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इथियोपिया की लोक कथाएँ - 2 // 18 सिनज़ैरो की कहानी // सुषमा गुप्ता

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इथियोपिया के अम्हारा जनजाति के बच्चे और बड़े सभी इस होशियार और छोटे सिनज़ैरो की साहस भरी कहानियाँ बड़े शौक से कहते सुनते हैं। सिनज़ैरो नाम अम्हारिक भाषा के सिनज़िर शब्द से निकला है। इस भाषा में इस शब्द का मतलब है "बालिश्त"।

बालिश्त दूरी नापने के काम आता है। हाथ को फैलाने पर हाथ के अँगूठे की नोक से ले कर सबसे छोटी उँगली की नोक तक की दूरी को बालिश्त कहते हैं।

हालाँकि यह बहुत ही पुराने समय का नापने का ढंग है परन्तु घरों और गाँवों में आज भी नापने का यह एक आसान और बहुत लोकप्रिय तरीका है। इथियोपिया में नापने के लिये लोग इसे आज भी इस्तेमाल करते हैं।

इथियोपिया में दो बौनों की कहानियाँ बहुत मशहूर हैं - एक का नाम है सिनज़ैरो और दूसरे का नाम है "औरेटाट"। औरेटाट का मतलब है अँगूठा। इन दोनों ही की कहानियाँ इथियोपिया में एक जैसी मशहूर हैं।

सिनज़ैरो की कहानियों का कोई खास अन्त नहीं है परन्तु उसकी कोई कहानी ऐसी नहीं है जिसमें वह एक भला आदमी बन गया हो। पर एक बात उसके बारे में बिल्कुल सही है कि वह अपनी बूढ़ी माँ की बहुत सेवा करता था।

यह कहानी उसके जन्म और उसकी ज़िन्दगी की कुछ घटनाओं के बारे में है।

एक औरत थी। उसके सात लम्बे चौड़े, ताकतवर और बेवकूफ बेटे थे। उसके ये सातों बेटे घर में सारा दिन कुछ न कुछ ऊधम मचाये रखते थे।

कोई कुरसी पर बैठ जाता तो अपने बोझ से कुरसी ही तोड़ देता। किसी को भूख लगती तो वह इन्जिरा की टोकरी ही खाली कर देता और साथ में वत का बरतन भी, और जब वे सोते तो सारा घर उनके खर्राटों के शोर से भर जाता।

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हालाँकि वे सब बहुत ताकतवर थे परन्तु उनमें से कोई भी अपनी इच्छा से कोई काम नहीं करना चाहता था बल्कि जितनी देर वे जागे रहते दूसरों को परेशान करने में ही लगे रहते और जब सो जाते तो अपने खर्राटों से घर भर में शोर मचाते।

एक दिन वह औरत अपने घर से तंग आ गयी। वह भाग कर झील के एक टापू पर बनी सेन्ट स्टीफेन की मोनेस्टरी की तरफ चली गयी।

उस मोनेस्टरी में किसी औरत को घुसने की इजाज़त नहीं थी क्योंकि सैंकड़ों सालों से, जबसे वह मोनेस्टरी बनी थी तभी से कोई भी औरत उसके अन्दर नहीं जा सकती थी।

वहाँ जा कर वह झील के किनारे घुटनों के बल बैठ कर मोनेस्टरी की तरफ देख कर ज़ोर ज़ोर से कहने लगी - "भगवान, आपके देवदूत और सब सेन्ट मेहरबानी करके मेरी प्रार्थना सुनें।

मुझे इथियोपिया के सबसे ज़्यादा बड़े, परेशान करने वाले, भूखे और आलसी सात बेटे मिल चुके हैं। अब की बार मुझे एक बेटी चाहिये। अगर आप सब मुझे बेटी न दे सकें तो मुझे एक बहुत ही छोटा सा बेटा दें।"

भगवान प्रार्थना तो सबकी सुनते हैं परन्तु पूरी किसी किसी की करते हैं। उन्होंने उस औरत को बेटी तो नहीं दी परन्तु एक बहुत ही छोटा सा बेटा दे दिया।

वह बेटा जब पैदा हुआ तो वह आदमी के अँगूठे की लम्बाई की आधी लम्बाई के बराबर था। उस औरत को अपना छोटा सा बेटा देख कर बहुत ही खुशी हुई और उसने उसका नाम सिनज़ैरो रख दिया।

यह उस औरत का पहला बच्चा था जिसको वह अपनी बाँहों में लेकर घूम सकती थी क्योंकि दूसरे बच्चों को तो घर तक लाने के लिये भी खच्चर बुलाना पड़ता था।

काफी दिन का हो जाने के बाद भी जब सिनज़ैरो का साइज नहीं बढ़ा तो उस औरत को और भी ज़्यादा खुशी हुई। इस सबसे उसको यह भी विश्वास हो चला था कि सिनज़ैरो बहुत ही होशियार बच्चा था।

उसको अपने उस छोटे से बेटे से बस एक ही परेशानी थी कि उसका साइज छोटा होने की वजह से उसको उसे उसके भाइयों से दिन में कई बार बचाना पड़ जाता था।

और केवल भाइयों से ही नहीं उसको तो उसे कई और भी चीज़ों से बचाना पड़ता था।

एक बार कमरे का दरवाजा खुला रह गया तो वह अपनी माँ के खर्राटों की हवा से दरवाजे के बाहर उड़ कर जा गिरा था। और उसको उसे हमेशा ही चूहे, चूजों आदि से तो बचा कर रखना ही पड़ता था।

जैसे जैसे दिन गुजरते गये सिनज़ैरो के सातों भाई सिनज़ैरो से बहुत नफरत करने लगे क्योंकि उनको लग रहा था कि उनकी माँ सिनज़ैरो को उनसे ज़्यादा प्यार करती थी।

जब वे छोटे थे तो कभी उनकी माँ ने उनको गोद में नहीं उठाया था, कभी उनको प्यार से नहीं चूमा था, कभी उनको गले से नहीं लगाया था पर सिनज़ैरो को वह सारा दिन अपनी गोद में लिये घूमती रहती थी।

एक बार सबसे बड़े भाई ने अपनी माँ को अपनी बाँहों में लेने की कोशिश की थी तो उसने उसकी तीन पसलियाँ तोड़ दी थीं। और सिनज़ैरो को वह इतना प्यार करती थी कि दिन रात उसे साथ रखती थी।

इन सब बातों से तंग आ कर एक बार उन सातों भाइयों ने सिनज़ैरो को मारने की एक योजना बनायी।

सिनज़ैरो को मारने की कोशिश

एक दिन सिनज़ैरो के भाइयों ने सिनज़ैरो को अपने पड़ोसी का सबसे अच्छा बैल चुरा लाने के लिये राजी कर लिया। भाइयों ने सोचा कि उनका पड़ोसी जो एक आदमखोर था सिनज़ैरो को पकड़ लेगा और उसे खा जायेगा। पर ऐसा तो कुछ भी नहीं हुआ।

सिनज़ैरो उस बैल के सिर पर चढ़ गया। जब वह उसको दाहिने हाथ की तरफ ले जाना चाहता तो उसके दाँये कान पर भिनभिनाता और जब बाँये हाथ की तरफ ले जाना चाहता तो उसके बाँये कान पर भिनभिनाता।

इस तरह वह पड़ोसी के सामने ही उस बैल को जंगल की तरफ भगा कर ले गया जहाँ उसके भाई उसका इन्तजार कर रहे थे।

भाइयों को सिनज़ैरो के बच जाने का दुख तो बहुत हुआ पर बैल पाने की खुशी भी कम नहीं हुई। उन्होंने उस बैल को मारा, आग जलायी और उसका सारा माँस खुद ही खाने लगे। सिनज़ैरो को उन्होंने कुछ भी नहीं दिया।

सिनज़ैरो बोला - "भाइयो, तुम लोग बड़े हो, तुमको खाना चाहिये वह तो ठीक है, पर मुझे कम से कम इसका ब्लैडर ही दे दो।" भाइयों ने उस बैल का ब्लैडर सिनज़ैरो की तरफ फेंक दिया और सिनज़ैरो ने उसका एक ढोल बना लिया।

वह उस ढोल को एक डंडी से पीटता जाता और कहता जाता - "चैरक ओ चैरक, हमने तुम्हारा बैल चुरा लिया है अगर हिम्मत हो तो आ कर हमसे लड़ो। मेरे बड़े भाई तुम्हारे जादू टोनों से नहीं डरते।"

उसके भाई लोग यह सुन कर बहुत डरे और सारा माँस वहीं का वहीं छोड़ कर जंगल में भाग लिये।

उधर सिनज़ैरो चैरक के घर गया और उसका एक खच्चर चुरा लाया। उस खच्चर पर उसने वह सारा माँस लादा और अपनी माँ को वह खच्चर और माँस दोनों ले जा कर दे दिये। माँ यह सब पा कर बहुत खुश हुई।

सिनज़ैरो और उसके भाइयों के बीच तनाव बढ़ता रहा। वे हमेशा यही सोचते कि उनकी माँ सिनज़ैरो की वजह से ही उनको प्यार नहीं करती। जब यह सिनज़ैरो नहीं रहेगा तो हमारी माँ हमें फिर से खूब प्यार करेगी।

अन्त में हालत यह हो गयी कि सिनज़ैरो का उस घर में रहना बहुत ही मुश्किल हो गया और उसको उसके लिये खास तौर पर बनाये गये एक छोटे से मकान में जा कर रहना पड़ा।

माँ इस सब पर बहुत गुस्सा हुई। उसने अपने सातों बड़े बेटों की शादी कर दी और उनको अलग कर दिया।

एक रात सिनज़ैरो के भाई आये और उन्होंने सिनज़ैरो के छोटे से घर में आग लगा दी। पर उसकी अच्छी किस्मत कि वह उस आग में जल कर मरा नहीं। वह अपने घर के फर्श में बने एक छेद से हो कर एक खरगोश के बिल में निकल गया और बच गया।

अगली सुबह सिनज़ैरो ने अपने जले हुए घर की राख समेटी, उसको बोरों में भरा और खच्चरों पर लाद दिया। उसने वह शहर छोड़ने का इरादा कर लिया था सो वह अपने खच्चरों के साथ वह शहर छोड़ कर चल दिया।

पहली रात वह एक अमीर आदमी के घर रुका। अगले दिन सुबह वह चिल्लाया - "अरे किसी चोर ने मेरे बोरों में से आटा चुरा कर उनमें राख भर दी है।"

जब सिनज़ैरो काफी देर तक चिल्लाता रहा तो उस अमीर आदमी को उस पर बड़ी दया आयी। इसके अलावा वह अमीर आदमी यह भी नहीं चाहता था कि उसके पड़ोसी यह सोचें कि इसी आदमी ने इस छोटे से लड़के का आटा चुराया है। इसलिये उसने सिनज़ैरो को सात बोरे आटा दे दिया।

सिनज़ैरो ने सोचा कि यह आटा माँ को दे दिया जाये। सो वह अपने घर की तरफ चल दिया। जब सिनज़ैरो आटा देने के लिये घर लौटा तो उसने अपने भाइयों को अपनी चालाकी की कहानी सुनायी कि किस तरह उसने उस अमीर आदमी को लूटा।

उसकी कहानी सुन कर सब भाइयों ने एक आवाज में कहा - "यह तो बड़ी होशियारी की चाल है।"

उन्होंने सोचा कि वे भी कुछ ऐसा ही करेंगे सो वे लोग तुरन्त ही अपने अपने घर गये और उनमें आग लगा दी। फिर उस राख को बोरों में भर कर खच्चरों पर लाद कर वे भी उसी अमीर आदमी के घर चल दिये जिसके घर में सिनज़ैरो जा कर रुका था।

पहले दिन सबसे बड़ा भाई अपने खच्चरों के साथ उस अमीर आदमी के घर पहुँचा और उसके घर रात बितायी।

अगले दिन सुबह उठ कर उसने भी सिनज़ैरो की तरह चिल्लाना शुरू कर दिया कि उस घर में उसके आटे की चोरी हो गयी लेकिन उस अमीर आदमी उसको कोई आटा नहीं दिया बल्कि उसको अपने ऊपर इलजाम लगाने के जुर्म में घर से बाहर निकाल दिया।

जब दूसरा भाई वहाँ गया और उसने भी वही चाल खेली तो उस आदमी ने उसको धक्के मार कर सड़क पर फेंक दिया और जब तीसरा भाई वहाँ गया तो उसको तो उसने डंडों से पिटवाया।

जब चौथा भाई उसके घर गया तो उसने उससे पहले ही पूछ लिया - "तुम्हारे इन बोरों में क्या है?"

वह बेवकूफ भाई बोला - "आटा।"

अमीर आदमी बोला - "यह तो बड़ा अच्छा है, आज हमारे पास आटे की कुछ कमी है सो आज रात हम तुम्हारे लिये इसी आटे की रोटी बनवायेंगे।"

सो उस रात उस भाई को राख की रोटी खाने को मिली और अगले दिन सुबह उसको बाहर निकाल दिया गया।

उस अमीर आदमी ने यही चाल पाँचवे और छठे भाई के साथ भी खेली। लेकिन जब सातवाँ भाई वहाँ आया तो वह अमीर आदमी इन चालों और इन भाइयों से तंग आ चुका था सो उसने उस पर अपने सारे क़ुत्ते छोड़ दिये।

सभी भाई अपने सबसे छोटे भाई को देखने के लिये आये और तय किया कि इस बार सिनज़ैरो को जरूर ही मरना चाहिये।

सिनज़ैरो को मारने की एक और कोशिश

एक रात जब उन सब भाइयों की माँ और पत्नियाँ सो रहीं थीं तो उन्होंने सिनज़ैरो को इन्जिरा की टोकरी में रख लिया और टोकरी नदी के किनारे ले जा कर उसका ढक्कन कस कर बाँध दिया ताकि वह खुल न सके और उस टोकरी को नदी में फेंक दिया।

ऐसा करने के बाद उनको पक्का विश्वास हो गया कि अब की बार उनको सिनज़ैरो की शक्ल देखने को नहीं मिलेगी - पर जाको राखे साँइयाँ मार सके ना कोय।

नदी की धारा में बहते बहते वह टोकरी कुछ ही दूर जा कर किनारे लग गयी।

सुबह उधर से यूसुफ नाम का एक अरब व्यापारी निकला। उसने वह टोकरी देखी तो उसको खोला। टोकरी खुलते ही सिनज़ैरो उसमें से बाहर निकल आया और गाने नाचने लगा।

वह बोला - "तुम अच्छी किस्मत वाले हो। तुम ही अल्लाह के प्यारे बेटे हो।"

यूसुफ बोला - "मेरी किस्मत अच्छी क्यों है? मुझे तो इसमें केवल भीगा हुआ एक लड़का मिला है। इसमें अच्छी किस्मत होने की क्या बात है?"

सिनज़ैरो बोला - "क्या मैं तुमको कुछ अजीब सा लड़का नहीं लगता?"

यूसुफ बोला - "हाँ, वह तो तुम लग रहे हो। तुम बहुत, बहुत, बहुत ही छोटे हो।"

सिनज़ैरो बोला - "हाँ, मैं बहुत ही छोटा हूँ न इसी लिये मैं अल्लाह का पैगम्बर हूँ और अपने छोटे साइज़ की वजह से ही मैं इस टोकरी के लायक भी नहीं था। और यह टोकरी भी क्या जादू की टोकरी है कि यह हर दोपहर को सोने से भर जाती है।"

यूसुफ यह सुन कर बहुत खुश हुआ। वह तुरन्त ही वह टोकरी ले लेना चाहता था क्योंकि वह बहुत लालची था पर उसको थोड़ी चिन्ता भी थी।

वह बोला - "अगर मैं यह टोकरी अपने घर ले जाऊँगा तो गवर्नर मुझसे यह टोकरी ले लेगा। मैं क्या करूँ?"

सिनज़ैरो बोला - "यह तो तुम ठीक कहते हो इसी लिये तो अल्लाह ने इस टोकरी को जंगल में भेजा है।"

यूसुफ बोला - "मुझे एक बात सूझी है। मैं तब तक यहीं रहूँगा जब तक यह टोकरी कई बार सोने से भरती है। फिर मैं उस सोने को अपने खच्चरों पर लाद दूँगा।

मैं इस टोकरी को यहाँ पत्थरों के पीछे छिपा दूँगा फिर इस सोने को शहर ले जा कर उसमें से थोड़ा सा सोना गवर्नर को दे दूँगा और बाकी सोना मैं अपने पास रख लूँगा। फिर जब भी मुझे सोने की जरूरत होगी मैं यहाँ से आ कर सोना निकाल लिया करूँगा।"

सिनज़ैरो बोला - "यह तो तुमने बहुत ही अक्लमन्दी की बात सोची। और यह तो मेरे लिये बहुत ही खुशी की बात है कि मेरी मुलाकात एक ऐसे आदमी से हुई जिसने पैसे के लालच में अपनी सोचने की ताकत नहीं छोड़ दी। यह तरकीब तो बहुत अच्छी है। तुम्हारे खच्चर कहाँ हैं?"

व्यापारी ने पहले अपने सिर पर हाथ मारा और फिर अपनी दाढ़ी सहलाता हुआ बोला - "अरे यह मैंने क्या कहा? मैं तो निपट बेवकूफ हूँ। मैंने तो अपने खच्चर पिछले गाँव में ही बेच कर शेख मुस्तफा को बेचने के लिये यह घोड़ा खरीदा है।"

सिनज़ैरो बोला - "कोई बात नहीं। अब तुम ऐसा करो, मैं यहाँ टोकरी के पास रहता हूँ तब तक तुम अपना यह सुन्दर घोड़ा ले कर जाओ और अपने खच्चर उससे वापस ले आओ।"

लालची व्यापारी बोला - "नहीं, ऐसा करते हैं कि मैं इस टोकरी के पास ठहरता हूँ और तुम यह पैसे और यह मेरा घोड़ा ले जाओ और मेरे खच्चर वापस ले आओ। लेकिन तुम इस जादू की टोकरी के बारे में किसी से कहना नहीं।"

सिनज़ैरो ने उगते हुए सूरज की कसम खा कर कहा कि वह इस जादू की टोकरी के बारे में किसी को कुछ नहीं बतायेगा। फिर बोला - "तुम फिकर न करो। इतने छोटे लड़के के मुँह से यह कहानी सुन कर तो कोई बेवकूफ भी उस पर यकीन नहीं करेगा।"

यूसुफ हँसा और बोला - "यह तो तुम ठीक कहते हो। कोई भी इस कहानी पर यकीन नहीं करेगा। मगर अब तुम जल्दी चले जाओ।"

सिनज़ैरो ने व्यापारी से पैसे लिये और घोड़े की पूँछ से होता हुआ उसकी पीठ पर बैठ गया। फिर व्यापारी से बोला - "मैं तुमको एक बात बताना तो भूल ही गया। तुम टोकरी के लिये अभी नये हो इसलिये इसमें से अगर आज सोना न निकले तो घबराना नहीं। इन्तजार करना।"

"ठीक है।"

कह कर सिनज़ैरो व्यापारी को टोकरी के पास बैठा छोड़ कर शहर की तरफ चला गया और व्यापारी उस टोकरी को लिये हुए सूरज के बीच आसमान में आने का इन्तजार करता रहा।

घोड़ा तेज़ और अच्छा था सो सिनज़ैरो जल्दी ही अपने घर पहुँच गया। घोड़ा अपनी माँ को देने के पहले सिनज़ैरो ने उसे अपने भाइयों को दिखाया। उसने उनको उस पर सवारी भी करायी। लेकिन उसने उनको यह नहीं बताया कि वह घोड़ा उसको कहाँ और कैसे मिला।

उसने उनको व्यापारी के दिये हुए पैसे भी दिखाये और कहा कि उस व्यापारी के पास वैसे कई घोड़े थे। उसने उसी के घोड़ों को बेच कर ये पैसे कमाये थे। उसने उन पैसों में से कुछ पैसे अपनी माँ को भी दिये।

इस पर माँ अपने इतने बड़े बड़े बेटों पर खूब चिल्लायी - "तुम लोग इतने बड़े हो गये हो पर तुमने मुझे कभी कोई पैसे या घोड़ा ला कर नहीं दिया। हमेशा मुझे तंग ही करते हो। अगर यह मेरा छोटे वाला न होता तो हम सब भूखे ही मर जाते।"

पर माँ की यह बात उसके सातों बेटों में से किसी को भी अच्छी नहीं लगी।

उस रात जब सारा घर उन सातों भाइयों के खर्राटों से भर गया, यानी वे सो गये, तो सिनज़ैरो अपने सबसे बड़े भाई के बिस्तर पर गया और उसके कान में फुसफुसाया - "मुझे ये घोड़े उस नदी में मिले थे जहाँ तुमने मुझे फेंका था। वहाँ अभी और भी घोड़े हैं।

जब कल सुबह सब सो रहे होंगे तब हम वहाँ चलेंगे। जब मैं सीटी बजाऊँ तो तुम नदी पर चलने के लिये तैयार हो जाना।"

सिनज़ैरो ने अपने दूसरे भाई से कहा कि घोड़े पहाड़ पर हैं, तीसरे भाई से कहा कि घोड़े झील में हैं, चौथे भाई से कहा कि घोड़े रेगिस्तान में हैं, पाँचवे भाई से कहा कि घोड़े घास के मैदान में हैं, छठे भाई से कहा कि घोड़े जंगल में हैं और सातवें भाई से कहा कि वे गुफा में हैं।

और उन सबसे यह भी कहा कि वे सुबह उसकी सीटी की आवाज सुन कर उठ जायें और फिर वे दोनों वहाँ चलेंगे। उसके बाद फिर सिनज़ैरो ने उन सबकी टाँगें उनके पलंगों से बाँध दीं।

सुबह सिनज़ैरो ने एक सीटी बजायी तो सभी एक साथ उठ गये और सात अलग अलग दिशाओं में भागने की कोशिश करने लगे परन्तु टाँगें बँधी होने की वजह से कोई भी अपने बिस्तर से ही नहीं उठ सका और वे आपस में ही एक दूसरे को पीट पीट कर बेहोश हो गये।

सिनज़ैरो अपनी माँ से बोला - "माँ, मैं और घोड़े लाने के लिये जाता हूँ।"

माँ ने पूछा - "बेटा, वे तुम्हें कहाँ मिलेंगे?"

सिनज़ैरो बोला - "जहाँ भी बेवकूफ लोग उन पर सवारी कर रहे होंगे।"

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17 अकबर बीरबल की कहानियाँ-1 - 15 कहानियाँ - 45 पृष्ठ

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23 लोक कथाओं में फल-1 - 6 कहानियाँ - 60 पृष्ठ

24 लोक कथाओं में फल-2 - 6 कहानियाँ - 60 पृष्ठ

25 लोक कथाओं में फल-3 - 8 कहानियाँ - 90 पृष्ठ

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27 लोक कथाओं में बरतन - 9 कहानियाँ - 72 पृष्ठ

28 लोक कथाओं में नम्बर तीन - 8 कहानियाँ - 62 पृष्ठ

29 लोक कथाओं में ईसाई धर्म-1 - 7 कहानियाँ - 60 पृष्ठ

30 लोक कथाओं में ईसाई धर्म-2 - 12 कहानियाँ - 130 पृष्ठ

31 लोक कथाओं में सिलाई कढ़ाई कताई बुनाई - 10 कहानियाँ - 134 पृष्ठ

32 वरदानों का कमाल - 9 कहानियाँ - 112 पृष्ठ

33 आओ हँसें हँसाऐं - 12 कहानियाँ - 82 पृष्ठ

34 नकल करो मगर अक्ल से - 9 कहानियाँ - 94 पृष्ठ

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं.

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सुषमा गुप्ता का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में सन् 1943 में हुआ था। इन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र में ऐम ए किया और फिर मेरठ विश्वविद्यालय से बी ऐड किया। 1976 में ये नाइजीरिया चली गयीं। वहां इन्होंने यूनिवर्सिटी औफ़ इबादान से लाइब्रेरी साइन्स में ऐम ऐल ऐस किया और एक थियोलोजीकल कौलिज में 10 वर्षों तक लाइब्रेरियन का कार्य किया।

वहां से फिर ये इथियोपिया चली गयीं और वहां एडिस अबाबा यूनिवर्सिटी के इन्स्टीट्यूट औफ़ इथियोपियन स्टडीज़ की लाइब्रेरी में 3 साल कार्य किया। तत्पश्चात इनको दक्षिणी अफ्रीका के एक देश़ लिसोठो के विश्वविद्यालय में इन्स्टीट्यूट औफ़ सदर्न अफ्रीकन स्टडीज़ में 1 साल कार्य करने का अवसर मिला। वहॉ से 1993 में ये यू ऐस ए आगयीं जहां इन्होंने फिर से मास्टर औफ़ लाइब्रेरी ऐंड इनफौर्मेशन साइन्स किया। फिर 4 साल ओटोमोटिव इन्डस्ट्री एक्शन ग्रुप के पुस्तकालय में कार्य किया।

1998 में इन्होंने सेवा निवृत्ति ले ली और अपनी एक वेब साइट बनायी- www.sushmajee.com <http://www.sushmajee.com>। तब से ये उसी वेब साइट पर काम कर रहीं हैं। उस वेब साइट में हिन्दू धर्म के साथ साथ बच्चों के लिये भी काफी सामग्री है।

भिन्न भिन्न देशों में रहने से इनको अपने कार्यकाल में वहॉ की बहुत सारी लोक कथाओं को जानने का अवसर मिला- कुछ पढ़ने से, कुछ लोगों से सुनने से और कुछ ऐसे साधनों से जो केवल इन्हीं को उपलब्ध थे। उन सबको देखकर इनको ऐसा लगा कि ये लोक कथाएँ हिन्दी जानने वाले बच्चों और हिन्दी में रिसर्च करने वालों को तो कभी उपलब्ध ही नहीं हो पायेंगी- हिन्दी की तो बात ही अलग है अंग्रेजी में भी नहीं मिल पायेंगीं.

इसलिये इन्होंने न्यूनतम हिन्दी पढ़ने वालों को ध्यान में रखते हुए उन लोक कथाओं को हिन्दी में लिखना पा्ररम्भ किया। इन लोक कथाओं में अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिका के देशों की लोक कथाओं पर अधिक ध्यान दिया गया है पर उत्तरी अमेरिका और यूरोप के देशों की भी कुछ लोक कथाएँ सम्मिलित कर ली गयी हैं।

अभी तक 1200 से अधिक लोक कथाएँ हिन्दी में लिखी जा चुकी है। इनको "देश विदेश की लोक कथाएँ" क्रम में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि इस प्रकाशन के माध्यम से हम इन लोक कथाओं को जन जन तक पहुंचा सकेंगे.

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