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इथियोपिया की लोक कथाएँ - 2 // 13 झूठी कसम खाने का फल // सुषमा गुप्ता

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एक बार इथियोपिया के एक गाँव में दो पड़ोसी रहते थे। दोनों ही जानवर पाल कर अपना गुजारा करते थे।

एक बार उन दोनों में झगड़ा हो गया और उस झगड़े में उनमें से एक आदमी मारा गया तो दूसरे आदमी ने उसके जानवर चुरा लिये।

जो आदमी मारा गया था उसके रिश्तेदार ने दूसरे आदमी के रिश्तेदारों से कहा कि मारने वाला आदमी उनके गाँव में रहता है और उस गाँव के नियमों के अनुसार खून के बदले में कुछ न कुछ देना होता था।

इसलिये एक दिन तय किया गया कि जिस दिन सब लोग इकठ्ठा हों और इस खून का फैसला हो। दिन तय हुआ और सब लोग उस दिन मारने वाले के गाँव में जमा हुए।

मारने वाले के गाँव के बड़े लोग बोले - "आप लोग बिल्कुल चिन्ता न करें हम मारने वाले आदमी को अभी यहाँ ले कर आते हैं।"

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वे गये और मारने वाले की बजाय किसी सीधे सादे आदमी को पकड़ कर वहाँ ले आये जो इस खून के बारे में कुछ भी नहीं जानता था और न ही किसी के घर में कोई काम करता था।

मारने वाले के रिश्तेदारों ने उसे एक अँगूठी पहनायी, तेल लगा कर उसके बाल सँवारे, हाथ में एक भाला थमाया और उसको वहाँ ले आये। इस सबने तो उसकी शक्ल ही बदल दी थी

मरने वाले के पिता ने पूछा - "क्यों भाई, क्या तुम ही वह आदमी हो जिसने मेरे बेटे को मारा है?"

वह आदमी बोला - "जी हाँ।"

पिता ने फिर पूछा - "जब तुमने उसको भाला मारा था तब वह आगे की तरफ गिरा था या पीछे की तरफ?" इस पर वह आदमी चुप रहा।

पिता ने फिर पूछा - "तुमने भाला उसके पेट में मारा था या पीठ में?"

वह आदमी इस पर भी चुप रहा। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह इन सवालों के क्या जवाब दे क्योंकि उसने तो उस आदमी को देखा भी नहीं था मारना तो दूर।

परन्तु वह यह कह भी नहीं सकता था क्योंकि वह पहले ही यह कह चुका था कि खून उसी ने किया है।

पिता ने फिर कहा - "ऐसा लगता है कि आप लोग हमें धोखा देने के लिये इस सीधे सादे आदमी को यहाँ ले आये हैं। अगर आप लोग मेरे पास किसी घसियारे के लड़के को लाते, या पनिहारे के लड़के को लाते तो मैं उसको कहता कि कसम खाओ कि आज से तुम पीढ़ी दर पीढ़ी तक सबके लिये घास काटते रहोगे या पानी भरते रहोगे। पर इसको मैं क्या कहूँ?

पर हमारे गाँव के आदमी के खून के बदले में आप लोगों को कुछ तो देना ही पड़ेगा इसलिये अब यह कसम आप सबको खानी पड़ेगी।"

ऐसा कह कर उस पिता ने मारने वाले की तरफ के सब लोगों को एक काले बैल के बराबर में खड़ा करके कसम दिलायी - "हम आज से कसम खाते हैं कि जो काम हम आज कर रहे हैं वही काम हम पीढ़ी दर पीढ़ी तक सबके लिये करते रहेंगे।"

इसी वजह से उसग् गाँव के लोगों के बच्चे, उनके बच्चों के बच्चे, उनके बच्चों के बच्चों के बच्चे सभी पीढ़ी दर पीढ़ी तक वही काम सब लोगों के लिये करते चले आ रहे हैं जो वे उस समय कर रहे थे।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं.

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सुषमा गुप्ता का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में सन् 1943 में हुआ था। इन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र में ऐम ए किया और फिर मेरठ विश्वविद्यालय से बी ऐड किया। 1976 में ये नाइजीरिया चली गयीं। वहां इन्होंने यूनिवर्सिटी औफ़ इबादान से लाइब्रेरी साइन्स में ऐम ऐल ऐस किया और एक थियोलोजीकल कौलिज में 10 वर्षों तक लाइब्रेरियन का कार्य किया।

वहां से फिर ये इथियोपिया चली गयीं और वहां एडिस अबाबा यूनिवर्सिटी के इन्स्टीट्यूट औफ़ इथियोपियन स्टडीज़ की लाइब्रेरी में 3 साल कार्य किया। तत्पश्चात इनको दक्षिणी अफ्रीका के एक देश़ लिसोठो के विश्वविद्यालय में इन्स्टीट्यूट औफ़ सदर्न अफ्रीकन स्टडीज़ में 1 साल कार्य करने का अवसर मिला। वहॉ से 1993 में ये यू ऐस ए आगयीं जहां इन्होंने फिर से मास्टर औफ़ लाइब्रेरी ऐंड इनफौर्मेशन साइन्स किया। फिर 4 साल ओटोमोटिव इन्डस्ट्री एक्शन ग्रुप के पुस्तकालय में कार्य किया।

1998 में इन्होंने सेवा निवृत्ति ले ली और अपनी एक वेब साइट बनायी- www.sushmajee.com <http://www.sushmajee.com>। तब से ये उसी वेब साइट पर काम कर रहीं हैं। उस वेब साइट में हिन्दू धर्म के साथ साथ बच्चों के लिये भी काफी सामग्री है।

भिन्न भिन्न देशों में रहने से इनको अपने कार्यकाल में वहॉ की बहुत सारी लोक कथाओं को जानने का अवसर मिला- कुछ पढ़ने से, कुछ लोगों से सुनने से और कुछ ऐसे साधनों से जो केवल इन्हीं को उपलब्ध थे। उन सबको देखकर इनको ऐसा लगा कि ये लोक कथाएँ हिन्दी जानने वाले बच्चों और हिन्दी में रिसर्च करने वालों को तो कभी उपलब्ध ही नहीं हो पायेंगी- हिन्दी की तो बात ही अलग है अंग्रेजी में भी नहीं मिल पायेंगीं.

इसलिये इन्होंने न्यूनतम हिन्दी पढ़ने वालों को ध्यान में रखते हुए उन लोक कथाओं को हिन्दी में लिखना पा्ररम्भ किया। इन लोक कथाओं में अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिका के देशों की लोक कथाओं पर अधिक ध्यान दिया गया है पर उत्तरी अमेरिका और यूरोप के देशों की भी कुछ लोक कथाएँ सम्मिलित कर ली गयी हैं।

अभी तक 1200 से अधिक लोक कथाएँ हिन्दी में लिखी जा चुकी है। इनको "देश विदेश की लोक कथाएँ" क्रम में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि इस प्रकाशन के माध्यम से हम इन लोक कथाओं को जन जन तक पहुंचा सकेंगे.

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