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इथियोपिया की लोक कथाएँ - 2 // 3 एक आदमी ने चोरी करना सीखा // सुषमा गुप्ता

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एक जगह दो आदमी रहते थे - उनमें से एक तो बहुत बड़ा चोर था, वह चोरी करने में बहुत होशियार था, और दूसरा एक किसान था, उसे चोरी करना बिल्कुल भी नहीं आता था। वह केवल खेती करके ही अपना पेट पालता था।

एक बार उसने देखा कि केवल खेती से उसका गुजारा नहीं हो पाता था और चोर के पास तो हमेशा ही खूब सारा पैसा दिखायी देता था। यह देख कर उसने सोचा कि चोर के पास चल कर उससे चोरी के बारे में ही कुछ सीखा जाये।

ऐसा सोच कर वह चोर के पास पहुँचा और उससे बोला - "चोर भाई, मेरा खेती में गुजारा नहीं होता मैं भी चोर बनना चाहता हूँ। बताओ मैं चोर कैसे बनूँ?"

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चोर बोला - ‘किसी के घर जा कर सेंध लगाओ। और देखो यह काम चुपचाप करना और जल्दी करना क्योंकि अगर घर वाला जाग गया तो वह तुम्हें अपने भाले से मार देगा।"

यह सुन कर किसान चला गया। उसने सोचा कि असल की चोरी करने से पहले मुझे कहीं पर अपना हाथ साफ कर लेना चाहिये।

यह सोच कर वह जंगल में लगे एक अंजीर के पेड़ के पास पहुँचा और उसकी जड़ खोदने लगा। जब वह उस पेड़ की जड़ खोद रहा था तो उसकी नंगी पीठ पर ओस की एक बूँद आ गिरी।

किसान तो मग्न हो कर सेंध लगा रहा था। उसे इस बात का ध्यान ही नहीं था कि अभी तो वह केवल अभ्यास के लिये ही सेंध लगा रहा था और केवल एक पेड़ की जड़ ही खोद रहा है सो ओस की बूँद पीठ पर पड़ते ही उसके दिमाग में आया कि घर वाला जाग गया है और उसने उसको अपने भाले से मारा है।

बस वह चिल्लाता हुआ घर भागा कि "उसने मुझे अपने भाले से मार डाला रे। उसने मुझे अपने भाले से मार डाला रे।" घर आ कर वह बहुत दुखी हुआ कि पहली ही कोशिश में ही वह नाकामयाब हो गया था।

वह फिर चोर के पास पहुँचा और बोला - "तुमने पहले जो कुछ भी मुझे बताया था वह सब गलत था। अब की बार तुम मुझे फिर से सब कुछ ठीक से बताओ।"

चोर हँस कर बोला - "किसान भाई, पहले भी मैंने तुमको जो कुछ बताया था वह सब ठीक ही बताया था पर इस बार मैं तुमको चोरी का एक छोटा रास्ता बताता हूँ।

तुम चारों तरफ देखभाल कर जाना, न तो चिल्लाना और न बोलना और किसी के जानवरों के झुंड में छिप कर जाना।"

अब की बार किसान कोई गलती नहीं करना चाहता था इसलिये चोर की बातों को ध्यान से अपने दिमाग में रख कर वह घास के मैदान में चर रहे जानवरों के झुंड में जा कर छिप गया।

जब जानवरों का मालिक उन जानवरों को हाँक कर अपने घर की तरफ ले चला तो छिपे छिपे वह भी उस मालिक के घर तक पहुँच गया।

वहाँ पहुँच कर वह ज़ोर से बोला - "तुम चारों तरफ देखभाल कर जाना, न तो चिल्लाना और न बोलना और जानवरों के झुंड में छिप कर जाना़।"

बस फिर क्या था किसान जैसे ही यह बोला जानवरों के मालिक ने उसको देख लिया और उसको बहुत मारा। किसान ने फिर कभी चोरी का नाम नहीं लिया।


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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं.

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सुषमा गुप्ता का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में सन् 1943 में हुआ था। इन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र में ऐम ए किया और फिर मेरठ विश्वविद्यालय से बी ऐड किया। 1976 में ये नाइजीरिया चली गयीं। वहां इन्होंने यूनिवर्सिटी औफ़ इबादान से लाइब्रेरी साइन्स में ऐम ऐल ऐस किया और एक थियोलोजीकल कौलिज में 10 वर्षों तक लाइब्रेरियन का कार्य किया।

वहां से फिर ये इथियोपिया चली गयीं और वहां एडिस अबाबा यूनिवर्सिटी के इन्स्टीट्यूट औफ़ इथियोपियन स्टडीज़ की लाइब्रेरी में 3 साल कार्य किया। तत्पश्चात इनको दक्षिणी अफ्रीका के एक देश़ लिसोठो के विश्वविद्यालय में इन्स्टीट्यूट औफ़ सदर्न अफ्रीकन स्टडीज़ में 1 साल कार्य करने का अवसर मिला। वहॉ से 1993 में ये यू ऐस ए आगयीं जहां इन्होंने फिर से मास्टर औफ़ लाइब्रेरी ऐंड इनफौर्मेशन साइन्स किया। फिर 4 साल ओटोमोटिव इन्डस्ट्री एक्शन ग्रुप के पुस्तकालय में कार्य किया।

1998 में इन्होंने सेवा निवृत्ति ले ली और अपनी एक वेब साइट बनायी- www.sushmajee.com <http://www.sushmajee.com>। तब से ये उसी वेब साइट पर काम कर रहीं हैं। उस वेब साइट में हिन्दू धर्म के साथ साथ बच्चों के लिये भी काफी सामग्री है।

भिन्न भिन्न देशों में रहने से इनको अपने कार्यकाल में वहॉ की बहुत सारी लोक कथाओं को जानने का अवसर मिला- कुछ पढ़ने से, कुछ लोगों से सुनने से और कुछ ऐसे साधनों से जो केवल इन्हीं को उपलब्ध थे। उन सबको देखकर इनको ऐसा लगा कि ये लोक कथाएँ हिन्दी जानने वाले बच्चों और हिन्दी में रिसर्च करने वालों को तो कभी उपलब्ध ही नहीं हो पायेंगी- हिन्दी की तो बात ही अलग है अंग्रेजी में भी नहीं मिल पायेंगीं.

इसलिये इन्होंने न्यूनतम हिन्दी पढ़ने वालों को ध्यान में रखते हुए उन लोक कथाओं को हिन्दी में लिखना पा्ररम्भ किया। इन लोक कथाओं में अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिका के देशों की लोक कथाओं पर अधिक ध्यान दिया गया है पर उत्तरी अमेरिका और यूरोप के देशों की भी कुछ लोक कथाएँ सम्मिलित कर ली गयी हैं।

अभी तक 1200 से अधिक लोक कथाएँ हिन्दी में लिखी जा चुकी है। इनको "देश विदेश की लोक कथाएँ" क्रम में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि इस प्रकाशन के माध्यम से हम इन लोक कथाओं को जन जन तक पहुंचा सकेंगे.

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