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इथियोपिया की लोक कथाएँ - 2 // 9 एक औरत और एक शेर // सुषमा गुप्ता

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काफी समय पुरानी बात है कि इथियोपिया के एक शहर में फानाये नाम की एक औरत रहती थी। वह बहुत दुखी रहती थी क्योंकि उसका पति उसको बिल्कुल भी प्यार नहीं करता था।

प्यार करना तो दूर वह उससे बोलता तक नहीं था। सुबह वह खाना ले कर अपने काम पर चला जाता और शाम को थका हारा घर आता तो खाना खा कर सो जाता।

एक दिन फानाये जब बहुत परेशान हो गयी तो वह एक अक्लमन्द आदमी के पास गयी और उसको अपना सब हाल कह सुनाया कि उसका पति उसको बिल्कुल प्यार नहीं करता था और उससे पूछा कि इसके लिये वह क्या करे।

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उस अक्लमन्द आदमी ने उसकी बात ध्यान से सुनी और बोला - "अब जो मैं तुमको बात बताता हूँ उसे तुम ध्यान से सुनो और उसे जरूर करना। भगवान ने चाहा तो तुम्हारा पति तुमको जरूर ही प्यार करने लगेगा। परन्तु उस काम को करने से पहले मुझे शेर की पूँछ के कुछ बाल चाहिये।"

फ़ानाये यह सुन कर चिन्ता में पड़ गयी पर वह फिर वहाँ से चली गयी। उसको बहुत चिन्ता हो रही थी कि शेर की पूँछ के बाल वह भला कहाँ से लायेगी। यह काम तो नामुमकिन सा दिखायी देता था।

पर अगर उसको अपने पति का प्यार पाना है तो उसे शेर की पूँछ के बाल तो कहीं न कहीं से लाने ही पड़ेंगे। वह इस काम में सफल हो या न हो पर वह कोशिश जरूर करेगी।

जिस शहर में वह रहती थी उस शहर के बाहर एक घना जंगल था और उस जंगल में शेर की एक गुफा थी। एक दिन फानाये ने थोड़ा सा माँस एक पोटली में बाँधा और उस शेर की गुफा की तरफ चल द़ी।

उसने वह माँस शेर की गुफा के बाहर रख दिया और उसके बाहर निकलने का इन्तजार करने लगी। शेर बाहर तो आया परन्तु जैसे ही उसने शेर को देखा तो वह डर गयी और वहाँ से भाग खड़ी हुई। वह शेर से बहुत ज़्यादा डर गयी थी।

अगले दिन वह कुछ और ज़्यादा माँस ले कर शेर की गुफा की तरफ चली। गुफा के पास पहुँच कर उसने वह माँस एक पत्थर पर रख दिया और वह खुद एक पेड़ के पीछे खड़ी हो गयी।

कुछ ही देर में शेर आया और माँस खाने लगा। वह शेर के पीछे से ही उसको माँस खाता देखती रही।

तीसरे दिन वह एक भेड़ ले कर आयी। उस दिन वह तब तक भेड़ के पास ही खड़ी रही जब तक शेर ने भेड़ को खाया।

चौथे दिन वह डरी भी नहीं और भागी भी नहीं, बल्कि उसने शेर को खुद अपने हाथों से माँस खिलाया।

अब वह रोज शेर के लिये माँस ले जाने लगी और वह और शेर दोनों आपस में अच्छे दोस्त बन गये। वह अब उस शेर को पास बिठा कर माँस खिलाती।

एक दिन जब वह शेर माँस खा रहा था तो उसने उसकी पूँछ में से थोड़े से बाल तोड़ लिये। फिर उसने उसको और ज़्यादा माँस दिया और थोड़े से बाल और तोड़ लिये। शेर ने उसकी तरफ देखा भी नहीं।

फ़ानाये अब बहुत खुश थी कि उसको शेर की पूँछ के बाल मिल गये थे। अब वह अक्लमन्द आदमी उसको उसके पति का प्यार पाने की कोई न कोई तरकीब जरूर ही बता देगा।

वह शेर के बाल ले कर तुरन्त उस अक्लमन्द आदमी के घर आयी और वे शेर के बाल उतावली से उसके हाथ में देते हुए बोली - "ये रहे शेर की पूँछ के बाल। अब बताओ मैं क्या करूँ?"

वह अक्लमन्द आदमी शेर की पूँछ के बाल अपने हाथ में ले कर ज़ोर से हँस पड़ा और बोला - "कैसी अजीब बात है, तुम शेर जैसे खूँख्वार जानवर को अपना दोस्त बना कर तो उसकी पूँछ के बाल ला सकती हो पर अपने पति को अपना दोस्त बना कर उसका प्यार नहीं पा सकतीं।"

फ़ानाये यह सुन कर बहुत शरमिन्दा हुई। उसकी समझ में आ गया कि वह कहीं गलती पर थी। धीरे धीरे उसका अपने पति के साथ व्यवहार बदल गया और फिर उसका पति उसको खूब प्यार करने लगा।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं.

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सुषमा गुप्ता का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में सन् 1943 में हुआ था। इन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र में ऐम ए किया और फिर मेरठ विश्वविद्यालय से बी ऐड किया। 1976 में ये नाइजीरिया चली गयीं। वहां इन्होंने यूनिवर्सिटी औफ़ इबादान से लाइब्रेरी साइन्स में ऐम ऐल ऐस किया और एक थियोलोजीकल कौलिज में 10 वर्षों तक लाइब्रेरियन का कार्य किया।

वहां से फिर ये इथियोपिया चली गयीं और वहां एडिस अबाबा यूनिवर्सिटी के इन्स्टीट्यूट औफ़ इथियोपियन स्टडीज़ की लाइब्रेरी में 3 साल कार्य किया। तत्पश्चात इनको दक्षिणी अफ्रीका के एक देश़ लिसोठो के विश्वविद्यालय में इन्स्टीट्यूट औफ़ सदर्न अफ्रीकन स्टडीज़ में 1 साल कार्य करने का अवसर मिला। वहॉ से 1993 में ये यू ऐस ए आगयीं जहां इन्होंने फिर से मास्टर औफ़ लाइब्रेरी ऐंड इनफौर्मेशन साइन्स किया। फिर 4 साल ओटोमोटिव इन्डस्ट्री एक्शन ग्रुप के पुस्तकालय में कार्य किया।

1998 में इन्होंने सेवा निवृत्ति ले ली और अपनी एक वेब साइट बनायी- www.sushmajee.com <http://www.sushmajee.com>। तब से ये उसी वेब साइट पर काम कर रहीं हैं। उस वेब साइट में हिन्दू धर्म के साथ साथ बच्चों के लिये भी काफी सामग्री है।

भिन्न भिन्न देशों में रहने से इनको अपने कार्यकाल में वहॉ की बहुत सारी लोक कथाओं को जानने का अवसर मिला- कुछ पढ़ने से, कुछ लोगों से सुनने से और कुछ ऐसे साधनों से जो केवल इन्हीं को उपलब्ध थे। उन सबको देखकर इनको ऐसा लगा कि ये लोक कथाएँ हिन्दी जानने वाले बच्चों और हिन्दी में रिसर्च करने वालों को तो कभी उपलब्ध ही नहीं हो पायेंगी- हिन्दी की तो बात ही अलग है अंग्रेजी में भी नहीं मिल पायेंगीं.

इसलिये इन्होंने न्यूनतम हिन्दी पढ़ने वालों को ध्यान में रखते हुए उन लोक कथाओं को हिन्दी में लिखना पा्ररम्भ किया। इन लोक कथाओं में अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिका के देशों की लोक कथाओं पर अधिक ध्यान दिया गया है पर उत्तरी अमेरिका और यूरोप के देशों की भी कुछ लोक कथाएँ सम्मिलित कर ली गयी हैं।

अभी तक 1200 से अधिक लोक कथाएँ हिन्दी में लिखी जा चुकी है। इनको "देश विदेश की लोक कथाएँ" क्रम में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि इस प्रकाशन के माध्यम से हम इन लोक कथाओं को जन जन तक पहुंचा सकेंगे.

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