इथियोपिया की लोक कथाएँ - 1 // 17 आलसी बेटे // सुषमा गुप्ता

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कई साल पुरानी बात है कि इथियोपिया के एक गाँव में एक किसान अपने छह बेटों के साथ रहता था। वह किसान बहुत दुखी था क्योंकि उसके छहों बेटे बहुत ही कामचोर और निकम्मे थे। किसान तो रोज अपने काम पर जाता था पर उसके सब बेटे घर पर ही रहते थे।

वे सुबह देर तक सोते रहते, या कभी किसी के घर चले जाते, या सारे दिन खेलते रहते और इसी तरह अपना समय बरबाद करते रहते। वे पैसा तो खर्च करना चाहते थे पर कमाना नहीं चाहते थे। यह सब देख देख कर किसान बहुत दुखी और चिन्तित रहता था।

धीरे धीरे वह आदमी बूढ़ा हो चला पर उसके बेटे न सुधरे। एक बार वह बीमार पड़ गया। वह बिस्तर पर पड़ा पड़ा अपने खेतों के बारे में सोचता रहा।

बारिश का मौसम शुरू होने वाला था। खेतों को गोड़ना था, फिर उसमें बीज बोना था।

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पर किसान तो बीमार था, वह तो यह सब कुछ कर नहीं सकता था और उसके बेटों के तो यह सब करने का सवाल ही पैदा नहीं होता था। इसलिये वह दिन रात चिन्ता में घुलता रहा।

डाक्टरों ने जवाब दे दिया तो एक सुबह उसने अपने बेटों को बुलाया और कहा - "मेरे बेटों, मैं एक बूढ़ा आदमी हूं। कई हफ्तों से बीमार पड़ा हूं। डाक्टर कहते हैं कि मेरे बचने की अब कोई उम्मीद नहीं है। मैंने अपनी सारी सम्पत्ति अपने खेतों में गाड़ दी है। मेरे मरने के बाद उसे निकाल कर तुम सब उसे आपस में बाँट लेना।"

सबसे बड़े बेटे ने तुरन्त पूछा - "कहाँ पिता जी?"

पर किसान उसके इस सवाल का जवाब देने से पहले ही मर गया।

सारे बेटे अपने पिता की सम्पत्ति चाहते थे सो पिता का अन्तिम संस्कार करने के बाद वे सभी खेतों में पहुंच गए। अब उन्हें किसी खास जगह का तो पता था नहीं कि उनके पिता ने अपनी सम्पत्ति कहाँ गाड़ी है सो वे सभी फावड़े ले कर खेत को खोदने में जुट गये।

रात दिन मेहनत करके उन्होंने अपने सारे खेत खूब गहरे गहरे खोद डाले पर जब उन्हें कहीं कुछ नहीं मिला तो वे बहुत निराश हुए और अपने पिता पर अपना गुस्सा निकालने लगे।

इतने में सबसे बड़े बेटे ने देखा कि सारे खेत खुद चुके हैं और सोना मिला नहीं है तो उसने सोचा कि क्यों न घर में रखी तैफ़ ही इनमें बो दी जाये।

सो अनमने मन से वे लोग घर गये और तैफ़ के बीज ला कर खेतों में बिखेर दिये। पर क्योंकि सभी आलसी और निकम्मे थे इसलिये वे महीनों तक अपने खेतों की तरफ गये ही नहीं।

परन्तु खेत इतनी अच्छी तरह खुद चुके थे कि उनको अब किसी तरह की देखभाल की जरूरत ही नहीं थी। कुछ महीनों बाद फसल तैयार हो गयी तो पड़ोसियों ने उनको खबर दी कि उनके खेतों में तो बहुत ही बढ़िया फसल तैयार खड़ी है। वे जा कर उसे काट लायें।

छहों भाई जब फसल काटने पहुंचे तो सचमुच ही उनके खेत की फसल तो आसपास के खेतों की फसल से कहीं ज़्यादा अच्छी थी। खुशी खुशी वे उसको काट कर बाजार में बेचने के लिए ले गये तो उनको अपने अनाज के और किसानों से भी सबसे ज़्यादा दाम मिले।

क्योंकि खेतों में खुदाई बहुत अच्छी हुई थी इसलिए फसल भी बहुत अच्छी हुई और उसके पैसे भी खूब अच्छे आये।

अब उनकी समझ में आया कि उनके पिता के कहने का क्या मतलब था।

अब वे खूब मेहनती हो गये थे और अपनी मेहनत के बल पर वे खूब फले फूले।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं.

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सुषमा गुप्ता का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में सन् 1943 में हुआ था। इन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र में ऐम ए किया और फिर मेरठ विश्वविद्यालय से बी ऐड किया। 1976 में ये नाइजीरिया चली गयीं। वहां इन्होंने यूनिवर्सिटी औफ़ इबादान से लाइब्रेरी साइन्स में ऐम ऐल ऐस किया और एक थियोलोजीकल कौलिज में 10 वर्षों तक लाइब्रेरियन का कार्य किया।

वहां से फिर ये इथियोपिया चली गयीं और वहां एडिस अबाबा यूनिवर्सिटी के इन्स्टीट्यूट औफ़ इथियोपियन स्टडीज़ की लाइब्रेरी में 3 साल कार्य किया। तत्पश्चात इनको दक्षिणी अफ्रीका के एक देश़ लिसोठो के विश्वविद्यालय में इन्स्टीट्यूट औफ़ सदर्न अफ्रीकन स्टडीज़ में 1 साल कार्य करने का अवसर मिला। वहॉ से 1993 में ये यू ऐस ए आगयीं जहॉ इन्होंने फिर से मास्टर औफ़ लाइब्रेरी ऐंड इनफौर्मेशन साइन्स किया। फिर 4 साल ओटोमोटिव इन्डस्ट्री एक्शन ग्रुप के पुस्तकालय में कार्य किया।

1998 में इन्होंने सेवा निवृत्ति ले ली और अपनी एक वेब साइट बनायी- www.sushmajee.com <http://www.sushmajee.com>। तब से ये उसी वेब साइट पर काम कर रहीं हैं। उस वेब साइट में हिन्दू धर्म के साथ साथ बच्चों के लिये भी काफी सामग्री है।

भिन्न भिन्न देशों में रहने से इनको अपने कार्यकाल में वहॉ की बहुत सारी लोक कथाओं को जानने का अवसर मिला- कुछ पढ़ने से, कुछ लोगों से सुनने से और कुछ ऐसे साधनों से जो केवल इन्हीं को उपलब्ध थे। उन सबको देखकर इनको ऐसा लगा कि ये लोक कथाएँ हिन्दी जानने वाले बच्चों और हिन्दी में रिसर्च करने वालों को तो कभी उपलब्ध ही नहीं हो पायेंगी- हिन्दी की तो बात ही अलग है अंग्रेजी में भी नहीं मिल पायेंगीं.

इसलिये इन्होंने न्यूनतम हिन्दी पढ़ने वालों को ध्यान में रखते हुए उन लोक कथाओं को हिन्दी में लिखना पा्ररम्भ किया। इन लोक कथाओं में अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिका के देशों की लोक कथाओं पर अधिक ध्यान दिया गया है पर उत्तरी अमेरिका और यूरोप के देशों की भी कुछ लोक कथाएँ सम्मिलित कर ली गयी हैं।

अभी तक 1200 से अधिक लोक कथाएँ हिन्दी में लिखी जा चुकी है। इनको "देश विदेश की लोक कथाएँ" क्रम में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि इस प्रकाशन के माध्यम से हम इन लोक कथाओं को जन जन तक पहुंचा सकेंगे.

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