शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

इथियोपिया की लोक कथाएँ - 2 // 14 दो यात्री // सुषमा गुप्ता

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एक सुबह की बात है कि एक व्यापारी एक गधे पर सवार हो कर एक शहर से दूसरे शहर की ओर जा रहा था। रास्ते में उसे एक और यात्री मिल गया जो उसी शहर को जा रहा था। क्योंकि दोनों को एक ही शहर जाना था सो दोनों साथ साथ ही चलने लगे।

यात्री सारी सुबह केवल अपने ही बारे में बातें करता रहा - "मैं एक बहुत ही अच्छा लड़ने वाला हूँ। मैं अपने शहर का सबसे ज़्यादा ताकतवर और बहादुर आदमी हूँ। कुछ हफ्ते पहले मैंने अपने हाथों से एक शेर मारा था। मैंने बहादुरी के और भी बहुत सारे काम किये हैं।

बहादुर होने के अलावा मैं अक्लमन्द भी बहुत हूँ। यहाँ तक कि अपने शहर के सारे अक्लमन्दों से भी अक्लमन्द हूँ। जब भी राजा को किसी सलाह की जरूरत पड़ती है तो वह हमेशा मुझसे ही सलाह लेता है। मैं ही उसको सलाह देता हूँ।"

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व्यापारी उसकी ये बातें सुनता रहा परन्तु बोला कुछ भी नहीं। वे लोग सारी सुबह गधों पर सवार चलते रहे। थोड़ी देर बाद यात्री बोला - "हम लोग थोड़ी ही देर में शहर पहुँचने वाले हैं। हम लोग तीन घंटे तो चल ही चुके हैं।"

दोपहर को वे दोनों शहर पहुँच गये। दोनों बहुत भूखे थे सो एक छोटे से होटल में घुस गये और एक खाली मेज देख कर उस पर जा कर बैठ गये।

उनको मेज पर बैठा देख कर एक वेटर वहाँ आया और बोला - "आप लोगों का यहाँ स्वागत है। आज हमारे पास बहुत ही स्वाददार वत बना है। क्या आप लोगों ने हमारे होटल का वत पहले कभी खाया है?"

वत की तारीफ सुन कर दोनों ने उसको वत लाने के लिये कहा। कुछ ही मिनटों में वेटर लौट आया। वह एक बड़ी प्लेट में वत और दूसरी प्लेट में कुछ इन्जिरा ले आया था। वे दोनों प्लेटें ला कर उसने उन दोनों के सामने रख दीं।

पहले यात्री ने खाना शुरू किया। वह वत इतना ज़्यादा चटपटा था कि यात्री की आँखों से पाने बहने लगा।

व्यापारी ने पूछा - "दोस्त, तुम रोते क्यों हो?"

यात्री सच बताने में शरमा रहा था इसलिये उसने झूठ बोल दिया। वह बोला - "मैं अपने गरीब भाई के बारे में सोच रहा था। गाँव वालों ने पिछले ही हफ्ते उसको फाँसी पर चढ़ा दिया था। उन्होंने कहा कि वह चोर था परन्तु यह सच नहीं था। मुझे उसी का ख्याल आ गया और मैं रो पड़ा।"

व्यापारी बोला - "सुन कर बहुत दुख हुआ। मुझे यकीन है कि वह जरूर ही अच्छा आदमी रहा होगा।"

इसके बाद व्यापारी ने वत खाया तो उसको भी वह वत कुछ ज़्यादा ही चटपटा लगा और उसकी आँखों से भी पानी बहने लगा।

यात्री ने पूछा - "दोस्त, तुम्हारे रोने की वजह क्या है?"

व्यापारी बोला - "दोस्त, मैं इसलिये रो रहा हूँ कि तुम अपने भाई के साथ फाँसी पर नहीं चढ़ा दिये गये।"

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं.

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सुषमा गुप्ता का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में सन् 1943 में हुआ था। इन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र में ऐम ए किया और फिर मेरठ विश्वविद्यालय से बी ऐड किया। 1976 में ये नाइजीरिया चली गयीं। वहां इन्होंने यूनिवर्सिटी औफ़ इबादान से लाइब्रेरी साइन्स में ऐम ऐल ऐस किया और एक थियोलोजीकल कौलिज में 10 वर्षों तक लाइब्रेरियन का कार्य किया।

वहां से फिर ये इथियोपिया चली गयीं और वहां एडिस अबाबा यूनिवर्सिटी के इन्स्टीट्यूट औफ़ इथियोपियन स्टडीज़ की लाइब्रेरी में 3 साल कार्य किया। तत्पश्चात इनको दक्षिणी अफ्रीका के एक देश़ लिसोठो के विश्वविद्यालय में इन्स्टीट्यूट औफ़ सदर्न अफ्रीकन स्टडीज़ में 1 साल कार्य करने का अवसर मिला। वहॉ से 1993 में ये यू ऐस ए आगयीं जहां इन्होंने फिर से मास्टर औफ़ लाइब्रेरी ऐंड इनफौर्मेशन साइन्स किया। फिर 4 साल ओटोमोटिव इन्डस्ट्री एक्शन ग्रुप के पुस्तकालय में कार्य किया।

1998 में इन्होंने सेवा निवृत्ति ले ली और अपनी एक वेब साइट बनायी- www.sushmajee.com <http://www.sushmajee.com>। तब से ये उसी वेब साइट पर काम कर रहीं हैं। उस वेब साइट में हिन्दू धर्म के साथ साथ बच्चों के लिये भी काफी सामग्री है।

भिन्न भिन्न देशों में रहने से इनको अपने कार्यकाल में वहॉ की बहुत सारी लोक कथाओं को जानने का अवसर मिला- कुछ पढ़ने से, कुछ लोगों से सुनने से और कुछ ऐसे साधनों से जो केवल इन्हीं को उपलब्ध थे। उन सबको देखकर इनको ऐसा लगा कि ये लोक कथाएँ हिन्दी जानने वाले बच्चों और हिन्दी में रिसर्च करने वालों को तो कभी उपलब्ध ही नहीं हो पायेंगी- हिन्दी की तो बात ही अलग है अंग्रेजी में भी नहीं मिल पायेंगीं.

इसलिये इन्होंने न्यूनतम हिन्दी पढ़ने वालों को ध्यान में रखते हुए उन लोक कथाओं को हिन्दी में लिखना पा्ररम्भ किया। इन लोक कथाओं में अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिका के देशों की लोक कथाओं पर अधिक ध्यान दिया गया है पर उत्तरी अमेरिका और यूरोप के देशों की भी कुछ लोक कथाएँ सम्मिलित कर ली गयी हैं।

अभी तक 1200 से अधिक लोक कथाएँ हिन्दी में लिखी जा चुकी है। इनको "देश विदेश की लोक कथाएँ" क्रम में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि इस प्रकाशन के माध्यम से हम इन लोक कथाओं को जन जन तक पहुंचा सकेंगे.

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