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इथियोपिया की लोक कथाएँ - 2 // 8 औरतें और बरतन // सुषमा गुप्ता

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इथियोपिया के एक बड़े शहर के पास एक औरत रहती थी जिसका नाम था अलमास। एक दिन उसने बहुत सारी लकड़ियाँ इकठ्ठी कीं और उनको बाजार में बेचने के लिये चल दी।

उधर से उसकी एक दोस्त ऐस्टर बाजार से तैफ़ खरीद कर लौट रही थी। तैफ़ एक तरह का अन्न होता है जो इथियोपिया और अरब के दक्षिण पश्चिम हिस्से मे बहुत उगता है और वहाँ बहुत खाया जाता है। वहाँ के लोग उसका दक्षिण भारत का दोसा सा बना कर खाते हैं।

दोनों दोस्त बहुत दिनों के बाद मिली थीं सो बहुत प्रेम से मिलीं। उन्होंने आपस में बहुत सारी बातें की, बाजार की, बच्चों की, अपने पतियों की और अपनी मेहनत की जो वे सुबह से शाम तक करती थीं।

अलमास ने ऐस्टर से कहा - "हम लोग हमेशा ही कितनी मेहनत करते हैं, बड़े बड़े गठ्ठरों का बोझ उठाते हैं, बच्चों की देखभाल करते हैं फिर भी राजा ऊँचे ओहदे आदमियों को ही देता है हम लोगों को नहीं। मैंने उसको कभी कोई ऊँचा ओहदा किसी औरत को देते नहीं देखा। ऐसा क्यों ऐस्टर?"

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ऐस्टर बोली - "बहिन, यह तो तुम ठीक कहती हो। चलो हम लोग चल कर इस बारे में राजा से ही बात करते हैं कि वह ऐसा क्यों करता है।" और वे दोनों एक दिन राजा के महल में जा पहुँचीं।

वहाँ पहुँच कर दोनों ने राजा को घुटनों के बल बैठ कर सलाम किया और फिर अलमास बोली - "राजा साहब, हम आपसे एक सवाल पूछना चाहते हैं। मेहरबानी करके आप हमें यह बताइये कि आप ऊँचे ओहदे केवल आदमियों को ही क्यों देते हैं? और औरतों को हमेशा नीचे ओहदे ही क्यों मिलते हैं।

राजा बोला - "यह बात मैं तो तुम्हें नहीं बता सकता, पर रुको, मैं तुम लोगों को अपने मन्त्री के पास भेजता हूँ। वह तुम लोगों को बतायेगा कि ऐसा क्यों होता है।

ऐसा करो कि तुम यह बरतन मेरे मन्त्री के पास ले जाओ। इस बरतन में मेरे मन्त्री के नाम एक चिठ्ठी है जिसमें मैंने तुम्हारे सवाल के बारे में लिख दिया है।

इस बरतन को तुम उसको दे देना। वह तुम्हारे सवाल का जवाब जरूर दे देगा। और हाँ एक बात और, यह बरतन तुम अपने आप मत खोलना। बस ले जा कर उसको दे देना।"

दोनों औरतों ने पूछा - "क्या हम देख सकते हैं कि इस बरतन में क्या है?"

राजा बोला - "नहीं नहीं, यह काम तुम लोग किसी भी हाल में न करना।"

"ठीक है।" कह कर दोनों औरतों ने राजा का कहा मानने का वायदा किया और वह बरतन ले कर राजा के मन्त्री के पास चल दीं।

थोड़ी दूर जाने के बाद ही ऐस्टर बोली - "अलमास, मैं यह बरतन खोल कर देखना चाहती हूँ कि आखिर इस बरतन के अन्दर है क्या।"

अलमास बोली - "इच्छा तो मेरी भी यही है पर क्या करें राजा ने मना किया है।"

ऐस्टर बोली - "पर राजा को कैसे पता चलेगा कि हमने यह बरतन खोला है? हम इसमें से कुछ निकालेंगे थोड़े ही। बस देखेंगे कि इसमें क्या है और फिर इसे बन्द कर देंगे।"

सो दोनों एक जगह बैठ गयीं और उन्होंने वह बरतन खोल दिया। जैसे ही उन्होंने बरतन का ढकना उठाया, एक पीले रंग की चिड़िया उसमें से निकल कर ऊपर आसमान में उड़ गयी और महल के अन्दर चली गयी।

अलमास और ऐस्टर दोनों डर गयीं पर अब तो कुछ हो नहीं सकता था।

उन्होंने उस बरतन के अन्दर झाँका तो उसमें एक कागज का टुकड़ा रखा था जिस पर लिखा था "क्योंकि औरतें हुकुम मानना नहीं जानतीं।"

अब उन दोनों औरतों की समझ में आया कि राजा औरतों को ऊँचे ओहदों पर क्यों नहीं रखता था।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं.

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सुषमा गुप्ता का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में सन् 1943 में हुआ था। इन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र में ऐम ए किया और फिर मेरठ विश्वविद्यालय से बी ऐड किया। 1976 में ये नाइजीरिया चली गयीं। वहां इन्होंने यूनिवर्सिटी औफ़ इबादान से लाइब्रेरी साइन्स में ऐम ऐल ऐस किया और एक थियोलोजीकल कौलिज में 10 वर्षों तक लाइब्रेरियन का कार्य किया।

वहां से फिर ये इथियोपिया चली गयीं और वहां एडिस अबाबा यूनिवर्सिटी के इन्स्टीट्यूट औफ़ इथियोपियन स्टडीज़ की लाइब्रेरी में 3 साल कार्य किया। तत्पश्चात इनको दक्षिणी अफ्रीका के एक देश़ लिसोठो के विश्वविद्यालय में इन्स्टीट्यूट औफ़ सदर्न अफ्रीकन स्टडीज़ में 1 साल कार्य करने का अवसर मिला। वहॉ से 1993 में ये यू ऐस ए आगयीं जहां इन्होंने फिर से मास्टर औफ़ लाइब्रेरी ऐंड इनफौर्मेशन साइन्स किया। फिर 4 साल ओटोमोटिव इन्डस्ट्री एक्शन ग्रुप के पुस्तकालय में कार्य किया।

1998 में इन्होंने सेवा निवृत्ति ले ली और अपनी एक वेब साइट बनायी- www.sushmajee.com <http://www.sushmajee.com>। तब से ये उसी वेब साइट पर काम कर रहीं हैं। उस वेब साइट में हिन्दू धर्म के साथ साथ बच्चों के लिये भी काफी सामग्री है।

भिन्न भिन्न देशों में रहने से इनको अपने कार्यकाल में वहॉ की बहुत सारी लोक कथाओं को जानने का अवसर मिला- कुछ पढ़ने से, कुछ लोगों से सुनने से और कुछ ऐसे साधनों से जो केवल इन्हीं को उपलब्ध थे। उन सबको देखकर इनको ऐसा लगा कि ये लोक कथाएँ हिन्दी जानने वाले बच्चों और हिन्दी में रिसर्च करने वालों को तो कभी उपलब्ध ही नहीं हो पायेंगी- हिन्दी की तो बात ही अलग है अंग्रेजी में भी नहीं मिल पायेंगीं.

इसलिये इन्होंने न्यूनतम हिन्दी पढ़ने वालों को ध्यान में रखते हुए उन लोक कथाओं को हिन्दी में लिखना पा्ररम्भ किया। इन लोक कथाओं में अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिका के देशों की लोक कथाओं पर अधिक ध्यान दिया गया है पर उत्तरी अमेरिका और यूरोप के देशों की भी कुछ लोक कथाएँ सम्मिलित कर ली गयी हैं।

अभी तक 1200 से अधिक लोक कथाएँ हिन्दी में लिखी जा चुकी है। इनको "देश विदेश की लोक कथाएँ" क्रम में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि इस प्रकाशन के माध्यम से हम इन लोक कथाओं को जन जन तक पहुंचा सकेंगे.

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