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रक्षा बंधन - राखी पर विशेष // मृत्युलोक से लेकर स्वर्ग तक में राखी धागे का रहा है महत्व // डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

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० इतिहास के पन्ने भी कहते है रोचक कहानी

रक्षा बंधन का पर्व महज भाई-बहन के रिश्तों को मजबूती देने का संकेत ही नही है वरन् वेद-वेदान्त के दृष्टिकोण से भी यह दिन काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। कहा जाता है कि श्रावण मास की इसी पूर्णिमा तिथि को वेदों का अध्ययन भी प्रारंभ किया जाता था। शाक्त्रोक्त मतानुसार रक्षा बंधन के दिन पापों के निराकरण के लिए प्रायश्चित रूप में हेमाद्रि स्नान संकल्प करके दशविध स्नान करने का विधान भी बताया गया है। रक्षाबंधन का पर्व कच्ची डोरी से बांधे गये मजबूत बंधन का प्रतीक है। यही वह धागा है जो एक भाई को बहन के प्रति कर्त्तव्य निष्ठता का पाठ पढ़ाता रहता है। दूसरी ओर बहन भी अपने भाई के लिए हर प्रकार का त्याग करते हुए स्नेह के सागर में गोते लगाती रहती है। यह पर्व महज भाई-बहन को ही उत्तरदायित्व से नहीं बांधता है वरन् इसी दिन एक शिष्य अपने गुरू के पास पहुँचकर उससे रक्षा सूत्र बँधवाकर आशीर्वाद ग्रहण करता है। इतने अधिक गहरायी को अपने अंदर समेटे इस पर्व का रूप अब कुछ बदला-बदला सा दिखायी पड़ने लगा है। लोगों ने इस पर्व की गंभीरता और पवित्रता को कहीं न कहीं छिन्न-भिन्न करना शुरू कर दिया है। साथ ही यह पर्व वर्तमान में एक परंपरा को पूरा करने तक ही सिमटता जा रहा है। लोगों द्वारा इसे भी औपचारिकता के बंधन में जकड़ा जाना भाई-बहन के पवित्र रिश्ते पर प्रश्च चिन्ह लगाता दिखायी देने लगा है।

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भारतीय पर्वों में भाई-बहन के रिश्तों को मजबूती देने वाला पर्व रक्षाबंधन अपने महत्व के चलते अब अन्य धर्मावलंबियों द्वारा भी बनाया जाने लगा है। एक ही माँ का दूध पीकर बड़े हुए रिश्ते के भाई-बहनों के अलावा धरम भाई और धरम बहन भी इस महान पर्व की देन हैं। मनुष्य समाज को छोड़ भी दें तो ईश्वरीय सत्ता भी इस पर्व से अछूती नही रही है। कृष्ण द्वारा द्रौपती की चीरहरण से रक्षा भी इसी पर्व का मुख्य हिस्सा माना जाता है। इतिहास में सिकंदर की पत्नी ने अपने पति के शत्रु पुरूराज को राखी का धागा बांधकर अपने पति के प्राणों की रक्षा की थी। मुगल सम्राट हुँमायु भी इस पवित्र बंधन में बंध चुके हैं। देव-असुर युद्ध में देवों की विजयी कामना के साथ स्वयं इन्द्राणी ने अपने पति इन्द्र के हाथ में रक्षा सूत्र बाँधकर अपने विश्वास को बुलन्दी दी थी, और इन्द्र की जीत ने रक्षा सूत्र की ताकत सिद्ध कर दिखायी थी। सभी पर्वों में यही एक ऐसा पर्व है जो भाई-बहन को हर स्थिति में समीप लाने प्रतिबद्ध दिखायी पड़ रहा है। पर्व से पूर्व ही भाई-बहन के पास पहुँचने की तैयारी में लग जाते हैं अथवा बहन अपने भाई के आगमन की प्रतीक्षा में न जाने क्या-क्या सपने संजोने लगती है। श्रावण मास शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि श्रावणी पर्व के नाम से भी जानी जाती हैं।

इन्टरनेट की इस इक्कीसवीं शताब्दी ने भी महत्वपूर्ण भारतीय पर्व को एक अलग ही रंग देना शुरू कर दिया है। अब अपने भाई से हजारों मील दूर रहने वाली बहन राखी और कुंकुम, रोली वाला तिलक डाक से न भेजकर इन्टरनेट के सहारे संदेश और फोटो गैलारी के माध्यम से आरती की थाली और राखी कम्प्यूटर पर भेजकर अपना स्नेह प्रदर्शित कर रही है। ऐसे प्रेम के प्रतीक को भाई न तो छू सकता है और न ही अपनी कलाईयों पर धारण कर सकता है। कुछ लोगों का ऐसा भी मानना है कि जहां डाक सुविधा का लाभ न मिल पा रहा हो वहाँ इन्टरनेट ने प्रत्यक्ष रूप से भाई-बहन को मिलाकर त्योहार का बड़ा तोहफा ही देने का प्रयास किया है। इतना अवश्य है कि जब तक भाई के माथे पर तिलक न सजे और हाथ पर राखी का धागा न चढ़े रक्षा का पर्व अधूरा ही प्रतीत होता है। दूसरी ओर देखें तो यह एक आकर्षित करने वाला व्यवसाय बनकर रह गया है। एक आम व्यापारी यही चाहता है कि इस दिन ढेरों राखियाँ बिके, खूब मिठाइयाँ एवं उपहार लोगों द्वारा खरीदे जायें ताकि मोटा मुनाफा कमाया जा सके।

यही राखी का पर्व आज से लगभग तीन दशक पूर्व एक अलग ही जोश और उमंग में हुआ करता था। बहने अपने भाइयों के लिए रंग बिरंगे जूट के धागों से स्वयं हस्तकला का नमूना पेश करते हुए आकर्षक राखियाँ बनाया करती थीं। चांदी जैसे जरी के धागे और सुनहरे तारों की लड़ियाँ जब राखी पर आकर्षक रूप से सजाये जाते थे तब बहन का प्यार उमड़ कर त्योहार की खुशी का इजहार किया करता था। इतना ही नहीं सोने और चांदी की राखियाँ बहन के अटूट स्नेह को सदैव के लिए भाई की कलायी पर बांधा करती थी। अब महंगाई के इस दौर में राखियों का बाजार सस्ती सामाग्रियों के मेल-जोल से बनायी गयी राखियों तक सीमित रह गया है। ऐसी राखियाँ हाथ की कलाई पर घण्टे भर भी टिक नही पाती और हल्के पानी के साथ ही कलाई छोड़ जमीन पर जा गिरती है। पुरोहितों द्वारा कलाई में बांधी गयी मौली धागे की राखी ही पर्व को महिनों जिन्दा रख पा रही है। एक ओर जहाँ बहनों ने स्वयं राखी बनाना छोड़ दिया है वहीं भाइयों ने भी तोहफे की रस्म रूपयों के द्वारा पूरी करना शुरू कर दी है। उपहार की अहमियत क्या होती है इसे समझने और समझाने की जरूरत शायद नही है। भाई द्वारा दिया गया छोटा सा उपहार जब तक बहन के पास होता है वह उसे देखते ही के प्यार की उमंगों और लहरों में खो जाती है। भाई और बहन को पर्व की इसी विशेषता को पुनः याद करते हुए उसे अमिट बनाने आगे आना होगा।

साहित्य के नोबेल पुरूस्कार से सम्मानित गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने राखी पर्व को एक अलग ही भावना से जोड़ा था। उनका मानना था कि रक्षाबंधन का पर्व केवल भाई-बहन के प्रेम संबंधों का ही पर्व नही बल्कि इंसानियत का पर्व है। विश्व कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इस पर्व पर बंग-भंग के विरोध में जन-जागरण किया था। साथ ही इस पर्व को एकता और भाईचारे का प्रतीक बनाया था। सन् 1947 के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में जन जागरण के लिए भी इसी पर्व का सहारा लिया गया। इसमें कोई संदेह नही कि रिश्तों से ऊपर उठकर रक्षाबंधन की भावना ने हर समय प्रत्येक जरूरत पर अपना रूप बदला है। जरूरी होने पर हिन्दु युवती ने मुसलमान भाई की कलाई पर राखी का धागा बाँधकर प्यार को धरम भाई तक पहुँचाया, तो सीमा पर ऐसी ही बहनों ने सैनिकों को राखी बाँधकर उन्हें अपना भाई बनाया। वर्तमान में राखी देश की रक्षा, पर्यावरण की रक्षा, हितों की रक्षा आदि के लिए भी बाँधी जाने लगी है। इस प्रकार देखा जाये तो यह पर्व हमारा राष्ट्रीय पर्व बन चुका है।

सुप्रसिद्ध कवियित्री सुभद्रा कुमारी चौहान से लेकर आजादी के दीवाने चंद्रशेखर आजाद तक ने राखी के महत्व को उस ऊंचाई पर पहुँचाया जहाँ इस पर्व का उत्साह हर किसी के लिए आनंद और खुशी लुटाता दिखायी पड़े। सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपनी पंक्तियों में लिखाः-

मैंने पढ़ा शत्रुओं को भी, जब-जब राखी भिजवायी,

रक्षा करने दौड़ पड़े वे, राखी बन्ध शत्रु भाई।।

इसी तरह क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आजाद के जीवन की एक घटना ने राखी के धागों को मजबूती प्रदान की है। बात उन दिनों की है जब क्रांतिकारी आजाद स्वतंत्रता की जंग में व्यस्त थे। फिरंगियों से बचने एक बार उन्होंने तूफानी रात में एक कुटिया में शरण लेना चाहा। उस कुटिया में एक विधवा अपनी बेटी के साथ रहती थी। हट्टे-कट्टे आजाद को डाकू समझकर उस विधवा ने उन्हें शरण देने से इंकार कर दिया, किन्तु जब आजाद ने अपना परिचय दिया तो वह महिला शरण देने तैयार हो गयी। बातचीत के दौरान आजाद को आभास हो गया कि गरीबी के कारण उसकी बेटी का विवाह नही हो पा रहा है। आजाद ने उस वृद्धा से कहा कि मुझ पर 5 हजार रूपये का ईनाम रखा गया है, मुझे फिरंगियों को सौंपकर उस रूपये से बेटी का विवाह कर दो। यह सुनकर उस वृद्धा विधवा ने कहा- भैय्या़। तुम देश की आजादी के लिए अपनी जान हथेली में लेकर घूम रहे हो और न जाने कितनी बहु-बेटियों की इज्जत तुम्हारे भरोसे है। मैं हरगिज ऐसा नही कर सकती। यह कहते हुए उसने एक रक्षा सूत्र आजाद की कलाई में बांध दिया सुबह जब विधवा की आँख खुली तो आजाद वहां से जा चुके थे और उनकी तकिया के नीचे पांच हाजार रूपये रखे थे। एक पर्ची में आजाद ने लिख छोड़ा था-अपनी प्यारी बहन हेतु एक छोटी सी भेंट आजाद।।

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(डा. सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

मो. नंबर 94255-59291

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