गुरुवार, 3 अगस्त 2017

इथियोपिया की लोक कथाएँ - 1 // 7 नौ बेवकूफ भाई // सुषमा गुप्ता

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एक बार की बात है कि एक पहाड़ी पर नौ भाई रहते थे। कुछ दिनों बाद वे मैदान में जा कर बस गये। एक दिन वे उसी पहाड़ी की तरफ गये जहाँ वे पहले रहते थे और वहाँ से उन्होंने कुछ लोगों के जानवर चुरा लिये और उनको ले कर घर वापस लौटने लगे।

जब उन जानवरों के मालिकों को पता चला कि कुछ लोग उनके जानवर चुरा कर ले गये हैं तो उन्होंने घोड़ों पर सवार हो कर उनका पीछा किया और बीच रास्ते में ही उनको पकड़ लिया।

हालाँकि उन भाइयों ने उन जानवरों के मालिकों को अपना पीछा करते हुए देख लिया था फिर भी उनमें से न तो कोई बोला और न ही किसी ने पीछे मुड़ कर देखा क्योंकि उनको अपनी बहादुरी पर पूरा विश्वास था कि वे उनके जानवर भगा कर ले जायेंगे।

उधर कुछ देर तक तो उन मालिकों ने अपने भालों के बल पर जानवरों को वापस लेने का विचार किया पर फिर उन्हें अपनी बेवकूफी का ध्यान हो आया और उन्होंने आपस में बिना जानवरों को लिये ही वापस लौट जाने का विचार किया।

परन्तु उनमें से एक आदमी ने उनकी बात नहीं मानी और बोला - "नहीं, मैं यह बात नहीं मानता। कोशिश करने में कोई हर्ज नहीं है। मुझे उनके तौर तरीके ठीक नहीं लग रहे हैं। उनसे चल कर लड़ते हैं और फिर देखते हैं कि क्या होता है।"

ऐसा सोच कर वे उनके पीछे पीछे चलने लगे। आगे आगे नौ भाई उन जानवरों को ले कर बड़ी लापरवाही से चले जा रहे थे।

इतने में जानवरों के उस बहादुर मालिक ने अपने घोड़े को एड़ लगायी और उन भाइयों के बीच में पहुंचना चाहा परन्तु वह उनसे कुछ ज़्यादा ही आगे निकल गया इसलिये उसको फिर पीछे आना पड़ा।

जब वह वापस आ रहा था तो बीच में उन नौ भाइयों में से सबसे पीछे चलने वाले भाई से टकरा गया और वह भाई गिर कर मर गया।

आगे चलने वाले भाई क्योंकि पीछे मुड़ कर देख ही नहीं रहे थे इसलिये उनको पता ही नहीं चला कि उनका एक भाई मर गया है।

यह देख कर जानवरों के मालिक बहुत ही खुश हुए। जानवरों के दूसरे मालिक ने कहा - "मैं भी ऐसा ही करके देखता हूं।" वह भी उसी तरीके से गया और सबसे पीछे आने वाले आठवें भाई को मार कर आ गया। इस तरह उन्होंने चार भाइयों को मार डाला।

अब पाँच भाई बच रहे तो उनको लगा कि वे तो सब जुड़वाँ भाई जैसे एक जैसे लगते हैं सो उन्होंने सोचा कि अब की बार हम इन सबको एक साथ ही मार देते हैं।

बस फिर क्या था सब पहुंच गए अपने अपने भाले ले कर और सबने मिल कर बचे हुए उन पाँचों भाइयों को मार डाला और अपने अपने जानवर ले कर घर वापस आ गये।

इस तरह अपनी बेवकूफी से वे नौओं भाई मारे गये। अगर वे ठीक से सावधानीपूर्वक जानवरों को घर ले कर आते तो शायद वे न मरते।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं.

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सुषमा गुप्ता का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में सन् 1943 में हुआ था। इन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र में ऐम ए किया और फिर मेरठ विश्वविद्यालय से बी ऐड किया। 1976 में ये नाइजीरिया चली गयीं। वहां इन्होंने यूनिवर्सिटी औफ़ इबादान से लाइब्रेरी साइन्स में ऐम ऐल ऐस किया और एक थियोलोजीकल कौलिज में 10 वर्षों तक लाइब्रेरियन का कार्य किया।

वहां से फिर ये इथियोपिया चली गयीं और वहां एडिस अबाबा यूनिवर्सिटी के इन्स्टीट्यूट औफ़ इथियोपियन स्टडीज़ की लाइब्रेरी में 3 साल कार्य किया। तत्पश्चात इनको दक्षिणी अफ्रीका के एक देश़ लिसोठो के विश्वविद्यालय में इन्स्टीट्यूट औफ़ सदर्न अफ्रीकन स्टडीज़ में 1 साल कार्य करने का अवसर मिला। वहॉ से 1993 में ये यू ऐस ए आगयीं जहॉ इन्होंने फिर से मास्टर औफ़ लाइब्रेरी ऐंड इनफौर्मेशन साइन्स किया। फिर 4 साल ओटोमोटिव इन्डस्ट्री एक्शन ग्रुप के पुस्तकालय में कार्य किया।

1998 में इन्होंने सेवा निवृत्ति ले ली और अपनी एक वेब साइट बनायी- www.sushmajee.com <http://www.sushmajee.com>। तब से ये उसी वेब साइट पर काम कर रहीं हैं। उस वेब साइट में हिन्दू धर्म के साथ साथ बच्चों के लिये भी काफी सामग्री है।

भिन्न भिन्न देशों में रहने से इनको अपने कार्यकाल में वहॉ की बहुत सारी लोक कथाओं को जानने का अवसर मिला- कुछ पढ़ने से, कुछ लोगों से सुनने से और कुछ ऐसे साधनों से जो केवल इन्हीं को उपलब्ध थे। उन सबको देखकर इनको ऐसा लगा कि ये लोक कथाएँ हिन्दी जानने वाले बच्चों और हिन्दी में रिसर्च करने वालों को तो कभी उपलब्ध ही नहीं हो पायेंगी- हिन्दी की तो बात ही अलग है अंग्रेजी में भी नहीं मिल पायेंगीं.

इसलिये इन्होंने न्यूनतम हिन्दी पढ़ने वालों को ध्यान में रखते हुए उन लोक कथाओं को हिन्दी में लिखना पा्ररम्भ किया। इन लोक कथाओं में अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिका के देशों की लोक कथाओं पर अधिक ध्यान दिया गया है पर उत्तरी अमेरिका और यूरोप के देशों की भी कुछ लोक कथाएँ सम्मिलित कर ली गयी हैं।

अभी तक 1200 से अधिक लोक कथाएँ हिन्दी में लिखी जा चुकी है। इनको "देश विदेश की लोक कथाएँ" क्रम में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि इस प्रकाशन के माध्यम से हम इन लोक कथाओं को जन जन तक पहुंचा सकेंगे.

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