गुरुवार, 3 अगस्त 2017

इथियोपिया की लोक कथाएँ - 1 // 18 होशियार बेटा // सुषमा गुप्ता

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बहुत पुरानी बात है कि इथियोपिया के गोंडर जिले में एक बूढ़ा रहता था। उसके तीन बेटे थे।

एक बार वह बूढ़ा बहुत बीमार हो गया तो उसने अपने तीनों बेटों को बुलाया ताकि वह अपनी सम्पत्ति का बंटवारा कर सके। पर अपनी सम्पत्ति का बंटवारा करने से पहले वह यह जान लेना चाहता था कि उसका कौन सा बेटा सबसे ज़्यादा होशियार है।

बूढ़े आदमी ने अपने तीनों बेटों को बुला कर उनसे कहा "तुममें से जो भी सबसे ज़्यादा होशियार होगा मैं उसको इनाम दूंगा।

अभी तो तुम लोग ऐसा करो कि मेरी इस मेज पर कुछ पैसे रखे है। तुम तीनों उनमें से 2र्525 सैन्ट ले लो और मेरे लिये कोई ऐसी चीज़ खरीद कर लाओ जिससे मेरा यह कमरा भर जाये।"

उसके तीनों बेटों ने मेज पर से 2र्525 सैन्ट उठाये और कोई ऐसी चीज़ खरीदने चल दिये जिससे वे अपने पिता का कमरा भर सकें।

बूढ़े का सबसे बड़ा बेटा जब बाहर निकला तो उसने सोचा - "यह क्या मुश्किल काम है। बाजार में मुझे ऐसी कई चीज़ें मिल जायेंगी जो मेरे पिता का कमरा भर देंगी।" सो वह बाजार गया और उसने 25 सैन्ट का भूसा खरीद लिया।

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जब दूसरा बेटा बाहर निकला तो उसने सोचा - "ऐसी क्या चीज़ हो सकती है जिससे 25 सैन्ट में ही पिता का कमरा भर जाए।" उसने कई दूकानें देखीं और आखीर में 25 सैन्ट के पंख खरीद लिये।

पर सबसे छोटा बेटा तो सोचता ही रह गया कि 25 सैन्ट में ऐसी कौन सी चीज़ आ सकती है जो उसके पिता का कमरा भर देगी। वह घन्टों तक सोचता रहा और फिर एक छोटी सी दूकान में जा कर एक मोमबत्ती और एक दियासलाई खरीद लाया।

अगले दिन तीनों बेटे पिता के पास लौटे। वे अपने साथ अपनी खरीदी हुई चीज़ें भी लाये थे जिनसे उनको अपने पिता का कमरा भरना था।

सबसे बड़ा बेटा भूसा लाया था उसकी बड़ी सी पोटली उसकी कमर पर रखी थी। दूसरा बेटा पंख लाया था उसकी पोटली भी उसकी कमर पर रखी था। पर सबसे छोटा बेटा तो मोमबत्ती लाया था और वह उसकी जेब में रखी थी।

दोनों बड़े बेटे अपने छोटे भाई के हाथ में कुछ भी न देख कर बड़े खुश थे। उनको लग रहा था कि इस बेचारे को तो लगता है कोई चीज़ ही नहीं मिली जिससे यह पिता जी का कमरा भर सके इसलिये अब इनाम तो बस हम ही को मिलेगा।

सबसे पहले सबसे बड़ा बेटा कमरे के अन्दर घुसा और उसने अपने पिता को अपना भूसा दिखाया। पर अफसोस, वह भूसा तो उस कमरे के एक कोने में ही सिमट कर रह गया।

अब दूसरे बेटे की बारी थी। दूसरा बेटा भी कमरे में घुसा और उसने अपने पिता को अपने लाये पंख दिखाये। पर अफसोस, वे पंख भी उस कमरे के केवल दो कोने ही भर सके।

बूढ़े आदमी ने दुखी हो कर पूछा - "क्या दुनियाँ में कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिससे मेरा कमरा भर जाये?"

यह सुन कर सबसे छोटे बेटे ने अपनी जेब से मोमबत्ती निकाली और दियासलाई से उसे जला दिया। सारा कमरा रोशनी से भर गया।

बूढ़ा आदमी यह देख कर बहुत खुश हुआ और उसने अपनी सारी सम्पत्ति अपने सबसे छोटे बेटे को दे दी।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं.

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सुषमा गुप्ता का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में सन् 1943 में हुआ था। इन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र में ऐम ए किया और फिर मेरठ विश्वविद्यालय से बी ऐड किया। 1976 में ये नाइजीरिया चली गयीं। वहां इन्होंने यूनिवर्सिटी औफ़ इबादान से लाइब्रेरी साइन्स में ऐम ऐल ऐस किया और एक थियोलोजीकल कौलिज में 10 वर्षों तक लाइब्रेरियन का कार्य किया।

वहां से फिर ये इथियोपिया चली गयीं और वहां एडिस अबाबा यूनिवर्सिटी के इन्स्टीट्यूट औफ़ इथियोपियन स्टडीज़ की लाइब्रेरी में 3 साल कार्य किया। तत्पश्चात इनको दक्षिणी अफ्रीका के एक देश़ लिसोठो के विश्वविद्यालय में इन्स्टीट्यूट औफ़ सदर्न अफ्रीकन स्टडीज़ में 1 साल कार्य करने का अवसर मिला। वहॉ से 1993 में ये यू ऐस ए आगयीं जहॉ इन्होंने फिर से मास्टर औफ़ लाइब्रेरी ऐंड इनफौर्मेशन साइन्स किया। फिर 4 साल ओटोमोटिव इन्डस्ट्री एक्शन ग्रुप के पुस्तकालय में कार्य किया।

1998 में इन्होंने सेवा निवृत्ति ले ली और अपनी एक वेब साइट बनायी- www.sushmajee.com <http://www.sushmajee.com>। तब से ये उसी वेब साइट पर काम कर रहीं हैं। उस वेब साइट में हिन्दू धर्म के साथ साथ बच्चों के लिये भी काफी सामग्री है।

भिन्न भिन्न देशों में रहने से इनको अपने कार्यकाल में वहॉ की बहुत सारी लोक कथाओं को जानने का अवसर मिला- कुछ पढ़ने से, कुछ लोगों से सुनने से और कुछ ऐसे साधनों से जो केवल इन्हीं को उपलब्ध थे। उन सबको देखकर इनको ऐसा लगा कि ये लोक कथाएँ हिन्दी जानने वाले बच्चों और हिन्दी में रिसर्च करने वालों को तो कभी उपलब्ध ही नहीं हो पायेंगी- हिन्दी की तो बात ही अलग है अंग्रेजी में भी नहीं मिल पायेंगीं.

इसलिये इन्होंने न्यूनतम हिन्दी पढ़ने वालों को ध्यान में रखते हुए उन लोक कथाओं को हिन्दी में लिखना पा्ररम्भ किया। इन लोक कथाओं में अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिका के देशों की लोक कथाओं पर अधिक ध्यान दिया गया है पर उत्तरी अमेरिका और यूरोप के देशों की भी कुछ लोक कथाएँ सम्मिलित कर ली गयी हैं।

अभी तक 1200 से अधिक लोक कथाएँ हिन्दी में लिखी जा चुकी है। इनको "देश विदेश की लोक कथाएँ" क्रम में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि इस प्रकाशन के माध्यम से हम इन लोक कथाओं को जन जन तक पहुंचा सकेंगे.

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