गुरुवार, 3 अगस्त 2017

इथियोपिया की लोक कथाएँ - 1 // 24 दो धोखेबाज // सुषमा गुप्ता

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एक बार दो धोखेबाजों ने लोगों को मिल कर धोखा देने का निश्चय किया। तो उनमें से एक आदमी तो जंगल में छिप गया और दूसरा आदमी अंधा बन कर सड़क के किनारे बैठ कर भीख माँगने लगा।

वह कह रहा था "भगवान के नाम पर मुझे कोई कुछ दे दो, भगवान के नाम पर मुझे कोई कुछ दे दो।" कुछ लोगों ने उसे कुछ पैसे दिये। कुछ पैसे इकठ्ठा हो जाने पर वह लोगों से यह कहने लगा कि अब कोई उसको बाजार ले जाये।

बहुत सारे लोग उसको देख कर ऐसे ही निकल गये परन्तु एक आदमी जो लदे हुए गधों और एक बकरे को ले कर जा रहा था उसको देख कर रुक गया और बोला - "मैं तुमको अपने साथ ले तो जा सकता हूं पर मेरे साथ दो गधे और एक बकरा पहले से ही है इसलिये मैं मजबूर हूं।"

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अंधा आदमी बोला - "इसमें कोई परेशानी की बात नहीं है। तुम गधे ले चलो और बकरे की रस्सी तुम मुझे पकड़ा दो। फिर तुम आगे आगे चलो और मैं तुम्हारे पीछे पीछे चलता हूं।" गधे वाला राजी हो गया।

जब वे लोग जा रहे थे तो जंगल में छिपा हुआ दूसरा धोखेबाज पीछे से आया, उसने बकरे की रस्सी काटी और उसको ले भागा।

अंधे बने धोखेबाज ने बकरे के मालिक को पुकार कर कहा - "भाई जरा रुको, पहले मेरे हाथ की रस्सी बकरे को खींच रही थी पर अब वह ढीली है। जरा देखो तो क्या हुआ।"

बकरे के मालिक ने पलट कर देखा तो बकरा तो गायब था। वह बोला - "अरे मेरा बकरा कहाँ गया। अब मैं उसको ढूंढने जाऊं तो इन गधों का क्या करूं?"

अंधे ने कहा - "जहाँ तक मेरा सवाल है मैं तो बकरे को ढूंढने जा नहीं सकता हाँ अगर तुम मुझे गधों की रस्सी पकड़ा दो तो तुम बकरे को ढूंढने जा सकते हो।"

गधों का मालिक बोला - "यह ठीक है मैं ऐसा ही करता हूं।" कह कर उसने अपने दोनों गधों की रस्सी उस अंधे को पकड़ा दी और वह खुद बकरे को ढूंढने चल दिया।

जैसे ही बकरे का मालिक कुछ दूर गया पहला अंधा बना धोखेबाज उन गधों को ले कर भाग गया। दोनों धोखेबाज मिल गये और उन्होंने आपस में गधा, बकरा और गधों पर लदा सब सामान आपस में बाँट लिया।

इस तरह भलाई करने वाले ने धोखेबाजों के हाथों अपना सब कुछ खोया।

एक और बार इन दोनों धोखेबाजों ने एक पहाड़ी के किनारे एक आदमी को अपना खेत जोतते देखा तो दोनों ने उसको धोखा देने की सोची।

एक धोखेबाज तो जंगल में छिप गया और दूसरा धोखेबाज पेड़ पर चढ़ कर ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने लगा - "यह तो बड़े आश्चर्य की बात है, यह तो बड़े आश्चर्य की बात है।"

किसान को यह जानने की इच्छा हुई कि यह आदमी किस आश्चर्य की बात कर रहा है। सो वह अपने बैल रोक कर इधर उधर देखने लगा कि वह क्या आश्चर्य है पर काफी देर तक देखने के बाद भी उसको कोई आश्चर्य दिखायी नहीं दिया।

इतने में दूसरा धोखेबाज आया और उसका एक बैल खोल कर ले गया। किसान को जब कुछ दिखायी न दिया तो वह पेड़ पर चढ़े धोखेबाज के पास आया और उससे पूछा - "क्यों भाई, क्या आश्चर्य है जो तुम इतनी ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रहे थे?"

धोखेबाज बोला - "यही कि तुम एक बैल से ही खेत में हल चला रहे हो। यही आश्चर्य है।"

किसान बोला - "पर मैं तो एक बैल से हल नहीं चला रहा। देखो न, मैं तो दो बैलों से हल चला रहा हूं। वे रहे मेरे दो बैल।"

इतना कह कर उसने अपने बैलों की ओर इशारा किया तो देखा कि वहाँ तो सचमुच एक ही बैल था।

किसान बेचारा बहुत दुखी हुआ। "मेरा बैल कहाँ है, मेरा बैल कहाँ है।" कहता हुआ वह अपना बैल ढूंढने गया तो पेड़ पर चढ़ा धोखेबाज उसका दूसरा बैल भी ले कर भाग गया।

इस तरह उन दोनों धोखेबाजों ने मिल कर उसके दोनों बैल चुरा लिये। इसी तरह से उन्होंने फिर कई और लोगों को भी उल्लू बनाया।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं.

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सुषमा गुप्ता का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में सन् 1943 में हुआ था। इन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र में ऐम ए किया और फिर मेरठ विश्वविद्यालय से बी ऐड किया। 1976 में ये नाइजीरिया चली गयीं। वहां इन्होंने यूनिवर्सिटी औफ़ इबादान से लाइब्रेरी साइन्स में ऐम ऐल ऐस किया और एक थियोलोजीकल कौलिज में 10 वर्षों तक लाइब्रेरियन का कार्य किया।

वहां से फिर ये इथियोपिया चली गयीं और वहां एडिस अबाबा यूनिवर्सिटी के इन्स्टीट्यूट औफ़ इथियोपियन स्टडीज़ की लाइब्रेरी में 3 साल कार्य किया। तत्पश्चात इनको दक्षिणी अफ्रीका के एक देश़ लिसोठो के विश्वविद्यालय में इन्स्टीट्यूट औफ़ सदर्न अफ्रीकन स्टडीज़ में 1 साल कार्य करने का अवसर मिला। वहॉ से 1993 में ये यू ऐस ए आगयीं जहॉ इन्होंने फिर से मास्टर औफ़ लाइब्रेरी ऐंड इनफौर्मेशन साइन्स किया। फिर 4 साल ओटोमोटिव इन्डस्ट्री एक्शन ग्रुप के पुस्तकालय में कार्य किया।

1998 में इन्होंने सेवा निवृत्ति ले ली और अपनी एक वेब साइट बनायी- www.sushmajee.com <http://www.sushmajee.com>। तब से ये उसी वेब साइट पर काम कर रहीं हैं। उस वेब साइट में हिन्दू धर्म के साथ साथ बच्चों के लिये भी काफी सामग्री है।

भिन्न भिन्न देशों में रहने से इनको अपने कार्यकाल में वहॉ की बहुत सारी लोक कथाओं को जानने का अवसर मिला- कुछ पढ़ने से, कुछ लोगों से सुनने से और कुछ ऐसे साधनों से जो केवल इन्हीं को उपलब्ध थे। उन सबको देखकर इनको ऐसा लगा कि ये लोक कथाएँ हिन्दी जानने वाले बच्चों और हिन्दी में रिसर्च करने वालों को तो कभी उपलब्ध ही नहीं हो पायेंगी- हिन्दी की तो बात ही अलग है अंग्रेजी में भी नहीं मिल पायेंगीं.

इसलिये इन्होंने न्यूनतम हिन्दी पढ़ने वालों को ध्यान में रखते हुए उन लोक कथाओं को हिन्दी में लिखना पा्ररम्भ किया। इन लोक कथाओं में अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिका के देशों की लोक कथाओं पर अधिक ध्यान दिया गया है पर उत्तरी अमेरिका और यूरोप के देशों की भी कुछ लोक कथाएँ सम्मिलित कर ली गयी हैं।

अभी तक 1200 से अधिक लोक कथाएँ हिन्दी में लिखी जा चुकी है। इनको "देश विदेश की लोक कथाएँ" क्रम में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि इस प्रकाशन के माध्यम से हम इन लोक कथाओं को जन जन तक पहुंचा सकेंगे.

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