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इथियोपिया की लोक कथाएँ - 2 // 7 औरतों ने अपना बड़ापन कैसे खोया // सुषमा गुप्ता

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बहुत समय पुरानी बात है कि एक बार औरतों ने आपस में विचार किया कि यह क्या बात है कि हमेशा हम लोगों को ही आदमियों की आज्ञा माननी पड़ती है। कभी ऐसा भी तो हो जब वे लोग हमारी आज्ञा मानें।

ऐसा विचार कर उन्होंने आदमियों से कहा - "अब बहुत दिन हो गये हम लोगों को आपकी आज्ञा मानते हुए अब आप हमारा कहा मानिये।"

आदमियों ने कहा - "इससे पहले कि हम अपना बड़ापन तुम लोगों को दें हम आपस में सलाह कर लें।"

सब आदमियों ने मिल कर एक सभा की और आपस में यह निश्चय किया कि अगर औरतें अच्छी नेता बन कर यह साबित कर दें कि वे सब हालातों को ठीक से सँभाल सकतीं हैं तो हम उनको अपना बड़ापन दे देंगे।"

ऐसा निश्चय कर उन्होंने औरतों को बुलाया और अपना निश्चय उनको बताया और कहा - "तुम लोग यह बड़ापन ले लो और आज से हमारी नेता बन जाओ।" औरतें यह सुन कर बहुत खुश हुईं।

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पुराने समय के लोग खानाबदोशों की ज़िन्दगी बिताते थे और अपने जानवरों को लेकर इधर से उधर घूमते रहते थे। समूह में जो बड़ा आदमी होता था वही आज्ञा देता था और उसी की आज्ञा से समूह में सारा काम होता था।

अब यह बड़ापन औरतों के पास आ गया था इसलिये समूह का सारा काम अब उन्हीं की आज्ञा से होना था।

एक दिन उस समूह की बड़ी औरत ने यह निश्चय किया कि अब उस जगह से जाने का समय आ गया है सो वहाँ से चल कर कहीं और रहना चाहिये।

आदमी लोग तो सब तैयार हो गये परन्तु एक औरत बोली - "अभी अभी तो मैंने अपने सिर में मक्खन लगाया है। अभी मैं अगर धूप में चली तो मेरे सिर का सारा मक्खन पिघल जायेगा और मेरे मुँह पर बह निकलेगा।

और फिर इतनी कड़ी धूप में हम अपने जानवर भी तो नहीं ले जा सकते।" ऐसा कह कर उसने जाने से मना कर दिया।

इस पर बड़ी औरत ने कहा - "अच्छा तो फिर हम शाम को चलेंगे जब धूप कम हो जायेगी।"

जब शाम को वे सब चलने के लिये तैयार हुए तो आदमी लोग तो सब फिर तैयार हो गये पर एक दूसरी औरत बोली - "अगर हम शाम को चलेंगे तो अँधेरे में हमको ठीक से दिखायी न देने की वजह से हमारे पैरों को ठोकर लगेगी, काँटे भी चुभेंगे, इससे हम गिर भी सकते हैं और मर भी सकते हैं। इसलिये हम रात को कैसे जा सकते हैं।"

इस तरह वे लोग उस रात को भी नहीं जा सके। अगले दिन आदमियों ने कहा - "तुम लोग बड़े होने के लायक ही नहीं हो। तुमको तो आदमियों की ही आज्ञा माननी चाहिये।"

इस तरह औरतों ने अपना बड़ापन खो दिया और वे फिर से आदमियों की गुलाम हो गयीं जो वे आज तक हैं।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं.

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सुषमा गुप्ता का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में सन् 1943 में हुआ था। इन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र में ऐम ए किया और फिर मेरठ विश्वविद्यालय से बी ऐड किया। 1976 में ये नाइजीरिया चली गयीं। वहां इन्होंने यूनिवर्सिटी औफ़ इबादान से लाइब्रेरी साइन्स में ऐम ऐल ऐस किया और एक थियोलोजीकल कौलिज में 10 वर्षों तक लाइब्रेरियन का कार्य किया।

वहां से फिर ये इथियोपिया चली गयीं और वहां एडिस अबाबा यूनिवर्सिटी के इन्स्टीट्यूट औफ़ इथियोपियन स्टडीज़ की लाइब्रेरी में 3 साल कार्य किया। तत्पश्चात इनको दक्षिणी अफ्रीका के एक देश़ लिसोठो के विश्वविद्यालय में इन्स्टीट्यूट औफ़ सदर्न अफ्रीकन स्टडीज़ में 1 साल कार्य करने का अवसर मिला। वहॉ से 1993 में ये यू ऐस ए आगयीं जहां इन्होंने फिर से मास्टर औफ़ लाइब्रेरी ऐंड इनफौर्मेशन साइन्स किया। फिर 4 साल ओटोमोटिव इन्डस्ट्री एक्शन ग्रुप के पुस्तकालय में कार्य किया।

1998 में इन्होंने सेवा निवृत्ति ले ली और अपनी एक वेब साइट बनायी- www.sushmajee.com <http://www.sushmajee.com>। तब से ये उसी वेब साइट पर काम कर रहीं हैं। उस वेब साइट में हिन्दू धर्म के साथ साथ बच्चों के लिये भी काफी सामग्री है।

भिन्न भिन्न देशों में रहने से इनको अपने कार्यकाल में वहॉ की बहुत सारी लोक कथाओं को जानने का अवसर मिला- कुछ पढ़ने से, कुछ लोगों से सुनने से और कुछ ऐसे साधनों से जो केवल इन्हीं को उपलब्ध थे। उन सबको देखकर इनको ऐसा लगा कि ये लोक कथाएँ हिन्दी जानने वाले बच्चों और हिन्दी में रिसर्च करने वालों को तो कभी उपलब्ध ही नहीं हो पायेंगी- हिन्दी की तो बात ही अलग है अंग्रेजी में भी नहीं मिल पायेंगीं.

इसलिये इन्होंने न्यूनतम हिन्दी पढ़ने वालों को ध्यान में रखते हुए उन लोक कथाओं को हिन्दी में लिखना पा्ररम्भ किया। इन लोक कथाओं में अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिका के देशों की लोक कथाओं पर अधिक ध्यान दिया गया है पर उत्तरी अमेरिका और यूरोप के देशों की भी कुछ लोक कथाएँ सम्मिलित कर ली गयी हैं।

अभी तक 1200 से अधिक लोक कथाएँ हिन्दी में लिखी जा चुकी है। इनको "देश विदेश की लोक कथाएँ" क्रम में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि इस प्रकाशन के माध्यम से हम इन लोक कथाओं को जन जन तक पहुंचा सकेंगे.

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