चर्य हुआ तो उसने जज से पूछा "आपने कैसे जाना कि चोर मैं ही हूं? मैं तो चोर नहीं हूं क्योंकि मेरे छूने पर तो गधा चिल्लाया ही नहीं। बाकी सब लोगों के छूने पर भी वह नहीं चिल्लाया था तो बाकी लोग चोर क्यों नहीं हैं?"

जज बोला - "पर तुमने तो उसकी पूंछ छुई ही नहीं। अगर तुम उसकी पूंछ छूते तब तो वह चिल्लाता जैसे बाकी लोगों के छूने पर वह नहीं चिल्लाया।"

चोर ने पूछा - "आपको कैसे पता कि मैंने गधे की पूंछ छुई ही नहीं।"

जज बोला - "मैं तुम्हारे जितना बेवकूफ नहीं हूं। मैंने इस गधे की पूंछ में खुशबू लगा दी थी इसलिए अगर तुमने गधे की पूंछ छुई होती तो तुम्हारे हाथ में खुशबू आ जाती पर तुम्हारे हाथों में तो कोई खुशबू ही नहीं है।

बाकी सभी लोगों ने गधे की पूंछ छुई थी इसलिये उनके हाथों में खुशबू है, तुमने गधे की पूंछ छुई नर्हीं इसलिये तुम्हारे हाथों में खुशबू ही नहीं है।"

चोर समझ गया कि आज वह पकड़ा गया। उसने अपनी चोरी मान ली और उस व्यापारी का सारा सोना वापस कर दिया।

सो यह थी जज की अक्लमन्दी की कहानी चोर को पहचानने की। ऐसी ही चोर को पहचानने की कुछ कहानियाँ भारत में बीरबल की कहानियों में भी पायी जाती हैं।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं.

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सुषमा गुप्ता का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में सन् 1943 में हुआ था। इन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र में ऐम ए किया और फिर मेरठ विश्वविद्यालय से बी ऐड किया। 1976 में ये नाइजीरिया चली गयीं। वहां इन्होंने यूनिवर्सिटी औफ़ इबादान से लाइब्रेरी साइन्स में ऐम ऐल ऐस किया और एक थियोलोजीकल कौलिज में 10 वर्षों तक लाइब्रेरियन का कार्य किया।

वहां से फिर ये इथियोपिया चली गयीं और वहां एडिस अबाबा यूनिवर्सिटी के इन्स्टीट्यूट औफ़ इथियोपियन स्टडीज़ की लाइब्रेरी में 3 साल कार्य किया। तत्पश्चात इनको दक्षिणी अफ्रीका के एक देश़ लिसोठो के विश्वविद्यालय में इन्स्टीट्यूट औफ़ सदर्न अफ्रीकन स्टडीज़ में 1 साल कार्य करने का अवसर मिला। वहॉ से 1993 में ये यू ऐस ए आगयीं जहॉ इन्होंने फिर से मास्टर औफ़ लाइब्रेरी ऐंड इनफौर्मेशन साइन्स किया। फिर 4 साल ओटोमोटिव इन्डस्ट्री एक्शन ग्रुप के पुस्तकालय में कार्य किया।

1998 में इन्होंने सेवा निवृत्ति ले ली और अपनी एक वेब साइट बनायी- www.sushmajee.com <http://www.sushmajee.com>। तब से ये उसी वेब साइट पर काम कर रहीं हैं। उस वेब साइट में हिन्दू धर्म के साथ साथ बच्चों के लिये भी काफी सामग्री है।

भिन्न भिन्न देशों में रहने से इनको अपने कार्यकाल में वहॉ की बहुत सारी लोक कथाओं को जानने का अवसर मिला- कुछ पढ़ने से, कुछ लोगों से सुनने से और कुछ ऐसे साधनों से जो केवल इन्हीं को उपलब्ध थे। उन सबको देखकर इनको ऐसा लगा कि ये लोक कथाएँ हिन्दी जानने वाले बच्चों और हिन्दी में रिसर्च करने वालों को तो कभी उपलब्ध ही नहीं हो पायेंगी- हिन्दी की तो बात ही अलग है अंग्रेजी में भी नहीं मिल पायेंगीं.

इसलिये इन्होंने न्यूनतम हिन्दी पढ़ने वालों को ध्यान में रखते हुए उन लोक कथाओं को हिन्दी में लिखना पा्ररम्भ किया। इन लोक कथाओं में अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिका के देशों की लोक कथाओं पर अधिक ध्यान दिया गया है पर उत्तरी अमेरिका और यूरोप के देशों की भी कुछ लोक कथाएँ सम्मिलित कर ली गयी हैं।

अभी तक 1200 से अधिक लोक कथाएँ हिन्दी में लिखी जा चुकी है। इनको "देश विदेश की लोक कथाएँ" क्रम में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि इस प्रकाशन के माध्यम से हम इन लोक कथाओं को जन जन तक पहुंचा सकेंगे.

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