गुरुवार, 3 अगस्त 2017

इथियोपिया की लोक कथाएँ - 1 // 9 बेवकूफ गधा // सुषमा गुप्ता

image

इथियोपिया के उत्तरपूर्वी प्रदेश टिगरे में एक नमक का व्यापारी रहता था। यहाँ नमक बहुत होता है तो लोग वहाँ जाते हैं और नमक काट कर ले आते हैं। फिर उसको देश के दूसरे हिस्सों में ऊंचे दामों पर बेच देते हैं। यह व्यापारी भी यही करता था।

टिगरे में रेगिस्तान भी काफी था इसलिए गधों को उस रेगिस्तान में चलने में बहुत परेशानी होती थी। उस व्यापारी के कई गधों में से एक गधे को यह परेशानी कुछ जरा ज़्यादा ही महसूस होती थी।

जब नमक पीठ पर लाद कर उसको रेगिस्तान से गुजरना होता था या पहाड़ी के ऊंचे नीचे रास्तों पर चलना होता था तब तो उसको बस अपनी नानी याद आ जाती थी।

जब ये लोग रेगिस्तान की तरफ जाते थे तो रास्ते में एक नदी भी पड़ती थी। बारिश के मौसम में यह नदी बहुत बड़ी हो जाती थी। एक बार वह नदी खूब चढ़ी हुई थी और वह गधा अपनी पीठ पर नमक का बोझ रख कर उसे पार कर रहा था।

[ads-post]

जब वह बीच नदी में पहुंचा तो पानी के तेज़ बहाव की वजह से उसका पैर फिसल गया और वह गिर पड़ा। बड़ी मुश्किल से उठ कर उसने वह नदी पार की।

पर इस बीच उसने महसूस किया कि गिरने के बाद से उसका बोझ काफी हलका हो गया है। इससे वह बहुत खुश हुआ।

अगले महीने वह व्यापारी फिर से नमक लेने आया। जब वह नमक ले कर वापस जा रहा था तो उस नदी के पास से गुजरते समय उस गधे को अपनी पुरानी घटना याद आ गयी।

इस बार वह जान बूझ कर नदी में गिर पड़ा और जब वह नदी के किनारे पर पहुंचा तो फिर हलका हो गया था। उसको यह तरीका बहुत पसन्द आया और उसने इस तरीके को बार बार इस्तेमाल करने का फैसला कर लिया।

इधर व्यापारी ताड़ गया कि पिछली बार तो यह गधा सचमुच में ही नदी में फिसल गया था पर इस बार इसने मेरे साथ चालाकी खेली है सो उसने गधे को सबक सिखाने का फैसला कर लिया।

अगली बार जब वह नमक लाने गया तो उसने उस गधे के थैलों में बजाय नमक के मिट्टी भर कर उसके ऊपर लाद दी।

अब मिट्टी तो भारी होती है तो गधे ने इस बार थैले भारी तो महसूस किये पर वे उसको इस लिये भारी नहीं लग रहे थे क्योंकि वह सोच रहा था कि वह फिर से उस नदी में डुबकी लगा कर अपना बोझ हलका कर लेगा।

जब वह नदी में पहुंचा तो उसने वैसा ही किया। वह नदी में गिर पड़ा। पर यह क्या? पिछली बार तो वह पानी में से आसानी से उठ गया था पर इस बार तो उससे हिला भी नहीं जा रहा था।

उधर व्यापारी नदी के पास खड़ा खड़ा सोच रहा था कि इस बार गधे को अच्छा सबक मिलेगा। जब गधा कोशिश करने पर भी न उठ सका तो व्यापारी नदी के बीच में गया, उसकी पीठ से मिट्टी के थैले उतारे, तब जा कर वह कहीं उठ सका। वह गधा बेचारा मालिक के सामने सिर झुकाये खड़ा था।

मालिक ने उसको थपथपाया और फिर से नमक लाने चल दिया। उस दिन के बाद गधे ने फिर कभी ऐसा काम नहीं किया। वह अब बहुत ही वफादार गधा हो गया था।

---------

सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं.

--

सुषमा गुप्ता का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में सन् 1943 में हुआ था। इन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र में ऐम ए किया और फिर मेरठ विश्वविद्यालय से बी ऐड किया। 1976 में ये नाइजीरिया चली गयीं। वहां इन्होंने यूनिवर्सिटी औफ़ इबादान से लाइब्रेरी साइन्स में ऐम ऐल ऐस किया और एक थियोलोजीकल कौलिज में 10 वर्षों तक लाइब्रेरियन का कार्य किया।

वहां से फिर ये इथियोपिया चली गयीं और वहां एडिस अबाबा यूनिवर्सिटी के इन्स्टीट्यूट औफ़ इथियोपियन स्टडीज़ की लाइब्रेरी में 3 साल कार्य किया। तत्पश्चात इनको दक्षिणी अफ्रीका के एक देश़ लिसोठो के विश्वविद्यालय में इन्स्टीट्यूट औफ़ सदर्न अफ्रीकन स्टडीज़ में 1 साल कार्य करने का अवसर मिला। वहॉ से 1993 में ये यू ऐस ए आगयीं जहॉ इन्होंने फिर से मास्टर औफ़ लाइब्रेरी ऐंड इनफौर्मेशन साइन्स किया। फिर 4 साल ओटोमोटिव इन्डस्ट्री एक्शन ग्रुप के पुस्तकालय में कार्य किया।

1998 में इन्होंने सेवा निवृत्ति ले ली और अपनी एक वेब साइट बनायी- www.sushmajee.com <http://www.sushmajee.com>। तब से ये उसी वेब साइट पर काम कर रहीं हैं। उस वेब साइट में हिन्दू धर्म के साथ साथ बच्चों के लिये भी काफी सामग्री है।

भिन्न भिन्न देशों में रहने से इनको अपने कार्यकाल में वहॉ की बहुत सारी लोक कथाओं को जानने का अवसर मिला- कुछ पढ़ने से, कुछ लोगों से सुनने से और कुछ ऐसे साधनों से जो केवल इन्हीं को उपलब्ध थे। उन सबको देखकर इनको ऐसा लगा कि ये लोक कथाएँ हिन्दी जानने वाले बच्चों और हिन्दी में रिसर्च करने वालों को तो कभी उपलब्ध ही नहीं हो पायेंगी- हिन्दी की तो बात ही अलग है अंग्रेजी में भी नहीं मिल पायेंगीं.

इसलिये इन्होंने न्यूनतम हिन्दी पढ़ने वालों को ध्यान में रखते हुए उन लोक कथाओं को हिन्दी में लिखना पा्ररम्भ किया। इन लोक कथाओं में अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिका के देशों की लोक कथाओं पर अधिक ध्यान दिया गया है पर उत्तरी अमेरिका और यूरोप के देशों की भी कुछ लोक कथाएँ सम्मिलित कर ली गयी हैं।

अभी तक 1200 से अधिक लोक कथाएँ हिन्दी में लिखी जा चुकी है। इनको "देश विदेश की लोक कथाएँ" क्रम में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि इस प्रकाशन के माध्यम से हम इन लोक कथाओं को जन जन तक पहुंचा सकेंगे.

---------

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------