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इथियोपिया की लोक कथाएँ - 1 // 6 नौ भाई // सुषमा गुप्ता

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एक बार की बात है कि एक गाँव में नौ भाई अपनी माँ के साथ रहते थे। वे सब के सब बहुत ही बेवकूफ थे।

एक बार किसी दूसरे देश ने उनके देश पर हमला कर दिया और दोनों देशों में लड़ाई छिड़ गई। तो इन नौ भाइयों ने मिल कर फैसला किया कि वे सब सेना में भरती हो कर अपने देश की रक्षा के लिये लड़ेंगे।

तो उनकी माँ ने उनको समझाया - "मेरे बच्चों, तुम लोग वहाँ जा तो रहे हो मगर सावधानी से रहना। अगर तुम लोग एक साथ रहोगे तो सुरक्षित रहोगे पर अगर तुम लोग अलग अलग हो गये तो तुम लोगों को कभी भी कोई भी नुकसान पहुंच सकता है।"

उन्होंने माँ की यह बात गाँठ बाँध ली और सबने एक साथ रहने का वायदा किया। फिर सबने अपने अपने कपड़े लिये, रास्ते के लिये कुछ खाना साथ में लिया और चल दिये सेना में भरती होने के लिये।

चलते चलते कुछ देर के बाद ही सबसे बड़ा भाई रुक गया और बोला - "जरा रुको, हम देख तो लें कि हम सब यहाँ मौजूद हैं कि नहीं क्योंकि चलते समय हमारी माँ ने कहा था कि सब साथ ही रहना।"

सो उसने सबको गिनना शुरू किया- एक, दो, तीन, चार, पाँच, छह, सात और यह आठ। और एक कहाँ रह गया? हम तो नौ भाई साथ चले थे।"

उसने फिर गिना, एक, दो, तीन, चार, पाँच, छह, सात और यह आठ। वह बार बार सबको गिनता था पर उसकी गिनती आठ से आगे बढ़ ही नहीं पाती थी।

वह बहुत परेशान हुआ और बोला - "यह तो बड़ी गड़बड़ हो गयी। हम लोग तो नौ भाई घर से चले थे और अब हम लोगों में से केवल आठ ही हैं। हम लोगों में से एक गायब है। कहाँ जा सकता है वह? मैं बार बार गिनता हूं पर मैं केवल आठ तक ही गिन पाता हूं।"

दूसरे भाइयों ने भी कोशिश की परन्तु वे भी आठ तक ही गिन पाये। असल में हर भाई अपने सब भाइयों को तो गिनता था पर अपने आपको गिनना भूल जाता था।

सभी भाई बहुत दुखी और परेशान थे। एक बोला - "कहीं हममें से एक किसी पहाड़ी से नीचे तो नहीं गिर गया?"

दूसरा बोला - "हो सकता है रास्ते में उसे कोई शेर खा गया हो।"

तीसरा बोला - "या फिर उसे साँप ने काट लिया हो।"

वे थक कर सड़क के किनारे लगे एक पेड़ के नीचे बैठ गये। वे सोच ही नहीं पा रहे थे कि वे करें तो क्या करें। बिना अपने नवें भाई को ढूंढे वे आगे नहीं बढ़ सकते थे क्योंकि माँ के कहे अनुसार अब उन पर कोई भी आफत आ सकती थी।

कुछ समय बाद वहाँ से एक अक्लमन्द आदमी गुजरा। उसने देखा कि नौ नौजवान लड़के एक पेड़ के नीचे मुंह लटकाये बैठे हैं। उसको यह कुछ अटपटा सा लगा सो वह रुक गया और उनसे पूछा - "बच्चों, तुम लोग इस तरह से मुंह लटकाये क्यों बैठे हो? क्या तुम्हारा कुछ खो गया है?"

सबसे बड़ा भाई बोला - "हाँ, हमारा एक भाई खो गया है और वह हमको मिल नहीं रहा है। हम लोग उसी की वजह से परेशान हैं। हम लोग जब घर से चले थे तो हम नौ भाई थे अब हम केवल आठ हैं। एक पता नहीं कहाँ खो गया है।"

उस आदमी ने उन सबको एक नजर देखा और मुस्कुरा कर बोला - "अगर मैं तुम्हारे इस खोये हुए भाई को ढूंढ दूं तो तुम मुझे क्या दोगे?"

वे बोले - "हम अपना सारा खाना तुमको दे देंगे। तुम हमारा भाई ढूंढ दो।"

उस आदमी ने उन सबको एक लाइन में खड़ा कर दिया और सबको एक एक करके गिना तो वे पूरे नौ थे। सभी भाई यह देख कर बहुत खुश हुए। खुशी खुशी उन्होंने अपना सारा खाना उस आदमी को दे दिया।

वह आदमी भी उन भाइयों की बेवकूफी पर मन ही मन हंसता हुआ उनका खाना ले कर अपने रास्ते चला गया और उधर वे भाई भी खुशी खुशी सेना में भरती होने चले गये।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं.

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सुषमा गुप्ता का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में सन् 1943 में हुआ था। इन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र में ऐम ए किया और फिर मेरठ विश्वविद्यालय से बी ऐड किया। 1976 में ये नाइजीरिया चली गयीं। वहां इन्होंने यूनिवर्सिटी औफ़ इबादान से लाइब्रेरी साइन्स में ऐम ऐल ऐस किया और एक थियोलोजीकल कौलिज में 10 वर्षों तक लाइब्रेरियन का कार्य किया।

वहां से फिर ये इथियोपिया चली गयीं और वहां एडिस अबाबा यूनिवर्सिटी के इन्स्टीट्यूट औफ़ इथियोपियन स्टडीज़ की लाइब्रेरी में 3 साल कार्य किया। तत्पश्चात इनको दक्षिणी अफ्रीका के एक देश़ लिसोठो के विश्वविद्यालय में इन्स्टीट्यूट औफ़ सदर्न अफ्रीकन स्टडीज़ में 1 साल कार्य करने का अवसर मिला। वहॉ से 1993 में ये यू ऐस ए आगयीं जहॉ इन्होंने फिर से मास्टर औफ़ लाइब्रेरी ऐंड इनफौर्मेशन साइन्स किया। फिर 4 साल ओटोमोटिव इन्डस्ट्री एक्शन ग्रुप के पुस्तकालय में कार्य किया।

1998 में इन्होंने सेवा निवृत्ति ले ली और अपनी एक वेब साइट बनायी- www.sushmajee.com <http://www.sushmajee.com>। तब से ये उसी वेब साइट पर काम कर रहीं हैं। उस वेब साइट में हिन्दू धर्म के साथ साथ बच्चों के लिये भी काफी सामग्री है।

भिन्न भिन्न देशों में रहने से इनको अपने कार्यकाल में वहॉ की बहुत सारी लोक कथाओं को जानने का अवसर मिला- कुछ पढ़ने से, कुछ लोगों से सुनने से और कुछ ऐसे साधनों से जो केवल इन्हीं को उपलब्ध थे। उन सबको देखकर इनको ऐसा लगा कि ये लोक कथाएँ हिन्दी जानने वाले बच्चों और हिन्दी में रिसर्च करने वालों को तो कभी उपलब्ध ही नहीं हो पायेंगी- हिन्दी की तो बात ही अलग है अंग्रेजी में भी नहीं मिल पायेंगीं.

इसलिये इन्होंने न्यूनतम हिन्दी पढ़ने वालों को ध्यान में रखते हुए उन लोक कथाओं को हिन्दी में लिखना पा्ररम्भ किया। इन लोक कथाओं में अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिका के देशों की लोक कथाओं पर अधिक ध्यान दिया गया है पर उत्तरी अमेरिका और यूरोप के देशों की भी कुछ लोक कथाएँ सम्मिलित कर ली गयी हैं।

अभी तक 1200 से अधिक लोक कथाएँ हिन्दी में लिखी जा चुकी है। इनको "देश विदेश की लोक कथाएँ" क्रम में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि इस प्रकाशन के माध्यम से हम इन लोक कथाओं को जन जन तक पहुंचा सकेंगे.

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