बुधवार, 2 अगस्त 2017

इथियोपिया की लोक कथाएँ - 1 // 4 शेर का बच्चा // सुषमा गुप्ता

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यह बहुत पुरानी बात है कि एक बार एक शेर के बच्चे ने अपने पिता से बड़े शेरों के साथ शिकार पर जाने की जिद की।

उसके पिता ने उससे कहा भी - "बेटा, तुम अभी बहुत छोटे हो। तुम अभी शिकार पर जाने लायक नहीं हो। तुम या तो शिकार में घायल हो जाओगे या फिर जंगल में खो जाओगे इसलिये तुम्हें अभी घर पर ही रहना चाहिए।"

पर बच्चे ने जिद करते हुए पिता शेर से प्रार्थना की - "पिताजी, मैं अब इतना छोटा बच्चा भी नहीं हूं जो अपनी देख भाल अपने आप न कर सकूं। मुझे भी शिकार पर जाने की इजाज़त दे दीजिये न।"

अन्त में पिता शेर राजी हो गया और बच्चा शेर भी शिकार के लिए बड़े शेरों के साथ चल दिया।

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पिता शेर ने उसको सावधान करते हुए कहा "बेटा, तुम शिकार के लिये जा तो रहे हो पर तुम दूसरे बड़े शेरों के साथ ही रहना वरना तुम मुसीबत में फंस जाओगे।"

"ठीक है पिताजी।"

बच्चा शेर जब जंगल से गुजर रहा था तो उसको सब कुछ नया नया लग रहा था इसलिये वह हर एक चीज़ को बड़े आश्चर्य और ध्यान से देखता चला जा रहा था। इस देखने के चक्कर में वह बड़े शेरों के झुंड से पीछे अकेला रह गया।

जब उसने अपने आपको अकेला पाया तो वह बहुत घबराया पर उसकी समझ में ही नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। वह अपने घर से काफी दूर निकल आया था और अब अपने घर का रास्ता भी भूल गया था।

जैसे जैसे समय गुजरता जा रहा था उसका डर बढ़ता ही जा रहा था। अब उसको अपने पिता की दी हुई सलाह याद आयी कि उसके पिता ने उसको बड़े शेरों के साथ रहने के लिये क्यों कहा था। पर अब क्या हो सकता था।

धीरे धीरे वह एक बड़े घास के मैदान में निकल आया। यहाँ तो हाथी रहते थे। उसने देखा कि उस मैदान में हाथी घास खा रहे थे।

अब उस शेर के बच्चे ने तो हाथी पहले कभी देखे नहीं थे। वह जानता ही नहीं था कि हाथी क्या होता है सो वह उन हाथियों के झुंड में निडर हो कर घूमने लगा। इतने में एक बड़े हाथी का पैर उसके ऊपर पड़ गया और वह बच्चा शेर मर गया।

उधर काफी देर बाद शेरों को पता चला कि बच्चा शेर उनके झुंड में नहीं है तो उन्हें चिन्ता हुई कि वह कहाँ रह गया। उन्होंने उसको बहुत ढूंढा पर वह उन्हें कहीं दिखायी नहीं दिया।

उनमें से कुछ ने कहा "हम लोग तो उसको दोपहर से ढूंढ रहे हैं पर वह हमें कहीं दिखायी ही नहीं दे रहा है।"

अन्त में उनको उसका कुचला हुआ शरीर हाथियों वाले घास के मैदान में मिल गया। उन्होंने आपस में इस बात पर बहुत दुख प्रगट किया और फिर यह बात उसके पिता को बताने गये।

वे बोले - "शेर भाई हमें बहुत दुख है कि तुम्हारा बेटा मर गया है।"

यह सुन कर पिता शेर रोने लगा और रोते रोते बोला - "मेरे बेटे को किसने मारा है, जल्दी बताओ। मैं उस खूनी को सजा दूंगा।"

शेरों ने कहा - "उसको हाथियों ने मारा है। बच्चा शेर घास के मैदान सैवैना में खो गया था। वहाँ एक बड़े हाथी का पैर उसके ऊपर पड़ गया और वह मर गया।"

बूढ़े पिता शेर ने कुछ पल सोचा और फिर बोला - "नहीं मेरे बेटे को हाथियों ने नहीं बल्कि बकरों ने मारा है।"

दूसरे शेरों ने उसको समझाने की बहुत कोशिश की कि बच्चा शेर को बकरों ने नहीं मारा क्योंकि बकरे तो उसको मार ही नहीं सकते थे बल्कि उसको तो हाथियों ने मारा है परन्तु पिता शेर अपनी बात पर अड़ा रहा कि उसको हाथियों ने नहीं बल्कि बकरों ने मारा है।

बूढ़ा शेर बहुत नाराज व दुखी था। वह उठा और चल दिया। कुछ दूर जाने पर उसको बकरों का एक झुंड घास खाता दिखायी दे गया।

बस उसने आव देखा न ताव और कर दिया बकरों पर हमला। उसने कई बकरों को मार दिया। जब काफी खून बह गया तब कहीं जा कर शेर को शान्ति मिली और वह घर लौटा।

कई बार ऐसा होता है कि जब कोई अपने से ज़्यादा ताकतवर आदमी का सताया हुआ होता है तो क्योंकि वह उस ताकतवर से लड़ नहीं पाता इसलिए वह अपने से कमजोर को उसकी सजा दे कर अपने मन को तसल्ली दे लेता है।

यही हाल शेर का भी हुआ। वह हाथियों से तो लड़ नहीं सकता था इसलिए उसने अपना बदला उन बेचारे कमजोर बकरों को मार कर ले लिया।


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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं.

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सुषमा गुप्ता का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में सन् 1943 में हुआ था। इन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र में ऐम ए किया और फिर मेरठ विश्वविद्यालय से बी ऐड किया। 1976 में ये नाइजीरिया चली गयीं। वहॉ इन्होंने यूनिवर्सिटी औफ़ इबादान से लाइब्रेरी साइन्स में ऐम ऐल ऐस किया और एक थियोलोजीकल कौलिज में 10 वर्षों तक लाइब्रेरियन का कार्य किया।

वहॉ से फिर ये इथियोपिया चली गयीं और वहॉ एडिस अबाबा यूनिवर्सिटी के इन्स्टीट्यूट औफ़ इथियोपियन स्टडीज़ की लाइब्रेरी में 3 साल कार्य किया। तत्पश्चात इनको दक्षिणी अफ्रीका के एक देश़ लिसोठो के विश्वविद्यालय में इन्स्टीट्यूट औफ़ सदर्न अफ्रीकन स्टडीज़ में 1 साल कार्य करने का अवसर मिला। वहॉ से 1993 में ये यू ऐस ए आगयीं जहॉ इन्होंने फिर से मास्टर औफ़ लाइब्रेरी ऐंड इनफौर्मेशन साइन्स किया। फिर 4 साल ओटोमोटिव इन्डस्ट्री एक्शन ग्रुप के पुस्तकालय में कार्य किया।

1998 में इन्होंने सेवा निवृत्ति ले ली और अपनी एक वेब साइट बनायी- www.sushmajee.com <http://www.sushmajee.com>। तब से ये उसी वेब साइट पर काम कर रहीं हैं। उस वेब साइट में हिन्दू धर्म के साथ साथ बच्चों के लिये भी काफी सामग्री है।

भिन्न भिन्न देशों में रहने से इनको अपने कार्यकाल में वहॉ की बहुत सारी लोक कथाओं को जानने का अवसर मिला- कुछ पढ़ने से, कुछ लोगों से सुनने से और कुछ ऐसे साधनों से जो केवल इन्हीं को उपलब्ध थे। उन सबको देखकर इनको ऐसा लगा कि ये लोक कथाएँ हिन्दी जानने वाले बच्चों और हिन्दी में रिसर्च करने वालों को तो कभी उपलब्ध ही नहीं हो पायेंगी- हिन्दी की तो बात ही अलग है अंग्रेजी में भी नहीं मिल पायेंगीं.

इसलिये इन्होंने न्यूनतम हिन्दी पढ़ने वालों को ध्यान में रखते हुए उन लोक कथाओं को हिन्दी में लिखना पा्ररम्भ किया। इन लोक कथाओं में अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिका के देशों की लोक कथाओं पर अधिक ध्यान दिया गया है पर उत्तरी अमेरिका और यूरोप के देशों की भी कुछ लोक कथाएँ सम्मिलित कर ली गयी हैं।

अभी तक 1200 से अधिक लोक कथाएँ हिन्दी में लिखी जा चुकी है। इनको "देश विदेश की लोक कथाएँ" क्रम में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि इस प्रकाशन के माध्यम से हम इन लोक कथाओं को जन जन तक पहॅुचा सकेंगे.

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  1. नमस्कार-श्री सु‍षमा गुप्ताजी को बधाइयां. उन्होंने कड़ी मेहनत से इन विलुप्त होती जा रही लोककथाओं को खोजा और संरक्षित किया. इसी तरह भारत में भी अनेकानेक कथाएं हैं,जिन्हें संरक्षित किया जाना चाहिए. आपको साधुवाद.

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