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इथियोपिया की लोक कथाएँ - 1 // 19 चतुर गवैया // सुषमा गुप्ता

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बहुत पुरानी बात है कि इथियोपिया के एक गाँव में एक गवैया रहता था। किसी शादी के मौके पर या फिर किसी इज़्ज़तदार मेहमान के आने पर उसको वहाँ गाने के लिये बुलाया जाता था। उससे उसको जो पैसे मिल जाते थे उसी से वह अपना गुजारा करता था।

एक बार कुछ ऐसा हुआ कि उसके पास ऐसे बहुत सारे मौके आये जब उसको कई जगह गाने के लिये बुलाया गया और उसको बहुत सारी आमदनी हुई।

एक दिन उसने सोचा कि इतना सारा सोना घर में रखना ठीक नहीं है इसलिये इसको जमीन में कहीं गाड़ देना चाहिए। उसने एक थैले में अपना सारा सोना रखा और रात के समय उसको अपने घर के पीछे वाले बागीचे में गाड़ आया।

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गवैये का पड़ोसी यह जानता था कि इस गवैये के पास बहुत सोना है इसलिए वह हमेशा उसकी चौकीदारी करता रहता था। उसने गवैये को अपना सोने का थैला गाड़ते हुए भी देख लिया था।

जब गवैया रात को अपने बागीचे में गया था तो उसके पड़ोसी ने सोचा कि जरूर ही वह अपना सोना गाड़ने गया होगा क्योंकि इसी लिये तो वह वहाँ रात को गया था।

काफी रात बीत जाने के बाद वह पड़ोसी गवैये के बागीचे में दबे पाँव चुपचाप गया और बिना कोई आवाज किये वह जगह खोद कर उसके सोने का थैला निकाल लिया।

उसने थैला खोल कर देखा तो उस थैले में तो सचमुच ही सोना भरा था। वह बहुत खुश हुआ और उस जगह को पहले जैसा बना कर वह जिस तरह दबे पाँव वहाँ गया था उसी तरह दबे पाँव वह उस सोने के थैले को ले कर वापस अपने घर लौट आया।

कुछ ही दिनों में गवैये को पता चल गया कि किसी ने उसका सोना भरा थैला चुरा लिया है। उसने कई बार अपने पड़ोसी को अपनी चौकीदारी करते हुए देखा था इसलिये उसका पहला शक अपने पड़ोसी पर ही गया।

अब वह अपना सोना उससे कैसे वापस ले वह यही सोचने लगा। तुरन्त ही उसके दिमाग में एक तरकीब आ गयी और वह उठ कर अपने पड़ोसी के घर पहुंचा।

उसने अपने पड़ोसी से कहा - "दोस्त, मैं तुमसे एक सलाह माँगने आया हूं। मेरे पास एक थैला सोना था जो मैंने अपने पीछे वाले बागीचे में गाड़ दिया था पर अब मेरे पास एक थैला सोना और जमा हो गया है। इस सोने को अब मैं कहाँ रखूं?"

पड़ोसी यह सुन कर बहुत खुश हुआ कि अब उसे एक थैला सोना हड़पने का मौका और मिलेगा इसलिए वह तुरन्त ही बोला - "इसमें सोचने की क्या बात है, वहीं गाड़ दो जहाँ पहले गाड़ा था।"

"धन्यवाद दोस्त, तुम्हारी सलाह के लिये बहुत बहुत धन्यवाद।" कह कर वह गवैया वहाँ से अपने घर चला आया।

गवैये के जाते ही पड़ोसी के दिमाग में यह बात आयी कि अगर यह गवैया मेरी बात मान कर अपना सोने का थैला उसी जगह गाड़ने गया तो यह भेद खुल जायेगा कि किसी ने उसका पहला वाला थैला चुरा लिया है और फिर शायद यह अपना दूसरा थैला वहाँ न गाड़े इसलिये मुझे इसका पुराना वाला थैला पहले से ही वहीं गाड़ देना चाहिये।

जब वह अपना दूसरा सोने का थैला भी वहाँ गाड़ देगा तब मैं उसका सारा सोना एक साथ निकाल लाऊंगा। सो उस रात पड़ोसी फिर बागीचे में गया और गवैये का पुराना वाला सोने का थैला उसी जगह पर गाड़ आया।

गवैया होशियार था। वह उस रात सोया ही नहीं था क्योंकि उसकी तरकीब के अनुसार पड़ोसी को वहाँ पुराना वाला सोने का थैला गाड़ने आना चाहिये था, और गवैये ने देखा कि वह वहाँ आया और उसका पुराना वाला थैला गाड़ कर चला गया।

कुछ देर बाद गवैया अपने घर से निकला और उसने अपना वह पुराना वाला सोने का थैला निकाल कर पत्थरों से भरा एक नया बड़ा थैला वहाँ गाड़ दिया।

उधर पड़ोसी की ऑखों में भी नींद कहाँ? वह भी चौकन्ना हो कर घात लगाए बैठा था। उसने देखा कि गवैये ने एक छोटा थैला जमीन में से निकाला और उसकी जगह एक बड़ा सा थैला वहाँ गाड़ दिया।

वह यह सोच कर बहुत खुश हुआ कि अब उसे पहले से कहीं ज़्यादा सोना मिल जाएगा। बड़ी कठिनाई से उसने वह रात और अगला दिन काटा। अगली रात वह मौका पाते ही वह गवैये के बागीचे की तरफ गया और वह बड़ा सा पत्थरों का थैला निकाल कर जल्दी जल्दी घर वापस आ गया।

थैले के बोझ से वह बहुत खुश था पर घर आ कर जब उसने वह थैला खोला तो अपना सिर पीट कर रह गया क्योंकि उस थैले में तो सोने की बजाय पत्थरों के टुकड़े थे। गवैये ने उसे धोखा दिया।

इस तरह उस गवैये ने समझदारी से अपने चोर पड़ोसी से अपना चुराया हुआ सोना वापस लिया।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं.

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सुषमा गुप्ता का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में सन् 1943 में हुआ था। इन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र में ऐम ए किया और फिर मेरठ विश्वविद्यालय से बी ऐड किया। 1976 में ये नाइजीरिया चली गयीं। वहां इन्होंने यूनिवर्सिटी औफ़ इबादान से लाइब्रेरी साइन्स में ऐम ऐल ऐस किया और एक थियोलोजीकल कौलिज में 10 वर्षों तक लाइब्रेरियन का कार्य किया।

वहां से फिर ये इथियोपिया चली गयीं और वहां एडिस अबाबा यूनिवर्सिटी के इन्स्टीट्यूट औफ़ इथियोपियन स्टडीज़ की लाइब्रेरी में 3 साल कार्य किया। तत्पश्चात इनको दक्षिणी अफ्रीका के एक देश़ लिसोठो के विश्वविद्यालय में इन्स्टीट्यूट औफ़ सदर्न अफ्रीकन स्टडीज़ में 1 साल कार्य करने का अवसर मिला। वहॉ से 1993 में ये यू ऐस ए आगयीं जहॉ इन्होंने फिर से मास्टर औफ़ लाइब्रेरी ऐंड इनफौर्मेशन साइन्स किया। फिर 4 साल ओटोमोटिव इन्डस्ट्री एक्शन ग्रुप के पुस्तकालय में कार्य किया।

1998 में इन्होंने सेवा निवृत्ति ले ली और अपनी एक वेब साइट बनायी- www.sushmajee.com <http://www.sushmajee.com>। तब से ये उसी वेब साइट पर काम कर रहीं हैं। उस वेब साइट में हिन्दू धर्म के साथ साथ बच्चों के लिये भी काफी सामग्री है।

भिन्न भिन्न देशों में रहने से इनको अपने कार्यकाल में वहॉ की बहुत सारी लोक कथाओं को जानने का अवसर मिला- कुछ पढ़ने से, कुछ लोगों से सुनने से और कुछ ऐसे साधनों से जो केवल इन्हीं को उपलब्ध थे। उन सबको देखकर इनको ऐसा लगा कि ये लोक कथाएँ हिन्दी जानने वाले बच्चों और हिन्दी में रिसर्च करने वालों को तो कभी उपलब्ध ही नहीं हो पायेंगी- हिन्दी की तो बात ही अलग है अंग्रेजी में भी नहीं मिल पायेंगीं.

इसलिये इन्होंने न्यूनतम हिन्दी पढ़ने वालों को ध्यान में रखते हुए उन लोक कथाओं को हिन्दी में लिखना पा्ररम्भ किया। इन लोक कथाओं में अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिका के देशों की लोक कथाओं पर अधिक ध्यान दिया गया है पर उत्तरी अमेरिका और यूरोप के देशों की भी कुछ लोक कथाएँ सम्मिलित कर ली गयी हैं।

अभी तक 1200 से अधिक लोक कथाएँ हिन्दी में लिखी जा चुकी है। इनको "देश विदेश की लोक कथाएँ" क्रम में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि इस प्रकाशन के माध्यम से हम इन लोक कथाओं को जन जन तक पहुंचा सकेंगे.

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