शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

इथियोपिया की लोक कथाएँ - 2 // 4 चोर और कुरसी // सुषमा गुप्ता

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कुछ समय पुरानी बात है कि इथियोपिया के डेसी शहर में एक चोर रहता था। यह चोर अपने काम में बहुत चतुर था। उसने अपनी चतुराई से अब तक बहुत सारी चीज़ें चुरा लीं थीं, जैसे किताबें, घोड़े, कपड़े, खाना आदि।

उस चोर में एक खूबी थी कि वह जो भी चाहता था चुरा लेता था कोई उसको पकड़ नहीं सकता था। उसकी चोरी की एक कहानी बहुत मशहूर है, आज हम तुम्हें वही कहानी सुनाते हैं।

एक दिन यह चोर एक कैफे में गया। वहाँ वह आम लोगों की तरह मेज पर नहीं बैठा। वह उस कमरे में चारों तरफ घूमने लगा। उसने वहाँ दीवारों पर लगी तस्वीरों की तरफ देखा, उसने अलमारी में रखी बोतलों की तरफ देखा, उसने अपने चारों तरफ बैठे आदमियों की तरफ देखा।

फिर इधर उधर देख कर उस चोर ने एक कुरसी उठायी और उसे लिये लिये दरवाजे की तरफ बढ़ चला। वह दरवाजे के बाहर निकला। उसने सड़क पार की। सड़क पार करने के बाद उसने वह कुरसी अपनी कमर पर रखी और धीरे धीरे सामने वाले मैदान की तरफ चल दिया।

पहले तो कैफे का वेटर उसको देखता रहा। उसकी समझ में ही नहीं आया कि वह आदमी कर क्या रहा है पर बाहर जाने के कुछ समय बाद तक भी जब वह कैफे के अन्दर नहीं लौटा तो वह कुछ घबराया।

वह कैफे के बाहर की तरफ भागा और चोर को इधर उधर देखने की कोशिश की तो वह उसे दिखायी दे गया। वह बड़े आराम से कुरसी उठाये हुए सामने वाला मैदान पार कर रहा था।

वह वहीं से चिल्लाया - "रुक जाओ, यह कुरसी वापस लाओ। यह कैफे की कुरसी है।"

चोर ने उसकी आवाज सुनी तो वह रुक गया। वह डरा नहीं, वह जानता था कि उसको क्या करना है। उसने वह कुरसी आराम से जमीन पर रख दी और उस पर आराम से बैठ गया।

जब वेटर ने उसको मैदान में कुरसी पर बैठे देख लिया तो उसकी जान में जान आयी। उसने सोचा कि यह अच्छा हुआ वह बैठ गया। अब वह कैफ़े की कुरसी आसानी से वापस ले कर आ सकता है।

ऐसा सोच कर वह आगे बढ़ता रहा। जब वेटर चोर के काफी पास पहुँच गया तो चोर ने वेटर को ऐसे आवाज लगायी जैसे वह कैफे में बैठा हो - "वेटर, इधर आओ।"

वेटर तुरन्त बोला - "साब, क्या चाहिये?"

चोर बोला - "एक प्याला कौफी।"

वेटर ने पूछा - "चीनी वाली या बिना चीनी वाली?"

चोर बोला - "चीनी वाली।"

वेटर तुरन्त ही चोर से आर्डर ले कर उलटे पैरों वापस कैफे की तरफ लौट पड़ा चोर ग्राहक के लिये चीनी वाली कौफी लाने। उधर वेटर के जाते ही चोर ने कुरसी उठायी और अपने रास्ते चल दिया।

है न मजेदार कहानी? नहीं नहीं, यह कहानी नहीं है यह तो सच्ची घटना है।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं.

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सुषमा गुप्ता का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में सन् 1943 में हुआ था। इन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र में ऐम ए किया और फिर मेरठ विश्वविद्यालय से बी ऐड किया। 1976 में ये नाइजीरिया चली गयीं। वहां इन्होंने यूनिवर्सिटी औफ़ इबादान से लाइब्रेरी साइन्स में ऐम ऐल ऐस किया और एक थियोलोजीकल कौलिज में 10 वर्षों तक लाइब्रेरियन का कार्य किया।

वहां से फिर ये इथियोपिया चली गयीं और वहां एडिस अबाबा यूनिवर्सिटी के इन्स्टीट्यूट औफ़ इथियोपियन स्टडीज़ की लाइब्रेरी में 3 साल कार्य किया। तत्पश्चात इनको दक्षिणी अफ्रीका के एक देश़ लिसोठो के विश्वविद्यालय में इन्स्टीट्यूट औफ़ सदर्न अफ्रीकन स्टडीज़ में 1 साल कार्य करने का अवसर मिला। वहॉ से 1993 में ये यू ऐस ए आगयीं जहां इन्होंने फिर से मास्टर औफ़ लाइब्रेरी ऐंड इनफौर्मेशन साइन्स किया। फिर 4 साल ओटोमोटिव इन्डस्ट्री एक्शन ग्रुप के पुस्तकालय में कार्य किया।

1998 में इन्होंने सेवा निवृत्ति ले ली और अपनी एक वेब साइट बनायी- www.sushmajee.com <http://www.sushmajee.com>। तब से ये उसी वेब साइट पर काम कर रहीं हैं। उस वेब साइट में हिन्दू धर्म के साथ साथ बच्चों के लिये भी काफी सामग्री है।

भिन्न भिन्न देशों में रहने से इनको अपने कार्यकाल में वहॉ की बहुत सारी लोक कथाओं को जानने का अवसर मिला- कुछ पढ़ने से, कुछ लोगों से सुनने से और कुछ ऐसे साधनों से जो केवल इन्हीं को उपलब्ध थे। उन सबको देखकर इनको ऐसा लगा कि ये लोक कथाएँ हिन्दी जानने वाले बच्चों और हिन्दी में रिसर्च करने वालों को तो कभी उपलब्ध ही नहीं हो पायेंगी- हिन्दी की तो बात ही अलग है अंग्रेजी में भी नहीं मिल पायेंगीं.

इसलिये इन्होंने न्यूनतम हिन्दी पढ़ने वालों को ध्यान में रखते हुए उन लोक कथाओं को हिन्दी में लिखना पा्ररम्भ किया। इन लोक कथाओं में अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिका के देशों की लोक कथाओं पर अधिक ध्यान दिया गया है पर उत्तरी अमेरिका और यूरोप के देशों की भी कुछ लोक कथाएँ सम्मिलित कर ली गयी हैं।

अभी तक 1200 से अधिक लोक कथाएँ हिन्दी में लिखी जा चुकी है। इनको "देश विदेश की लोक कथाएँ" क्रम में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि इस प्रकाशन के माध्यम से हम इन लोक कथाओं को जन जन तक पहुंचा सकेंगे.

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