सोमवार, 9 अक्तूबर 2017

देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–3 : 8 चाचा भेड़िया // सुषमा गुप्ता

5 चाचा भेड़िया[1]

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यह बहुत दिनों पहले की बात है कि एक बहुत ही लालची लड़की थी। एक बार ऐसा हुआ कि मेले[2] के समय उसके स्कूल की मास्टरनी जी ने बच्चों से कहा — “अगर तुम लोग ठीक से रहोगे और अपनी बुनाई समय से खत्म कर लोगे तो मैं तुमको खाने के लिये पैनकेक[3] दूँगी।”

पर यह छोटी लड़की तो बुनना जानती नहीं थी सो उसने उस मास्टरनी से टौयलेट जाने की इजाज़त माँगी और वहाँ जा कर वह बैठ गयी और सो गयी।

जब वह अपनी कक्षा में वापस आयी तो दूसरी लड़कियों ने अपने अपने पैनकेक खा कर खत्म भी कर दिये थे। वह रोती रोती घर चली गयी और जा कर माँ को सब कुछ बताया कि उस दिन स्कूल में क्या हुआ था।

माँ बोली — “बेटी अच्छी बच्ची बन। मैं तेरे लिये बहुत सारे पैनकेक बना दूँगी।”

पर उसकी माँ इतनी गरीब थी कि उसके पास तो तवा भी नहीं था जो वह उसके लिये पैनकेक बना सकती। सो एक दिन उसने अपनी बेटी से कहा — “जा चाचा भेड़िया के पास जाना और जा कर जरा उनसे तवा उधार माँग ला तो मैं तेरे लिये पैनकेक बना दूँगी।”

वह छोटी लड़की चाचा भेड़िया के घर चल दी और उसके घर पहुँच कर उसने उसका दरवाजा खटखटाया।

“कौन है?”

“मैं हूँ।”

“कितने साल हो गये हैं इतने दिनों में किसी ने इस घर का दरवाजा नहीं खटखटाया। तुम्हें क्या चाहिये।”

“माँ ने मुझे यहाँ इसलिये भेजा है कि अगर आप हमें पैनकेक बनाने के लिये अपना तवा उधार दे सकें तो आपकी बड़ी मेहरबानी होगी।”

“एक मिनट। ज़रा मैं अपनी कमीज पहन लूँ।”

“खट खट खट।”

“एक मिनट। ज़रा मैं अपना जॉघिया पहन लूँ।”

“खट खट खट।”

“एक मिनट। ज़रा मैं अपनी पैन्ट पहन लूँ।”

“खट खट खट”

“एक मिनट। ज़रा मैं अपना बड़ा वाला कोट पहन लूँ।”

यह सब करने के बाद चाचा भेड़िये ने दरवाजा खोला और उस लड़की को तवा दे कर बोला — “यह तवा मैं तुमको दे तो रहा हूँ पर अपनी माँ को बोलना कि वह यह तवा मुझे पैनकेक से भर कर वापस करेगी। और हाँ इसके साथ में एक गोल डबल रोटी और एक बोतल शराब भी।”

“हाँ, हाँ, मैं आपके लिये सब कुछ ले कर आऊंगी।” कह कर वह लड़की वह तवा ले कर चली गयी।

जब वह घर पहुँची तो उसकी माँ ने उसके लिये बहुत सारे पैनकेक बनाये और उसके चाचा के लिये भी।

रात होने से पहले उसने बच्ची से कहा — “ये पैनकेक, यह गोल डबल रोटी और यह शराब की बोतल तुम अपने चाचा भेड़िये के लिये ले जाओ।”

जब वह रास्ते में जा रही थी तो उसको पैनकेक की बहुत ज़ोर की खुशबू आ रही थी। उसने सोचा “ओह कितनी अच्छी खुशबू है। मैं उनमें से एक खा लूँ।”

सो उसने उनमें से एक पैनकेक खा लिया। पर फिर दूसरा, और फिर तीसरा और फिर चौथा . . . . और बहुत जल्दी ही वह सारे पैनकेक खा गयी और इस तरह वे सब पैनकेक खत्म हो गये।

अब उसके बाद नम्बर आया डबल रोटी का और फिर शराब का। वह भी सब खत्म हो गये। अब उस तवे को भरने के लिये उसने गधे का लीद उठा ली और वह शराब की बोतल गन्दे पानी से भर ली। डबल रोटी की जगह उसने चूने का एक गोला रख लिया जो उसने वहीं रास्ते में से एक मकान बनाने वाले की जगह से उठा लिया था।

जब वह चाचा भेड़िया के घर पहुँची तो उसने यह सब गन्दी चीज़ें उसको दे दीं।

चाचा भेड़िया ने पैनकेक का एक कौर खाया तो उसको तुरन्त थूक कर बोला — “अरे यह तो गधे की लीद है।”

तुरन्त ही उसने अपना मुँह साफ करने के लिये शराब की बोतल खोली तो उसके स्वाद से भी उसका मुँह खराब हो गया।

फिर उसने डबल रोटी खायी तो चिल्लाया — “अरे यह तो चूना है।”

उसने बच्ची को घूर कर देखा और बोला — “तूने मुझे धोखा दिया? आज की रात मैं तुझे खा जाऊंगा।”

बच्ची दौड़ कर घर गयी और अपनी माँ से बोली — “माँ, आज की रात चाचा भेड़िया मुझे खाने आ रहे हैं।”

उसकी माँ बेचारी घर के सारे दरवाजे खिड़कियाँ बन्द करने लग गयी। फिर उसने घर के सारे छेद बन्द किये ताकि चाचा भेड़िया घर में न घुस सके। पर वह घर की चिमनी बन्द करना भूल गयी।

जब रात हो गयी और बच्ची सोने चली गयी तो घर के बाहर चाचा भेड़िये की आवाज सुनायी पड़ी — “मैं अब तुम्हें खाऊंगा। मैं यहीं बाहर हूँ। मैं आ रहा हूँ।”

और फिर उसके बाद छत पर पाँवों की आवाज सुनायी पड़ी — “मैं अब तुम्हें खाऊंगा। मैं यहाँ छत पर हूँ।”

और फिर चिमनी में से आवाज आयी — “मैं अब तुम्हें खाऊंगा। मैं यहाँ चिमनी के ऊपर हूँ।”

“माँ माँ, भेड़िया आ रहा है।”

माँ बोली — “चादर के अन्दर छिप जा।”

“मैं अब तुम्हें खाऊंगा। मैं अब चिमनी से नीचे आ गया हूँ।”

वह बच्ची तो थर थर काँपने लगी और डर के मारे बहुत छोटी सी सुकड़ कर अपने बिस्तर के एक तरफ को हो गयी।

“मैं अब तुम्हें खाऊंगा। अब मैं यहीं कमरे में हूँ।”

छोटी लड़की ने अपनी सॉस रोक ली।

“मैं अब तुम्हें खाऊंगा। मैं अब तुम्हारे बिस्तर के पास हूँ।” और यह कह कर वह उसको खा गया।

और इस तरह चाचा भेड़िया हर लालची लड़की को खा जाता है। लालच करना अच्छी बात नहीं है।

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[1] Uncle Wolf (Story No 49) – a folktale from Italy from its Bologna area. Adapted from the book “Italian Folktales”, by Italo Calvino. Translated by George Martin in 1980.

[2] Carnival time

[3] Pancakes are typically made of white flour solution like very thick, 1/2” thick South Indian Dosa, but in very small size – in about 6” diameter and is normally eaten in breakfast with syrup or butter etc. See their picture above.

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं के संकलन में से क्रमशः  - रैवन की लोक कथाएँ,  इथियोपिया इटली की  ढेरों लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी….)

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