शुक्रवार, 27 अक्तूबर 2017

देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–5 : 17 मिसेज़ लोमड़ी और मिस्टर भेड़िया // सुषमा गुप्ता

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17 मिसेज़ लोमड़ी और मिस्टर भेड़िया[1]

एक बार एक भेड़िया और एक लोमड़ी थे जो आपस में एक दूसरे को भाई बहिन कहते थे। उन्होंने आपस में यह तय कर रखा था कि वे जो कुछ भी पकड़ेंगे उसे आपस में बाँट कर खायेंगे।

एक दिन भेड़िया इधर उधर सूँघते हुए चला जा रहा था कि उसको एक भेड़ की बू आयी। उसने लोमड़ी से कहा — “लोमड़ी बहिन, मैं ज़रा इस घास के मैदान में देखने जा रहा हूँ अगर यहाँ कहीं जानवरों का कोई झुंड चर रहा हो तो।”

वह उधर गया तो वहाँ तो उसको जानवरों का एक बहुत ही बड़ा झुंड चरता हुआ मिल गया। तुरन्त ही उसने एक मेमने[2] को अपने मुँह में पकड़ा और वहाँ से अपनी जान बचा कर भागा।

पर उसको भागने में कुछ देर हो गयी तो उसने महसूस किया कि उसको किसी ने मारा। उस मार की वजह से वह एक हफ्ते तक बिस्तर में पड़ा रहा।

भेड़िये ने सोचा क्योंकि मुझे इस मेमने की वजह से इतना कष्ट सहना पड़ा इसलिये यह मेमना मेरा है और इसे मैं अकेला ही रखूँगा। यह सोच कर उसने उस मेमने को भूनने के लिये आग के ऊपर लटका दिया और इस बारे में लोमड़ी से कुछ नहीं कहा।

बाद में लोमड़ी ने भेड़िये से पूछा — “भेड़िये भाई, क्या तुमको वहाँ कोई जानवर मिला? क्या तुम उन जानवरों में से किसी को पकड़ सके?”

भेड़िया बोला — “बहिन, हाँ मुझे जानवर तो मिले पर मैंने देखा कि उनके पीछे जाना बहुत खतरनाक था सो मैं तो वापस लौट आया। और मेरी सलाह तो यही है कि हम उनको छोड़ ही दें तो अच्छा है।”

लोमड़ी को उसकी बातों पर विश्वास नहीं हुआ सो उसने सोचा “अब मैं तुमको देखती हूँ।” सो वह भी खाना ढूँढने चल दी।

घूमते घूमते लोमड़ी को एक जगह ऐसी मिल गयी जहाँ बहुत सारा शहद था। उसने भेड़िये से कहा — “भेड़िये भाई, मुझे एक जगह मिली है जहाँ बहुत सारा शहद है। एक दिन हम दोनों वहाँ उसको देखने चलेंगे।”

लेकिन फिर भेड़िये से बिना कुछ कहे वह उस शहद की जगह अकेली ही चली गयी। वहाँ तो उसको बहुत सारा शहद मिल गया। उसने उसको चखा, अपने होठ चाटे और बोली — “ओह, कितना मीठा शहद है।”

हालाँकि भेड़िये का शरीर अभी भी उस मार से दर्द कर रहा था पर जब भी वह लोमड़ी से मिलता तो हर बार उससे पूछता — “लोमड़ी बहिन, तुम शहद लाने कब चल रही हो?”

लोमड़ी कहती — “भेड़िये भाई, तुम मुझसे क्या चाहते हो? आज तो मैं बहुत चली हूँ सो बहुत थक गयी हूँ।फिर कभी चलेंगे।”

भेड़िया ने पूछा — “पर बहिन तुम इतनी देर तक कहाँ गयीं, कहाँ रहीं जो तुम इतना थक गयीं?”

लोमड़ी बोली — “भेड़िये भाई, मैं एक छोटे से शहर गयी थी जिसका नाम है “टेस्ट इट।[3] बस मैं जरा वहीं चली गयी थी।”

अगले दिन भेड़िये का मेमना खत्म हो गया तो उसने फिर लोमड़ी से पूछा — “बहिन लोमड़ी, हम लोग शहद की जगह कब चलेंगे?”

लोमड़ी बोली — “भाई वह जगह बहुत दूर है। देखना पड़ेगा। जब मैं थोड़ी ठीक होऊँगी तब में तुम्हें बताऊँगी।”

“पर तुम तो बहुत दिन से दिखायी ही नहीं दीं। कहाँ थीं तुम?”

“भेड़िये भाई, मैं बहुत थकी हुई हूँ। आज मैं “पिल्फ़र इट”[4] नाम के शहर गयी थी।”

यह सुन कर बेचारा भेड़िया वहाँ से चला आया। दो दिन बाद वह फिर लोमड़ी से मिला और बोला “आज उस जगह को देखने चलें लोमड़ी बहिन?”

लोमड़ी बोली — “ठीक है कल चलते हैं।”

पर जैसे ही भेड़िया वहाँ से गया लोमड़ी वहाँ से अकेली ही उस शहद की जगह चल दी। वह वहाँ सीधी गयी और वहाँ जा कर उसने सारा शहद खा लिया। यहाँ तक कि उसने उस बरतन का तला भी चाट चाट कर साफ कर दिया जिसमें वह शहद रखा था।

पर जब वह उस बरतन का तला चाट रही थी तो शहद के मालिक लोग आ गये सो लोमड़ी वहाँ से तुरन्त ही भाग जाना पड़ा।

अगले दिन लोमड़ी बोली — “भेड़िये भाई, हम लोगों को शहद खाने के लिये काफी दूर के शहर में जाना पड़ेगा। सो अगर तुम मेरे साथ चलना चाहो तो मेरे साथ साथ आ सकते हो। इस शहर का नाम है “फ़िनिश इट”[5]।”

भेड़िया अभी भी अपनी पुरानी मार से लँगड़ा कर चल रहा था पर फिर भी वह शहद खाने के लिये लोमड़ी के साथ चल दिया।

लोमड़ी उसको एक पहाड़ की चोटी पर ले गयी। जब वे वहाँ पहुँचे तो लोमड़ी बोली — “अब हम यहाँ फ़िनिश इट शहर में आ गये हैं। तुम आगे आगे चलो और मैं पीछे यह देखने के लिये रहती हूँ कि कोई दूसरा हमको पीटने के लिये यहाँ न आ जाये।”

बेचारा भेड़िया आगे गया। पर क्योंकि उन शहद के मालिकों को अब तक यह पता चल गया था कि उनका शहद चुरा लिया गया है सो वे वहीं बैठे यह देखने के लिये पहरा दे रहे थे कि देखें तो वह कौन है जो उनका शहद चुरा ले गया है।

भेड़िया जब आगे शहद खाने के लिये गया तो उसको केवल शहद से लिपटे टूटे हुए बरतन ही मिले। अब भेड़िया तो भूखा था सो वह जल्दी जल्दी वे टूटे बरतन ही चाटने लगा।

अभी वह वे बरतन चाट ही रहा था कि शहद के मालिक निकल आये और उसको बहुत पीटा। लोमड़ी अपनी छिपी हुई जगह से पिटते हुए भेड़िये को नाचते हुए देख कर बहुत खुश हो रही थी।

किसी तरह से भेड़िया वहाँ से बच निकलने में सफल हो गया और कराहता हुआ लोमड़ी के पास आ गया।

लोमड़ी उसको देखते हुए बोली — “अरे भेड़िये भाई, यह क्या हुआ?”

भेड़िया रो कर बोला — “अरे लोमड़ी बहिन देखो न, उन्होंने मुझे कितना पीटा है। अगर हम चाहते हैं कि वे हमको दोबारा न पकड़ लें तो चलो हम यहाँ से भाग चलते हैं।”

“भाग चलें? अरे हम कैसे भाग सकते हैं? मेरे पैर में तो मोच आयी हुई है मेरे लिये तो चलना भी मुश्किल है भागना तो दूर।”

इस तरह भेड़िये को पिटवा कर और वहाँ से उसको भागने के लिये मजबूर कर वह लोमड़ी लँगड़ाने का बहाना करके वहाँ से लँगड़ाती हुई चल दी।

रास्ते में वह कहती आ रही थी — “ओह भाई भेड़िये, मैं इस टूटे हुए पैर से कैसे चलूँ? कम से कम थोड़ी दूर तक तो तुम मुझे अपनी पीठ पर बिठा कर ले चलो।”

भेड़िये के पास उसको अपनी पीठ पर बिठा कर चलने के अलावा और कोई चारा नहीं था। इस तरह अच्छी भली लोमड़ी पिटे हुए भेड़िये की पीठ पर बैठ कर गाना गाती चली आयी।

भेड़िये ने पूछा कि ऐसी हालत में वह गाना क्यों गा रही थी। लोमड़ी बोली “तुमको खुश करने के लिये ताकि तुम थकान महसूस न करो।”

आखिर वे घर आये। भेड़िया मार की वजह से बहुत घायल था और लोमड़ी को अपनी पीठ पर बिठा कर लाने की वजह से थका हुआ था। वह घर आते ही जमीन पर गिर पड़ा और फिर कभी ठीक नहीं हुआ।

इस तरह लोमड़ी ने भेड़िये से अपना बदला लिया जो सारा मेमना अपने आप अकेला ही खा गया था।


1


[1] Mrs Fox and Mr Wolf (Story No 125) – a folktale from Italy from its Naples area.

Adapted from the book : “Italian Folktales” by Italo Calvino. Translated by George Martin in 1980.

[2] Translated for the word Baby sheep or lamb

[3] Taste it

[4] Pilfer it – means stealing in small quantity

[5] Finish it

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं के संकलन में से क्रमशः  - रैवन की लोक कथाएँ,  इथियोपिया इटली की  ढेरों लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी….)

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