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इथियोपिया की लोक कथाएँ - 1 // 16 चतुर पिता // सुषमा गुप्ता


इथियोपिया के अक्सुम राज्य में एक बूढ़ा रहता था जिसका बहुत बड़ा परिवार था। उसके सात बेटे थे और सातों हमेशा लड़ते झगड़ते रहते थे।

हर बेटा यह चाहता था कि पिता का सारा पैसा उसी को मिले। बूढ़ा यह सब देख कर बहुत दुखी रहता था पर कर कुछ भी नहीं पा रहा था।

एक दिन वह बूढ़ा बीमार पड़ गया। उसको लगा कि वह जल्दी ही मर जायेगा सो उसने अपने सातों बेटों को बुला भेजा। उसके सभी बेटे तुरन्त ही उसके पास आ पहुंचे क्योंकि उनमें से हर एक को यह जानने की इच्छा थी कि उसको उनके पिता से क्या मिलेगा।

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लेकिन उस बूढ़े ने उनको कुछ नहीं दिया बल्कि उन सबको जंगल भेज दिया और दो दो डंडियाँ लाने को कहा।

उसके सब बेटे तुरन्त ही जंगल गये और दो दो डंडियाँ ले कर पिता के पास लौट आये। पिता ने उन सबको एक लाइन में खड़ा किया, सबसे बड़ा सबसे पहले और सबसे छोटा सबसे बाद में।

अब बूढ़े ने अपने सबसे बड़े बेटे से कहा - "एक डंडी अपने घुटनों पर रखो और उसे तोड़ने की कोशिश करो।"

बेटे ने ऐसा ही किया और उसकी डंडी एक झटके में ही टूट गयी। ऐसा उसने अपने सातों बेटों से करने के लिये कहा और सातों ने अपनी अपनी डंडियाँ एक झटके में ही तोड़ डालीं।

इसके बाद फिर उसने अपने सबसे बड़े बेटे से कहा "अब इन बची हुई सातों डंडियों का एक गठ्ठर बना लो।"

बड़े बेटे ने ऐसा ही किया। उसने अपने सब भाइयों से उनकी डंडियाँ ले लीं और उनको बाँध कर उनका एक गठ्ठर बना लिया।

बूढ़ा बोला - "अब इस गठ्ठर को अपने घुटनों पर रखो और तोड़ने की कोशिश करो।"

बड़े बेटे ने काफी देर तक उस गठ्ठर को तोड़ने की कोशिश की पर वह उस गठ्ठर को तोड़ नहीं सका। बूढ़े ने एक एक करके वह गठ्ठर अपने सभी बेटों को दिया परन्तु अपनी लाख कोशिशों के बावजूद उनमें से कोई भी उस गठ्ठर को न तोड़ सका।

इस पर वह बूढ़ा बोला - "मैं अपना सारा पैसा तुम सबको देता हूं। अगर तुम लोग इकठ्ठे रहोगे तो मजबूत रहोगे और कोई भी तुमको जीत नहीं सकेगा।

पर अगर तुम लोग अलग हो गये और तुमने बंटवारा कर लिया तो तुम्हारे दुश्मन तुम्हें हरा देंगे और तुम लोगों को परेशान करेंगे। सो मेरे बच्चों हमेशा एक साथ रहना। भगवान तुम्हारी रक्षा करे।" यह कह कर बूढ़ा मर गया।

पिता की बात सुन कर अब उन सातों भाइयों ने लड़ना झगड़ना छोड़ दिया था और सब मिल कर उसके पैसे को इस्तेमाल करने में लग गये। कुछ ही दिनों में वे अक्सुम शहर के जाने माने अमीर आदमियों में गिने जाने लगे।

यह है एकता का असर।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं.

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सुषमा गुप्ता का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में सन् 1943 में हुआ था। इन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र में ऐम ए किया और फिर मेरठ विश्वविद्यालय से बी ऐड किया। 1976 में ये नाइजीरिया चली गयीं। वहां इन्होंने यूनिवर्सिटी औफ़ इबादान से लाइब्रेरी साइन्स में ऐम ऐल ऐस किया और एक थियोलोजीकल कौलिज में 10 वर्षों तक लाइब्रेरियन का कार्य किया।

वहां से फिर ये इथियोपिया चली गयीं और वहां एडिस अबाबा यूनिवर्सिटी के इन्स्टीट्यूट औफ़ इथियोपियन स्टडीज़ की लाइब्रेरी में 3 साल कार्य किया। तत्पश्चात इनको दक्षिणी अफ्रीका के एक देश़ लिसोठो के विश्वविद्यालय में इन्स्टीट्यूट औफ़ सदर्न अफ्रीकन स्टडीज़ में 1 साल कार्य करने का अवसर मिला। वहॉ से 1993 में ये यू ऐस ए आगयीं जहॉ इन्होंने फिर से मास्टर औफ़ लाइब्रेरी ऐंड इनफौर्मेशन साइन्स किया। फिर 4 साल ओटोमोटिव इन्डस्ट्री एक्शन ग्रुप के पुस्तकालय में कार्य किया।

1998 में इन्होंने सेवा निवृत्ति ले ली और अपनी एक वेब साइट बनायी- www.sushmajee.com <http://www.sushmajee.com>। तब से ये उसी वेब साइट पर काम कर रहीं हैं। उस वेब साइट में हिन्दू धर्म के साथ साथ बच्चों के लिये भी काफी सामग्री है।

भिन्न भिन्न देशों में रहने से इनको अपने कार्यकाल में वहॉ की बहुत सारी लोक कथाओं को जानने का अवसर मिला- कुछ पढ़ने से, कुछ लोगों से सुनने से और कुछ ऐसे साधनों से जो केवल इन्हीं को उपलब्ध थे। उन सबको देखकर इनको ऐसा लगा कि ये लोक कथाएँ हिन्दी जानने वाले बच्चों और हिन्दी में रिसर्च करने वालों को तो कभी उपलब्ध ही नहीं हो पायेंगी- हिन्दी की तो बात ही अलग है अंग्रेजी में भी नहीं मिल पायेंगीं.

इसलिये इन्होंने न्यूनतम हिन्दी पढ़ने वालों को ध्यान में रखते हुए उन लोक कथाओं को हिन्दी में लिखना पा्ररम्भ किया। इन लोक कथाओं में अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिका के देशों की लोक कथाओं पर अधिक ध्यान दिया गया है पर उत्तरी अमेरिका और यूरोप के देशों की भी कुछ लोक कथाएँ सम्मिलित कर ली गयी हैं।

अभी तक 1200 से अधिक लोक कथाएँ हिन्दी में लिखी जा चुकी है। इनको "देश विदेश की लोक कथाएँ" क्रम में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि इस प्रकाशन के माध्यम से हम इन लोक कथाओं को जन जन तक पहुंचा सकेंगे.

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