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इथियोपिया की लोक कथाएँ - 2 // 16 बेवकूफ नौकर // सुषमा गुप्ता

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एक बार इथियोपिया की राजधानी एडिस अबाबा में दो आदमी रहते थे - जोसेफ और अबेबे। दोनों के पास एक एक नौकर था और दोनों के नौकर परले दरजे के बेवकूफ थे इसलिये दोनों के मालिक उनसे बहुत परेशान रहते थे।

एक दिन जोसेफ और अबेबे दोनों बाजार गये। दोनों बहुत दिनों बाद मिले थे सो दोनों में बहुत सारी बातें हुईं, अपनी खेती की, अपने परिवारों की, मौसम की आदि आदि। और फिर आखीर में बात आयी उनके बेवकूफ नौकरों की।

जोसेफ बोला - "मेरा नौकर तो इतना बेवकूफ है कि वह रोज मुर्गे की हड्डियाँ जमीन में गाड़ देता है और सोचता है कि इस तरह जमीन से एक दिन बहुत सारे मुर्गे उग आयेंगे।"

अबेबे बोला - "शायद मेरा नौकर तुम्हारे नौकर से ज़्यादा बेवकूफ है। वह सोचता है कि पेड़ों पर जब चिड़ियाँ शोर मचाती हैं बस तभी बारिश होती है वरना नहीं।"

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इस तरह वे बहुत देर तक अपने अपने नौकरों की बेवकूफियों के बारे में बात करते रहे और सोचते रहे कि किसका नौकर ज़्यादा बेवकूफ है। अन्त में उन दोनों ने अपने अपने नौकरों का इम्तिहान लेने का विचार किया।

जोसेफ बोला - "हम लोग इस समस्या को इस तरह हल करते हैं कि कल दोपहर को दो बजे तुम अपने नौकर को ले कर मेरे घर आ जाओ।

फिर हम लोग अपने अपने नौकरों को कोई बेवकूफी का काम करने को देंगे। जो भी उस काम को करेगा वही ज़्यादा बेवकूफ समझा जायेगा।"

अगले दिन दोपहर को दो बजे अबेबे अपने नौकर को ले कर जोसेफ के घर पहुँच गया। जैसे ही वह जोसेफ के घर में घुसा उस ने अपने नौकर से कहा - "अरे जरा घर दौड़ कर तो जाओ और देखो कि मैं घर में हूँ या नहीं? मैं अपने आपसे बात करना चाहता हूँ।" अबेबे का नौकर उलटे पैरों घर वापस दौड़ गया।

अबेबे के नौकर के जाने के बाद जोसेफ ने अपने नौकर से कहा - "यह एक डालर लो और मेरे लिये एक नयी कार खरीद लाओ।" अबेबे के नौकर ने पैसे लिये और कार खरीदने के लिये चल दिया।

कुछ घन्टों के बाद दोनों नौकर सड़क पर मिले। दोनों ही बहुत गुस्से में थे। जोसेफ का नौकर बोला - "मेरे बेवकूफ मालिक ने कहा है कि मैं उसके लिये एक नयी कार खरीदूँ और इसके लिये उसने मुझे कुछ पैसे भी दिये हैं। मैं ऐसे उसकी कार कैसे खरीदूँ। उसने मुझे कार का रंग तो बताया ही नहीं है कि उसको किस रंग की कार चाहिये।"

अबेबे का नौकर बोला - "मेरा मालिक तो इससे भी बड़ा बेवकूफ है। उसने मुझसे अपने घर जाने को कहा कि मैं वहाँ जा कर यह देखूँ कि वह वहाँ है कि नहीं।

क्या वह जोसेफ के घर से टेलीफोन करके यह बात मालूम नहीं कर सकता था कि वह वहाँ है कि नहीं? उफ़ कितना बेवकूफ है मेरा मालिक।" और दोनों घर चले गये।

कुछ दिनों बाद जोसेफ और अबेबे फिर मिले तो इसी नतीजे पर पहुँचे कि दोनों के नौकर बराबर के बेवकूफ हैं।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं.

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सुषमा गुप्ता का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में सन् 1943 में हुआ था। इन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र में ऐम ए किया और फिर मेरठ विश्वविद्यालय से बी ऐड किया। 1976 में ये नाइजीरिया चली गयीं। वहां इन्होंने यूनिवर्सिटी औफ़ इबादान से लाइब्रेरी साइन्स में ऐम ऐल ऐस किया और एक थियोलोजीकल कौलिज में 10 वर्षों तक लाइब्रेरियन का कार्य किया।

वहां से फिर ये इथियोपिया चली गयीं और वहां एडिस अबाबा यूनिवर्सिटी के इन्स्टीट्यूट औफ़ इथियोपियन स्टडीज़ की लाइब्रेरी में 3 साल कार्य किया। तत्पश्चात इनको दक्षिणी अफ्रीका के एक देश़ लिसोठो के विश्वविद्यालय में इन्स्टीट्यूट औफ़ सदर्न अफ्रीकन स्टडीज़ में 1 साल कार्य करने का अवसर मिला। वहॉ से 1993 में ये यू ऐस ए आगयीं जहां इन्होंने फिर से मास्टर औफ़ लाइब्रेरी ऐंड इनफौर्मेशन साइन्स किया। फिर 4 साल ओटोमोटिव इन्डस्ट्री एक्शन ग्रुप के पुस्तकालय में कार्य किया।

1998 में इन्होंने सेवा निवृत्ति ले ली और अपनी एक वेब साइट बनायी- www.sushmajee.com <http://www.sushmajee.com>। तब से ये उसी वेब साइट पर काम कर रहीं हैं। उस वेब साइट में हिन्दू धर्म के साथ साथ बच्चों के लिये भी काफी सामग्री है।

भिन्न भिन्न देशों में रहने से इनको अपने कार्यकाल में वहॉ की बहुत सारी लोक कथाओं को जानने का अवसर मिला- कुछ पढ़ने से, कुछ लोगों से सुनने से और कुछ ऐसे साधनों से जो केवल इन्हीं को उपलब्ध थे। उन सबको देखकर इनको ऐसा लगा कि ये लोक कथाएँ हिन्दी जानने वाले बच्चों और हिन्दी में रिसर्च करने वालों को तो कभी उपलब्ध ही नहीं हो पायेंगी- हिन्दी की तो बात ही अलग है अंग्रेजी में भी नहीं मिल पायेंगीं.

इसलिये इन्होंने न्यूनतम हिन्दी पढ़ने वालों को ध्यान में रखते हुए उन लोक कथाओं को हिन्दी में लिखना पा्ररम्भ किया। इन लोक कथाओं में अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिका के देशों की लोक कथाओं पर अधिक ध्यान दिया गया है पर उत्तरी अमेरिका और यूरोप के देशों की भी कुछ लोक कथाएँ सम्मिलित कर ली गयी हैं।

अभी तक 1200 से अधिक लोक कथाएँ हिन्दी में लिखी जा चुकी है। इनको "देश विदेश की लोक कथाएँ" क्रम में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि इस प्रकाशन के माध्यम से हम इन लोक कथाओं को जन जन तक पहुंचा सकेंगे.

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