गुरुवार, 3 अगस्त 2017

इथियोपिया की लोक कथाएँ - 1 // 21 लालची कुत्ता // सुषमा गुप्ता

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इथियोपिया के अम्बो शहर के पास एक लड़का रहता था। वह अपने माता पिता के साथ ही रहता था और अपने पिता की भेड़ों की देखभाल में उनका हाथ बंटाता था। वह रोज भेड़ों को घास चराने के लिए ले जाता था।

उसके पास एक कुत्ता भी था। वह कुत्ता उसका अच्छा साथी था और कई मौकों पर उसकी सहायता भी करता था। वह उसकी भेड़ों की देख भाल भी करता था।

सुबह सुबह वह कुत्ता उन भेड़ों को मैदानों की तरफ चराने के लिए ले जाता और शाम को ही उनको घर वापस लाता। सब काम वह बहुत अच्छा करता था पर वह लालची बहुत था। उसको अपने लिये सारी चीज़ें चाहिये थीं।

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एक दिन उस कुत्ते ने घर से थोड़ा सा माँस चुराया और उसको ले कर दूर जंगल में भाग गया। कुछ दूर जाने के बाद ही एक छोटी सी नदी आयी। नदी पार करने के लिए नदी के ऊपर एक पुल था।

जब वह कुत्ता पुल से हो कर नदी पार कर रहा था तो उसने नीचे पानी की तरफ देखा। पानी में उसको अपनी परछाँई दिखायी

दी। परछाँई देख कर उसने सोचा कि वह कोई दूसरा कुत्ता था जो उससे ज़्यादा बड़ा माँस का टुकड़ा लिये जा रहा था।

पहले तो उसे यह सब देख कर डर लगा पर तुरन्त ही लालच ने उसे घेर लिया। उसकी उस दूसरे कुत्ते से वह माँस का टुकड़ा लेने की इच्छा हो आयी और वह तुरन्त ही उस दूसरे कुत्ते से माँस के टुकड़े को छीनने के लिये नदी में कूद पड़ा।

पानी में कूद कर उसने दूसरे कुत्ते का माँस का टुकड़ा छीनने के लिये अपना मुंह खोला तो उसके अपने मुंह का माँस का टुकड़ा तो पानी में गिर गया और नदी के पानी के बहाव में बह गया।

पर पानी में कोई दूसरा कुत्ता तो था नहीं, वहाँ तो केवल उसकी अपनी परछाँई थी सो लाख कोशिशें करने के बाद भी वह पानी वाले कुत्ते से उसके बड़े माँस के टुकड़े को न पा सका।

"ओह तो यह उस कुत्ते की चाल थी। यहाँ तो कोई भी नहीं है। चलो कोई बात नहीं, मेरे पास मेरा अपना माँस का टुकड़ा तो है ही।" कुत्ता खुशी से बोला।

पर यह क्या? उसका अपना माँस का टुकड़ा तो कब का पानी में बह चुका था।

इस तरह उसने लालच में आ कर अपना माँस का टुकड़ा तो खोया ही खोया और उसे पानी वाले कुत्ते के माँस का टुकड़ा भी न मिल सका। सच है लालच बुरी बला है।

ऐसी ही कहानी उत्तरी भारत में भी माता पिता अपने बहुत छोटे बच्चों को सुनाते हैं।


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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं.

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सुषमा गुप्ता का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में सन् 1943 में हुआ था। इन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र में ऐम ए किया और फिर मेरठ विश्वविद्यालय से बी ऐड किया। 1976 में ये नाइजीरिया चली गयीं। वहां इन्होंने यूनिवर्सिटी औफ़ इबादान से लाइब्रेरी साइन्स में ऐम ऐल ऐस किया और एक थियोलोजीकल कौलिज में 10 वर्षों तक लाइब्रेरियन का कार्य किया।

वहां से फिर ये इथियोपिया चली गयीं और वहां एडिस अबाबा यूनिवर्सिटी के इन्स्टीट्यूट औफ़ इथियोपियन स्टडीज़ की लाइब्रेरी में 3 साल कार्य किया। तत्पश्चात इनको दक्षिणी अफ्रीका के एक देश़ लिसोठो के विश्वविद्यालय में इन्स्टीट्यूट औफ़ सदर्न अफ्रीकन स्टडीज़ में 1 साल कार्य करने का अवसर मिला। वहॉ से 1993 में ये यू ऐस ए आगयीं जहॉ इन्होंने फिर से मास्टर औफ़ लाइब्रेरी ऐंड इनफौर्मेशन साइन्स किया। फिर 4 साल ओटोमोटिव इन्डस्ट्री एक्शन ग्रुप के पुस्तकालय में कार्य किया।

1998 में इन्होंने सेवा निवृत्ति ले ली और अपनी एक वेब साइट बनायी- www.sushmajee.com <http://www.sushmajee.com>। तब से ये उसी वेब साइट पर काम कर रहीं हैं। उस वेब साइट में हिन्दू धर्म के साथ साथ बच्चों के लिये भी काफी सामग्री है।

भिन्न भिन्न देशों में रहने से इनको अपने कार्यकाल में वहॉ की बहुत सारी लोक कथाओं को जानने का अवसर मिला- कुछ पढ़ने से, कुछ लोगों से सुनने से और कुछ ऐसे साधनों से जो केवल इन्हीं को उपलब्ध थे। उन सबको देखकर इनको ऐसा लगा कि ये लोक कथाएँ हिन्दी जानने वाले बच्चों और हिन्दी में रिसर्च करने वालों को तो कभी उपलब्ध ही नहीं हो पायेंगी- हिन्दी की तो बात ही अलग है अंग्रेजी में भी नहीं मिल पायेंगीं.

इसलिये इन्होंने न्यूनतम हिन्दी पढ़ने वालों को ध्यान में रखते हुए उन लोक कथाओं को हिन्दी में लिखना पा्ररम्भ किया। इन लोक कथाओं में अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिका के देशों की लोक कथाओं पर अधिक ध्यान दिया गया है पर उत्तरी अमेरिका और यूरोप के देशों की भी कुछ लोक कथाएँ सम्मिलित कर ली गयी हैं।

अभी तक 1200 से अधिक लोक कथाएँ हिन्दी में लिखी जा चुकी है। इनको "देश विदेश की लोक कथाएँ" क्रम में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि इस प्रकाशन के माध्यम से हम इन लोक कथाओं को जन जन तक पहुंचा सकेंगे.

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