गुरुवार, 3 अगस्त 2017

इथियोपिया की लोक कथाएँ - 1 // 26 गरीब को परेशान करने का नतीजा // सुषमा गुप्ता

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एक बार इथियोपिया के एक गाँव में दो आदमी बराबर बराबर रहते थे। एक आदमी बहुत अमीर था और दूसरा आदमी बहुत गरीब था। लेकिन दोनों के पास एक गधा था जो दोनों के साझे का था।

एक बार उस अमीर आदमी ने गरीब आदमी को परेशान करने की सोची। उसने गरीब आदमी को बुलाया और कहा - "मैं इस गधे को मारना चाहता हूं और अपने हिस्से का आधा गधा अपने कुत्तों को खिलाना चाहता हूं।"

इस पर गरीब आदमी बोला - "हुजूर जैसी आपकी मरजी, पर क्योंकि मैं अपने हिस्से के आधे गधे का कुछ इस्तेमाल नहीं कर पाऊंगा इसलिए आप मेरे हिस्से का आधा गधा भी ले लें और मुझे उसके बदले में पैसे दे दें।"

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अमीर आदमी बोला - "मैं तुमको तुम्हारे पैसे भी नहीं दूंगा और अपने हिस्से का आधा गधा भी कुत्तों को खिलाऊंगा।"

लाचार गरीब आदमी ने अपने पड़ोसियों को इकठ्ठा किया और कहा - "देखो यह अमीर आदमी मुझे परेशान कर रहा है।

मैं तो इस गधे का माँस खा नहीं सकता क्योंकि हमारे यहाँ गधे का माँस खाना मना है और मैं इसका माँस अपने कुत्तों को भी नहीं खिला सकता क्योंकि मेरे पास कोई कुत्ता भी नहीं है और यह आदमी मेरे हिस्से के पैसे भी नहीं दे रहा है। अब आप ही फैसला करें।"

पड़ोसी मिल कर उस अमीर आदमी को समझाने गये पर वह अमीर आदमी कहाँ सुनने वाला था। वह नहीं माना और गधे को मार डाला गया। गधे के माँस को अमीर और गरीब दोनों में बराबर बराबर बाँट दिया गया।

अमीर आदमी ने अपने हिस्से का आधा माँस अपने कुत्तों को खिला दिया और गरीब आदमी ने अपने हिस्से का आधा माँस फेंक दिया। गरीब आदमी इस सबसे बहुत दुखी था पर क्या करता।

कुछ समय बीता, जाड़ा आ गया, ठंड बढ़ने लगी। गरीब और अमीर आदमी के घर बराबर बराबर थे।

एक दिन गरीब आदमी अमीर आदमी के पास गया और बोला - "हुजूर, जाड़ा आ गया है। मेरी पत्नी और बच्चे ठंड से सिकुड़ रहे हैं। गरमी पाने के लिए मैं अपना घर जलाना चाहता हूं। आप अपने घर का ध्यान रखें।"

अमीर आदमी ने कहा - "लेकिन तुम केवल गरमी पाने के लिये अपना घर क्यों जलाना चाहते हो? ऐसा भी कोई करता है क्या भला?

तुम अपना घर मत जलाओ क्योंकि हमारे तुम्हारे घर एक दूसरे के साथ हैं। क्योंकि जब तुम अपना घर जलाओगे तो आग तो मेरे घर में भी लगेगी न? मैं अपने घर को कैसे बचाऊंगा?"

गरीब आदमी बोला - "हुजूर, मैं मजबूर हूं। मेरे पास और कोई रास्ता नहीं है।"

इस बार प्रार्थना करने की अमीर की बारी थी मगर गरीब आदमी भी भला क्यों मानने लगा। अमीर आदमी ने अपने दोस्तों से उस गरीब आदमी को समझाने की प्रार्थना की तो उन्होंने जवाब दिया "जब उसने तुमसे गधे के माँस के पैसे देने की प्रार्थना की थी तब तुम नहीं माने थे तो अब हम किस मुंह से उससे बात करें?"

इस तरह गरीब आदमी ने गरमी पाने के लिये अपना घर जला दिया। आग बढ़ते बढ़ते अमीर आदमी के घर तक पहुंची और उसने उसके घर को भी जला दिया।

इस तरह बदले की भावना, दुखी मन और अन्याय ने दोनों के घरों व सम्पत्ति को खत्म कर दिया।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं.

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सुषमा गुप्ता का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में सन् 1943 में हुआ था। इन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र में ऐम ए किया और फिर मेरठ विश्वविद्यालय से बी ऐड किया। 1976 में ये नाइजीरिया चली गयीं। वहां इन्होंने यूनिवर्सिटी औफ़ इबादान से लाइब्रेरी साइन्स में ऐम ऐल ऐस किया और एक थियोलोजीकल कौलिज में 10 वर्षों तक लाइब्रेरियन का कार्य किया।

वहां से फिर ये इथियोपिया चली गयीं और वहां एडिस अबाबा यूनिवर्सिटी के इन्स्टीट्यूट औफ़ इथियोपियन स्टडीज़ की लाइब्रेरी में 3 साल कार्य किया। तत्पश्चात इनको दक्षिणी अफ्रीका के एक देश़ लिसोठो के विश्वविद्यालय में इन्स्टीट्यूट औफ़ सदर्न अफ्रीकन स्टडीज़ में 1 साल कार्य करने का अवसर मिला। वहॉ से 1993 में ये यू ऐस ए आगयीं जहॉ इन्होंने फिर से मास्टर औफ़ लाइब्रेरी ऐंड इनफौर्मेशन साइन्स किया। फिर 4 साल ओटोमोटिव इन्डस्ट्री एक्शन ग्रुप के पुस्तकालय में कार्य किया।

1998 में इन्होंने सेवा निवृत्ति ले ली और अपनी एक वेब साइट बनायी- www.sushmajee.com <http://www.sushmajee.com>। तब से ये उसी वेब साइट पर काम कर रहीं हैं। उस वेब साइट में हिन्दू धर्म के साथ साथ बच्चों के लिये भी काफी सामग्री है।

भिन्न भिन्न देशों में रहने से इनको अपने कार्यकाल में वहॉ की बहुत सारी लोक कथाओं को जानने का अवसर मिला- कुछ पढ़ने से, कुछ लोगों से सुनने से और कुछ ऐसे साधनों से जो केवल इन्हीं को उपलब्ध थे। उन सबको देखकर इनको ऐसा लगा कि ये लोक कथाएँ हिन्दी जानने वाले बच्चों और हिन्दी में रिसर्च करने वालों को तो कभी उपलब्ध ही नहीं हो पायेंगी- हिन्दी की तो बात ही अलग है अंग्रेजी में भी नहीं मिल पायेंगीं.

इसलिये इन्होंने न्यूनतम हिन्दी पढ़ने वालों को ध्यान में रखते हुए उन लोक कथाओं को हिन्दी में लिखना पा्ररम्भ किया। इन लोक कथाओं में अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिका के देशों की लोक कथाओं पर अधिक ध्यान दिया गया है पर उत्तरी अमेरिका और यूरोप के देशों की भी कुछ लोक कथाएँ सम्मिलित कर ली गयी हैं।

अभी तक 1200 से अधिक लोक कथाएँ हिन्दी में लिखी जा चुकी है। इनको "देश विदेश की लोक कथाएँ" क्रम में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि इस प्रकाशन के माध्यम से हम इन लोक कथाओं को जन जन तक पहुंचा सकेंगे.

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