शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

इथियोपिया की लोक कथाएँ - 2 // 2 करामाती भाले // सुषमा गुप्ता

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बहुत समय पुरानी बात है कि एक बार इथियोपिया में एक बहुत ही ताकतवर आदमी रहता था। वह भाला बहुत अच्छा फेंकता था।

उसका निशाना अचूक था और वह जहाँ भी भाला फेंकना चाहता था उसका भाला भी वहीं जा कर लगता था। सब लोगों को उसकी यह होशियारी देख कर बहुत अचरज होता था।

पर उसके इस अचूक निशाने से नुकसान भी कई थे इसलिये उसके रिश्तेदार तथा गाँव के लोग उससे बहुत दुखी थे। "तुम इस धन्धे को छोड़ते क्यों नहीं?" "तुम ऐसा क्यों करते हो?" आदि आदि सवाल उससे पूछे जाते पर वह कहता "मैं मजबूर हूँ यह मेरे हाथ में नहीं है।"

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पर वह मजबूर क्यों था और वह उसको क्यों नहीं छोड़ सकता था यह किसी की समझ में नहीं आ रहा था। जब किसी को कुछ नहीं सूझा तो एक दिन सबने मिल कर निश्चय किया कि उसकी यह आदत छुड़ायी जाये, पर कैसे? इस बारे में वे किसी नतीजे पर नहीं पहुँच पाये।

वह आदमी गाँव वालों को चिन्ता में देख कर खुद भी बहुत दुखी था सो उसने भी एक निश्चय किया। एक दिन उसने अपने सभी गाँव वालों को बुलाया और बोला - "मैं अपनी मरजी से किसी को नहीं मारता यह तो मेरी और उस मरने वाले की तकदीर है।

अगर आप सब लोग इस बात से इतने दुखी हैं कि मैं ऐसा क्यों करता हूँ तो मैं ऐसा करता हूँ कि अभी आपके सामने ही मैं अपनी झोंपड़ी में से ये सारे भाले निकाल कर फेंक देता हूँ और मैं फिर कभी भाला नहीं फेंकूँगा।"

ऐसा कह कर वह अपनी झोंपड़ी में गया और सबके सामने अपने सारे भाले ला कर बाहर फेंक दिये और उन भालों से बोला - "ओ भालों, आज मैं तुम सबको बाहर फेंकता हूँ। तुम मेरे हाथ से चले जाओ और मेरी नजरों से दूर हो जाओ।"

इत्तफाक से वहीं उसकी झोंपड़ी की चहारदीवारी के बाहर ही एक चोर खड़ा था जो उस आदमी के घर में चोरी करने के इरादे से आया था। जब उस आदमी ने अपने भाले अपनी झोंपड़ी से बाहर फेंके तो वे सारे के सारे भाले उसके शरीर में जा लगे और वह मर गया।

अगले दिन जब उस आदमी ने चोर की लाश देखी तो गाँव वालों को बुलाया और कहा - "देखिये, ये वही भाले हैं जिनको मैंने कल आपके सामने अपनी झोंपड़ी से बाहर फेंका था और यह आदमी बिना मेरे मारे ही मेरे भालों से मर गया है। अब आप ही बताइये कि मैं क्या करूँ।"

ऐसा कह कर उसने उस चोर की लाश उनको दिखायी तो गाँव के सभी लोग आश्चर्य में डूब गये।

गाँव वालों ने यह सब देख कर उससे कहा - "बेटा, तुम ठीक कहते थे। ऐसा लगता है कि यह तो तुमको वरदान है। अब हम इसमें कुछ नहीं कर सकते। तुम अपने भाले अपने घर ले जाओ और सुख से रहो।" और वे सब अपने अपने घर चले गये।

वह आदमी भी अपने भाले अपने घर ले आया। इस घटना के बाद फिर कभी किसी ने उससे भालों के बारे में कोई शिकायत नहीं की।


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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं.

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सुषमा गुप्ता का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में सन् 1943 में हुआ था। इन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र में ऐम ए किया और फिर मेरठ विश्वविद्यालय से बी ऐड किया। 1976 में ये नाइजीरिया चली गयीं। वहां इन्होंने यूनिवर्सिटी औफ़ इबादान से लाइब्रेरी साइन्स में ऐम ऐल ऐस किया और एक थियोलोजीकल कौलिज में 10 वर्षों तक लाइब्रेरियन का कार्य किया।

वहां से फिर ये इथियोपिया चली गयीं और वहां एडिस अबाबा यूनिवर्सिटी के इन्स्टीट्यूट औफ़ इथियोपियन स्टडीज़ की लाइब्रेरी में 3 साल कार्य किया। तत्पश्चात इनको दक्षिणी अफ्रीका के एक देश़ लिसोठो के विश्वविद्यालय में इन्स्टीट्यूट औफ़ सदर्न अफ्रीकन स्टडीज़ में 1 साल कार्य करने का अवसर मिला। वहॉ से 1993 में ये यू ऐस ए आगयीं जहां इन्होंने फिर से मास्टर औफ़ लाइब्रेरी ऐंड इनफौर्मेशन साइन्स किया। फिर 4 साल ओटोमोटिव इन्डस्ट्री एक्शन ग्रुप के पुस्तकालय में कार्य किया।

1998 में इन्होंने सेवा निवृत्ति ले ली और अपनी एक वेब साइट बनायी- www.sushmajee.com <http://www.sushmajee.com>। तब से ये उसी वेब साइट पर काम कर रहीं हैं। उस वेब साइट में हिन्दू धर्म के साथ साथ बच्चों के लिये भी काफी सामग्री है।

भिन्न भिन्न देशों में रहने से इनको अपने कार्यकाल में वहॉ की बहुत सारी लोक कथाओं को जानने का अवसर मिला- कुछ पढ़ने से, कुछ लोगों से सुनने से और कुछ ऐसे साधनों से जो केवल इन्हीं को उपलब्ध थे। उन सबको देखकर इनको ऐसा लगा कि ये लोक कथाएँ हिन्दी जानने वाले बच्चों और हिन्दी में रिसर्च करने वालों को तो कभी उपलब्ध ही नहीं हो पायेंगी- हिन्दी की तो बात ही अलग है अंग्रेजी में भी नहीं मिल पायेंगीं.

इसलिये इन्होंने न्यूनतम हिन्दी पढ़ने वालों को ध्यान में रखते हुए उन लोक कथाओं को हिन्दी में लिखना पा्ररम्भ किया। इन लोक कथाओं में अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिका के देशों की लोक कथाओं पर अधिक ध्यान दिया गया है पर उत्तरी अमेरिका और यूरोप के देशों की भी कुछ लोक कथाएँ सम्मिलित कर ली गयी हैं।

अभी तक 1200 से अधिक लोक कथाएँ हिन्दी में लिखी जा चुकी है। इनको "देश विदेश की लोक कथाएँ" क्रम में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि इस प्रकाशन के माध्यम से हम इन लोक कथाओं को जन जन तक पहुंचा सकेंगे.

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