शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

इथियोपिया की लोक कथाएँ - 2 // 15 एक विद्यार्थी की कहानी // सुषमा गुप्ता

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बहुत पुरानी बात है कि किसी गाँव में एक स्कूल था। एक बार वहाँ के मास्टर जी ने बच्चों को कहा कि स्कूल में सब बच्चों को साफ कपड़े पहन कर आने हैं। पर बच्चों ने कहा कि वे साफ कपड़े नहीं पहन सकते थे क्योंकि उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि वे साफ कपड़े पहन सकते।

मास्टर जी बोले कि अगर तुम्हारे पास इतने पैसे नहीं हैं तो जाओ अपने अपने पिताओं को बेच दो और उनको बेच कर जो पैसे आयें उनसे नये कपड़े खरीद लो।

अब बच्चों के पास और कोई चारा नहीं था सो उन सबने अपने अपने पिताओं को बेच दिया और नये कपड़े खरीद लिये।

कुछ दिन बाद एक बार मास्टर जी ने फिर बच्चों को इकठ्ठा किया और बोले - "मेरे प्यारे बच्चों, तुम लोग अभी तक सब कुछ बहुत अच्छा करते रहे हो।

अब तुम लोगों को स्कूल के लिये एक काम और करना है वह यह कि घर जा कर तुम अपनी अपनी माताओं को बेच दो और उनके बेचने से जो पैसे मिलें उनसे बढ़िया घोड़े खरीद लो। अगर कोई भी विद्यार्थी इस काम को करने में पीछे रहेगा या हिचकिचायेगा तो उसे स्कूल से निकाल दिया जायेगा।"

बेचारे विद्यार्थी अपने अपने घर गये और उन्होंने अपनी अपनी माताओं को बेच कर घोड़े खरीद लिये।

अगले दिन सभी विद्यार्थी अपने अपने घोड़ों पर चढ़ कर स्कूल आये। उनमें से एक विद्यार्थी ने बहुत ही बढ़िया सफेद घोड़ा खरीदा था।

सभी विद्यार्थियों को उनके इस काम के लिये शाबाशी दी गयी परन्तु सफेद घोड़े वाले लड़के को खास शाबाशी मिली। और इस खास शाबाशी के बदले में उसकी स्कूल से छुट्टी कर दी गयी कि अब उसको और पढ़ाई करने की जरूरत नहीं थी।

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अब इस लड़के ने अपना घोड़ा उठाया और विदेश की यात्रा पर निकल पड़ा। काफी देर चलने के बाद उसे भूख लग आयी।

रास्ते में उसे एक हिरन मिल गया सो उसने उस हिरन को मार कर उसका माँस खा लिया। पर खाने के बाद उसे प्यास भी लगी पर पानी उसे कहीं दिखायी नहीं दिया। प्यास से उसका गला सूखा जा रहा था।

इतने में उसने देखा कि उसके घोड़े की गरदन से पसीना टपक रहा है। उसने घोड़े के पसीने को एक प्याले में इकठ्ठा किया और अपनी प्यास बुझायी। वह फिर अपनी यात्रा पर चल पड़ा।

रात गुजारने के लिये वह एक गाँव में रुका। एक झोंपड़ी में एक बुढ़िया रहती थी उसी बुढ़िया की झोंपड़ी में उसने रात गुजारने का निश्चय किया। खाना खा कर वे दोनों बातें करने लगे।

बातों बातों में लड़के ने पूछा - "माँ जी, क्या बात है यहाँ गाँव में कोई जवान लड़के नहीं दिखायी देते?"

बुढ़िया बोली - "क्या बताऊँ बेटा, इस गाँव में तो बहुत सारे जवान लड़के थे पर अब सब मरते जा रहे हैं।"

लड़का बोला - "कैसे माँ जी?"

बुढ़िया बोली - "इस गाँव में एक बहुत ही सुन्दर लड़की रहती है। उसने अपनी शादी के लिये एक शर्त रखी है कि जो कोई भी उससे शादी करना चाहता है वह उस लड़की से कोई पहेली पूछेगा।

अगर उस लड़की ने उसकी पहेली नहीं बूझी तब तो वह उससे शादी कर लेगी और अगर उसने उस लड़के की पहेली बूझ ली तो उस लड़के को मार दिया जायेगा।

बेटा, वह लड़की सुन्दर होने के साथ साथ होशियार भी बहुत है। अब तक 99 लड़के उसके पास अपनी पहेलियाँ ले कर पहुँच चुके हैं पर उसने उन सभी की पहेलियाँ बूझ दीं हैं। और वे सभी लड़के मारे जा चुके हैं। इसी लिये तुमको इस गाँव में जवान लड़के कम दिखायी देते हैं।"

यह कहानी सुन कर उस लड़के का मन हुआ कि वह भी उस लड़की को देखे जिस पर इतने लड़के कुर्बान हो चुके हैं।

वह बुढ़िया से बोला कि वह भी इन 99 लड़कों की गिनती में अपना नाम लिखवाना चाहता है जिससे कि उस पर मरने वालों की गिनती पूरी 100 हो जाये।

अगले दिन वह उस लड़की के पास गया और अपनी पहेली उसके सामने रखी - "कल मैं यात्रा में था। मैंने एक पवित्र चीज़ खायी और एक अपवित्र चीज़ पी। वे क्या चीज़ें हो सकती हैं?"

लड़की बोली - "तुम्हारा सवाल सुन्दर है, कल सुबह आ कर इसका जवाब ले जाना।"

शाम को उस लड़की ने एक लड़के का वेश बनाया और उस बुढ़िया के घर जा पहुँची जिसके घर में वह लड़का ठहरा हुआ था। दोनों ने उस लड़की का बहुत आदर किया और तीनों बहुत देर तक बातें करते रहे।

जब लड़के ने उसको बताया कि वह भी अपनी पहेली ले कर उस लड़की के पास गया था तो लड़की ने उस पहेली की बड़ी तारीफ की और दुआ की कि इस बार उसको जरूर जीत जाना चाहिये।

फिर उस लड़के की पहले दिन की यात्रा के बारे में बात हुई। बातों ही बातों में उस लड़की ने पता चला लिया कि कल उस लड़के ने हिरन का माँस खाया था और अपने घोड़े का पसीना पिया था।

इतनी सब बातें करते करते लड़के की नजर उस लड़की के सिर पर पड़ी तो उसको लगा कि उसके सिर पर बँधे कपड़े के नीचे तो बहुत सारे बाल हैं। उसको कुछ शक हो गया कि वह लड़का न हो कर कोई लड़की थी सो उसने चुपचाप उस लड़की के कुछ बाल काट लिये।

अगले दिन वह अपनी पहेली का जवाब लेने के लिये उस लड़की के घर गया। वह अब उस लड़की को तुरन्त ही पहचान गया कि कल यही लड़की लड़के के वेश में उसके घर आयी थी पर वह चुप रहा। पर उसको यह भी विश्वास था कि उसकी पहेली का जवाब देना आसान नहीं था।

जब वह उस लड़की के घर पहुँचा तो उस लड़की ने उसको तुरन्त ही उसकी पहेली का जवाब दे दिया कि उसने यात्रा में हिरन का माँस खाया था और घोड़े का पसीना पिया था। क्योंकि जवाब ठीक था इसलिये उस लड़के को मारने का हुकुम दे दिया गया।

जब वह लड़की जाने लगी तो वह लड़का बोला - "सभी मरने वालों से उनकी आखिरी इच्छा पूछी जाती है। क्या तुम मुझसे मेरी आखिरी इच्छा नहीं पूछोगी?"

लड़की मुस्कुरायी और बोली - "क्यों नहीं। बोलो नौजवान, तुम्हारी आखिरी इच्छा क्या है?"

लड़का बोला - "कल रात मेरे घर एक बहुत ही खूबसूरत चिड़िया आयी थी। किसी तरह मैंने उसके पंखों में से एक पंख निकाल लिया। मैं वह पंख उसको भेंट करना चाहता हूँ और एक बार उसके हाथों को अपने हाथों में ले कर चूमना चाहता हूँ।"

इतना कह कर उसने अपनी जेब से उस लड़की के कटे बाल निकाले और आगे बढ़ा दिये। लड़की ने जब बाल देखे तो तुरन्त समझ गयी कि वह हार चुकी है।

उसने तुरन्त ही अपने आदमियों को हुकुम दिया कि उसका पहला हुकुम रद्द किया जाता है और वे लोग जा सकते हैं।

दोनों की शादी हो गयी और वे आनन्दपूर्वक रहने लगे।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं.

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सुषमा गुप्ता का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में सन् 1943 में हुआ था। इन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र में ऐम ए किया और फिर मेरठ विश्वविद्यालय से बी ऐड किया। 1976 में ये नाइजीरिया चली गयीं। वहां इन्होंने यूनिवर्सिटी औफ़ इबादान से लाइब्रेरी साइन्स में ऐम ऐल ऐस किया और एक थियोलोजीकल कौलिज में 10 वर्षों तक लाइब्रेरियन का कार्य किया।

वहां से फिर ये इथियोपिया चली गयीं और वहां एडिस अबाबा यूनिवर्सिटी के इन्स्टीट्यूट औफ़ इथियोपियन स्टडीज़ की लाइब्रेरी में 3 साल कार्य किया। तत्पश्चात इनको दक्षिणी अफ्रीका के एक देश़ लिसोठो के विश्वविद्यालय में इन्स्टीट्यूट औफ़ सदर्न अफ्रीकन स्टडीज़ में 1 साल कार्य करने का अवसर मिला। वहॉ से 1993 में ये यू ऐस ए आगयीं जहां इन्होंने फिर से मास्टर औफ़ लाइब्रेरी ऐंड इनफौर्मेशन साइन्स किया। फिर 4 साल ओटोमोटिव इन्डस्ट्री एक्शन ग्रुप के पुस्तकालय में कार्य किया।

1998 में इन्होंने सेवा निवृत्ति ले ली और अपनी एक वेब साइट बनायी- www.sushmajee.com <http://www.sushmajee.com>। तब से ये उसी वेब साइट पर काम कर रहीं हैं। उस वेब साइट में हिन्दू धर्म के साथ साथ बच्चों के लिये भी काफी सामग्री है।

भिन्न भिन्न देशों में रहने से इनको अपने कार्यकाल में वहॉ की बहुत सारी लोक कथाओं को जानने का अवसर मिला- कुछ पढ़ने से, कुछ लोगों से सुनने से और कुछ ऐसे साधनों से जो केवल इन्हीं को उपलब्ध थे। उन सबको देखकर इनको ऐसा लगा कि ये लोक कथाएँ हिन्दी जानने वाले बच्चों और हिन्दी में रिसर्च करने वालों को तो कभी उपलब्ध ही नहीं हो पायेंगी- हिन्दी की तो बात ही अलग है अंग्रेजी में भी नहीं मिल पायेंगीं.

इसलिये इन्होंने न्यूनतम हिन्दी पढ़ने वालों को ध्यान में रखते हुए उन लोक कथाओं को हिन्दी में लिखना पा्ररम्भ किया। इन लोक कथाओं में अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिका के देशों की लोक कथाओं पर अधिक ध्यान दिया गया है पर उत्तरी अमेरिका और यूरोप के देशों की भी कुछ लोक कथाएँ सम्मिलित कर ली गयी हैं।

अभी तक 1200 से अधिक लोक कथाएँ हिन्दी में लिखी जा चुकी है। इनको "देश विदेश की लोक कथाएँ" क्रम में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि इस प्रकाशन के माध्यम से हम इन लोक कथाओं को जन जन तक पहुंचा सकेंगे.

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