शनिवार, 30 सितंबर 2017

इटली की लोक कथाएँ–1 : 6 पैसा परमेश्वर है // सुषमा गुप्ता

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एक बार एक देश का एक राजकुमार था जो बहुत अमीर था। उसके दिमाग में एक बार कुछ ऐसा आया कि वह किसी राजा के महल के सामने अपना एक ऐसा महल बनवाये जो उस राजा के महल से कहीं ज़्यादा शानदार हो और कहीं ज़्यादा बढ़िया हो।

उसने ऐसा ही किया। वह एक दूसरे देश में गया और वहाँ के राजा के महल के सामने एक बहुत ही शानदार महल बनवाया। जब उसका वह महल बन गया तो उसने उस महल के सामने उसने बड़े-बड़े अक्षरों में लिखवा दिया “पैसा परमेश्वर है” ।

जब उस देश का राजा अपने महल से बाहर निकला और उसने वह महल देखा तो उसने तुरन्त उस राजकुमार को बुलवाया। राजकुमार उस शहर में नया था और अब तक उसने उस राजा का दरबार नहीं देखा था।

राजा बोला — “बधाई हो। तुम्हारा महल तो वाकई बड़ा आश्चर्यजनक है। इस महल के मुकाबले में मेरा महल तो झोंपड़ी जैसा लग रहा है। पर यह लिखना कि “पैसा परमेश्वर है” यह क्या तुम्हारा अपना विचार है?”

राजकुमार को लगा कि जैसे उसने कुछ ज़रा ज़्यादा ही हाँक दी है। उसने जवाब दिया — “जी हाँ, पर अगर राजा साहब इसको पसन्द नहीं करते तो मैं यह बोर्ड यहाँ से हटा देता हूँ।”

“नहीं नहीं, मैं तो ऐसा सोचता भी नहीं कि तुम ऐसा करो। मैं तो बस तुम्हारे मुँह से सुनना चाहता था। पर ज़रा यह तो बताओ कि इस बात से तुम्हारा मतलब क्या है। क्या तुम मुझे मरवाना चाहते हो?”

राजकुमार को लगा कि यह तो अब उसके गले में फन्दा ही पड़ गया। वह बोला — “राजा साहब, माफ कीजियेगा। मेरा यह मतलब बिल्कुल भी नहीं था। मैं यह बोर्ड वहाँ से हटवा दूँगा और अगर आपको यह महल भी पसन्द नहीं है तो मैं इसको भी तुड़वा दूँगा।”

राजा बोला — “नहीं नहीं, महल को तो ऐसे ही रहने दो जैसा वह है पर क्योंकि तुम इस बात का दावा करते हो कि “पैसा परमेश्वर है” तो तुम्हें इसको मुझे साबित करके दिखाना पड़ेगा।

मैं तुमको तीन दिन देता हूँ। इन तीन दिनों के बीच तुम मेरी बेटी से बात करके दिखाओ तो मैं जानूँ। अगर तुम उससे बात कर सके तो बहुत अच्छी बात है, मैं उसकी शादी तुम्हारे साथ कर दूँगा। और अगर नहीं कर सके तो मैं तुम्हारा सिर कटवा दूँगा। ठीक?”

राजकुमार ने यह सुना तो वह वहाँ से चला तो आया पर उसकी भूख प्यास सब गायब हो गयी। वह तो बस दिन रात यही सोचता रहा कि “मैं अपनी जान कैसे बचाऊँ।”

दूसरे दिन तो उसको यह लगने लगा कि वह तो अपने इस काम में बस फेल होने वाला है सो उसने अपनी वसीयत लिखने का फैसला किया।

राजकुमारी से बात करने की उसकी कोशिशें सब बेकार थीं क्योंकि राजा की बेटी एक ऐसे किले में बन्द थी जिसके चारों तरफ 100 पहरेदार पहरा दे रहे थे।

राजकुमार का रंग पीला पड़ गया था और उसके जोड़-जोड़ ढीले पड़ गये थे। वह अपने बिस्तर पर पड़ा अपनी मौत का इन्तजार कर रहा था। तभी उसकी बूढ़ी आया आयी जिसने उसको बचपन से पाला था और वह अभी भी उसकी सेवा कर रही थी।

उसको इस हालत में देख कर उसने राजकुमार से पूछा — “बेटे, तुमको क्या हुआ है? तुम्हारे मन पर क्या बोझ है? बताओ तो।”

रुआँसा हो कर उसने अपनी आया को अपनी सारी कहानी बता दी। आया बोली — “सो? इस छोटी सी बात के लिये क्या तुम ऐसे नाउम्मीद हो कर बैठे रहोगे? तुम तो मुझे हँसा रहे हो। अच्छा मैं देखती हूँ कि मैं तुम्हारे लिये क्या कर सकती हूँ।”

तुरन्त ही वह शहर के एक बहुत ही होशियार चाँदी का काम करने वाले के पास गयी और उसको चाँदी की एक बतख बनाने के लिये कहा जो अपने पंख खोल और बन्द कर सकती हो। और यह बतख भी इतनी बड़ी होनी चाहिये कि उसमें एक आदमी आराम से बैठ सके और यह बतख कल तक तैयार हो जानी चाहिये।”

“कल तक? क्या तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है?”

“हाँ कल तक। मैंने कहा न कल तक। तुमने सुना नहीं।”

कह कर आया ने सोने के सिक्कों का एक थैला उस चाँदी का काम करने वाले की तरफ फेंका और बोली — “दोबारा सोचना। यह तो केवल पेशगी है। मैं कल तुमको और पैसे दूँगी जब तुम मुझको वह बतख दोगे।”

यह सब देख कर तो उस चाँदी का काम करने वाले की तो बोलती ही बन्द हो गयी। उसने सोचा “इतने पैसे से तो दुनियाँ में बहुत फर्क पड़ता है।”

पैसे ले कर वह उस बुढ़िया से बोला — “मैं तुमको इस बतख को कल तक देने की अपनी पूरी पूरी कोशिश करूँगा।” अगले दिन बतख तैयार थी और वह बतख तो उसने बहुत ही सुन्दर बनायी थी।

बुढ़िया आया राजकुमार से बोली — “अपनी वायलिन ले लो और इस बतख के अन्दर बैठ जाओ। मैं इस बतख को ले कर बाहर निकलती हूँ। जब हम सड़क पर पहुँच जायें तो तुम अपनी वायलिन बजाना शुरू कर देना।”

राजकुमार उस बतख में बैठ गया और वह बुढ़िया उस बतख को ले कर सारे शहर में चक्कर काटती रही। वह बुढ़िया आया उस बतख को एक बहुत ही खूबसूरत रिबन से बाँध कर खींचती रही और वह राजकुमार उस बतख में बैठा वायलिन बजाता रहा।

यह तमाशा देखने के लिये जल्दी ही चारों तरफ लोग सड़कों पर इकठ्ठा हो गये। शहर में कोई ऐसा आदमी नहीं था जो ऐसी आश्चर्यजनक बतख देखने के लिये बाहर न आया हो।

अब यह खबर किले तक भी पहुँची जिसमें राजा की बेटी बन्द थी। उसने अपने पिता से पूछा कि क्या वह भी यह आश्चर्यजनक चीज़ देख सकती थी।

राजा बोला — “उस सुन्दर राजकुमार का तीन दिन का समय कल तक पूरा हो जायेगा उसके बाद तुम बाहर जा कर वह बतख देख सकती हो।”

पर राजा की बेटी ने सुन रखा था कि वह बुढ़िया कल वहाँ से चली जायेगी। यह बात जब उसने राजा को बतायी तो राजा ने उस बतख को किले के अन्दर ही बुलवा लिया ताकि उसकी बेटी भी उस आश्चर्यजनक बतख को देख सके।

यही तो वह बुढ़िया आया चाहती थी। राजकुमारी के कमरे में अन्दर पहुँच कर जैसे ही राजा की बेटी उस चाँदी की बतख के साथ उसमें से निकलते संगीत का आनन्द लेती अकेली रह गयी कि बुढ़िया आया उस बतख को वहाँ छोड़ कर खिसक ली।

अचानक बतख के पंख खुले और उस बतख में से एक आदमी निकल पड़ा। अचानक ही बतख में से किसी अजनबी को अपने कमरे में देख कर राजकुमारी डर गयी और वह चिल्लाने ही वाली थी कि वह अजनबी आदमी बोला — “डरो नहीं। मैं ही वह राजकुमार हूँ जिससे तुम्हारे पिता ने तुमसे बात करने की शर्त लगायी है। और अगर मैं ऐसा न कर सका तो कल मेरा सिर काट दिया जायेगा। तुम यह कह कर कि तुमने मुझसे बात की है मेरी जान बचा सकती हो।”

अगले दिन राजा ने राजकुमार को बुलाया और पूछा — “क्या तुम्हारा पैसा मेरी बेटी से बात करने में तुम्हारी सहायता कर सका?”

“जी राजा साहब।”

“क्या? क्या तुम यह कहना चाहते हो कि तुम मेरी बेटी से बात कर सके?”

“जी राजा साहब। वैसे आप उसी से पूछ लीजिये।”

राजा ने अपनी बेटी को बुलवाया। वह अन्दर आयी तो उसने राजा को बताया कि राजकुमार उस चाँदी की बतख के अन्दर छिप कर उसके कमरे में आया था और राजा खुद उस बतख को अन्दर ले कर आये थे।

यह सुन कर राजा ने अपना ताज अपने सिर से उठा कर राजकुमार के सिर पर रख दिया और बोला — “तुम जीते मैं हारा। इसका मतलब यह है कि तुम्हारे पास केवल पैसा ही नहीं है एक अच्छा दिमाग भी है। तुम खुश रहो। मैं अपनी बेटी की शादी तुम्हारे साथ कर रहा हूँ।”

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं. इथियोपिया की 45 लोककथाओंको आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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