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संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 3 - किस्सा अपनों का //अजय कुमार दुबे

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प्रविष्टि क्र 3 अजय कुमार दुबे  किस्सा अपनों का   पार्क में ज्यादा भीड़ नहीं थी। पेड़ जैसे शान्त खड़े, किसी के गम शरीक हो़, बिना हिले-डुले शोक...

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प्रविष्टि क्र 3

अजय कुमार दुबे 

किस्सा अपनों का 

पार्क में ज्यादा भीड़ नहीं थी। पेड़ जैसे शान्त खड़े, किसी के गम शरीक हो़, बिना हिले-डुले शोक ग्रस्त थे। बड़ी उमस थी। लेकिन बच्चों को क्या? वे तो अपने खेल में मगन थे। उन्हें किसी के दुख दर्द से क्या मतलब है,वे तो अपने में मस्त थे। लेकिन हर कोई तो मस्त नहीं होता न, कुछ प्रौढ़ किस्म के लोग अपने अपने दर्द समेटे,कुछ देर के लिये ही सही,सब कुछ भूले बैठे-हँसी मजाक में मस्त थे,, आप ये मत समझिये कि किसी खास मकसद की बात बात कर रहे थे। पार्क में तो कोई भी हो सकता है। लोग,बच्चे भी हो सकते हैं। मैं तो आपको उनका किस्सा सुनाना चाहता था जो अपने आप में कभी महत्वपूर्ण नहीं हो पाये। आप कहेंगे कि क्या ऐसा हो सकता है?क्या दुख था उन्हें? कौन लोग थे? वे कोई भी लोग हो सकते हैं, होंगे तो आप जैसे ही न,कहीं दूसरी दुनिया से तो आ नहीं जायेंगे। अगर मैं कहूँ कि वे रामप्रसाद, प्रेमनारायण, रामकरण थे तो जल्दी से कोई-कोई कहेंगे,‘‘अरे उस रामप्रकाश को तो मैं जानता हूँ। वही न जो सॉंवला है और पान ज्यादा खाता है। तब तो किसी के लिये भी अपनी कहानी लिखा जाना संभव नहीं होगा और मैं भी तो आदमी हूँ। मैं तो सांसत में फंस जाउंगा। अर्जुन की तरह अपना कलम रख दूंगा-आपसे ही कहूँगा-मेरी तो कलम ही नहीं चलती,हर कोई मेरा जानने वाला है, किस के बारे में लिखूँ, किसके लिये लिखूँ। तब क्या आप कृष्ण बन कर मेरे सामने आयेंगे ,और बोलेंगे -नाम के चक्कर में न पड़ो-शुरु हो जायो। खैर आप भी कहेंगे.............छोड़िये ये बातें बाद में,अभी तो पार्क में कुछ लोग बैठे आपस में बात कर रहे थे। इतना ही कह देना काफी नहीं होगा। आप कहेंगे- ‘‘,फिर क्या हुआ?’’ ‘‘सुना है,बड़ा धमाका हो गया है,आज शहर में। हर जगह जैसा किसी समय महानगरों में हुआ करता था,छोटे-छोटे शहर,कस्बे में भी उसी तरह होने लगा है,आये दिन बलात्कार,हत्या,डकैती। पहले तो लोग आसानी से मनचाहा घूमा करते थे। अब तो बडा़ खराब जमाना आ गया है।

‘‘अरे छोड़ो यार तुम भी क्या ले बैठे’’ हां-हां तुम्हें ये सब दिखाई नहीं देता न, तभी तो ऐसा कह लेते हो। जब मैं नौकरी में आया था ,तब से आज तक क्या-क्या बदल गया है, हमारे अधिकारी ऐसे होते थे कि किसी की भी हिम्मत नहीं होती थी कि जाकर सीधे मिल लें। ठेकेदार तो चार हाथ दूर रहते-पूछते थ,े ‘‘साहब का मिजाज कैसा है।’’ रिश्वत तो लेते नहीं थे, जब किसी ने कोशिश की तो फटकार दिया।’’ किस विभाग की बात कर रहे हो,यार’?’’‘‘और किसी विभाग की बात क्यों करुँगा।’’ ‘‘अपने सिचाई विभाग की ही बात करुंगा न! नहर का दफतर आज भी उसे यों ही नहीं कहते।’’ हाँ तो मैं कह रहा था-हमारे प्रदेश मे सिचाई विभाग की बात ही निराली है, यहाँ हर कोई का अपना समाज है,अपना तामझाम है, अपनी कहानी है, अपना दर्द है, अपनी बेबसी है,अपना स्वार्थ है। आज कितना बदल गया है इंसान। कभी कभी लगता है-क्या दिन थे वे भी। विभाग की देख-रेख,.चल-चलाव के लिये अपने अधिकारी ,कर्मचारी,दफतर है। इन सब का अपना अलग तेवर है,अपनी अलग संस्कृति है,अपना एक समाज है जो समय के साथ -साथ बदलता है,उसके पूरे समाज की मान्यतायें बदलती हैं। पुराने कर्मचारियों,अधिकारियों के किस्से अक्सर सुनने को मिलते हैं। अक्सर लोग कहा करते हैं,पहले अधिकारियों,कर्मचारियों का मान-सम्मान था,तब होते थे हीरा,आज हैं क्या? अक्सर हरेक अपने अतीत को अच्छा बताता है-वर्तमान को भूल जाता है लेकिन मैं तो आपको दोनों की बातें कहूँगा। ‘‘हाँ फिर क्या हुआ?’’ -कहने से पहले कह देता हूँ। लेकिन क्या सब आज ही जान लोगे? आज तो बस इतना जान लो कि कल हम भी पुराने हो जायेंगे। और इसी तरह से याद किये जायेंगे। मेरा मन तो बहुत है, कहने को। क्या करुँ। क्या समाज हमारे चलाये चलता है। ये सब तो अपने आप ही होता चलता है। और इतिहास बनता जाता है। किसी को पता चलता है क्या? वो तो अपना रुप स्वयं बदलता चलता है और बनता जाता है।

हमारे सिचाई विभाग में भी ऐसा ही होता रहता है। सब अपने में व्यस्त रहते हैं-एक दूसरे से जुड़े हुये। यह जुड़ाव भी नौकरी की मजबूरी ही है, वर्ना एक दूसरे के साथ जो विभागीय लगाव है,वह बहुत महत्वपूर्ण नहीं है। आज तो सारा समाज ही धन के आवागमन पर बना हुआ है और जो एक दूसरे के लिये मान्यतायें बनती बिगड़ती रहती हैं उसका आधार धन ही है। आज हम जिसकी निन्दा कर रहे होते हैं,थोड़ी देर बाद ही उसके सामने प्रशंसा के पुल बांधते नजर आते हैं। धन के चलन की तरह कर्मचारियों-अधिकारियों का व्यवहार भी होता है, जो बनता बिगड़ता रहता है और चलता जाता है-यह समाज। निन्दा का अपना कोई चेहरा नहीं होता। वैसे तो इस विभाग ने बहुत सी सुविधायें दे रखी हैं-अंग्रेजों के समान क्योंकि कुछ भी नहीं बदला है,बदला है तो केवल लोग। लेकिन कर्मचारी तो पुराने ढर्रे पर चलना ज्यादा पसंद करता है। कहा न, निन्दा करने वाले को चेहरा को कोई चेहरा सूट नहीं करता है। इसी तरह विभाग में भी एक दूसरे के प्रति प्रेम केवल काम के समय तक ही होता है। बाद में कर्मचारी दूसरे से मुँह फेर लेता है। आज नहीं फेरता तो, आगे किसी और कार्यसिध्दि के कारण।

सिचाई विभाग में निर्माण के साथ-साथ जीवन के अनेकों आयाम देखने को मिलते हैं। पूरा एक महाभारत बसता है-विभाग के लोगों के जंगल में। कभी-कभी तो लगता है,हर चीज कैसे बनती जाती है। लेकिन यह बात बुध्दिमत्तापूर्ण नहीं है। आप कहेंगे इसमें क्या? लोग अपने आप ही बदलते जाते हैं,उन्हें कोई नहीं बदलता। ऐसा ही है,आप ही सही हैं।

पार्क में ज्यादा भीड़ नहीं थी। पेड़ जैसे शान्त खडे, किसी के गम शरीक हो़, बिना हिले-डुले शोक ग्रस्त थे। बड़ी उमस थी। लेकिन बच्चों को क्या? वे तो अपने खेल में मगन थे। उन्हें किसी के दुख दर्द से क्या मतलब है,वे तो अपने में मस्त थे। लेकिन हर कोई तो मस्त नहीं होता न, कुछ प्रौढ़ किस्म के लोग अपने अपने दर्द समेटे,कुछ देर के लिये ही सही,सब कुछ भूले बैठे-हँसी मजाक मे मस्त थे। उन छोटे-छोटे झुंडों का आपस में इतना ही संबंध था कि,वे एक ही पार्क बैठे थे। इसी तरह विभाग में अपना वर्चस्व कायम करने के लिये अपना अहम बताने के लिये लोग झुंडो में एकत्रित हो जाते हैं-कुछ यूनियन जैसे अवर अभियन्ता, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की यूनियन सक्रिय हैं। राजस्व कर्मचारियों की यूनियन भी दिखाई दे जाती है। लिपिक वर्ग की यूनियन का नाम लेवा भी कोई नहीं है। यहां भी राजनीतिक र्पार्टियों जैसी असन्तुष्टों का भीड़ है,कोई विरोधी है,कोई यादव है ,कोई संवर्ग कोई अल्पसंख्यक है,कोई कट्टर हिन्दू है तो कोई कट्टर दुश्मन है। मतलब यह कि कोई दांत दिखा रहा है,तो कोई दांत पर दांत जमाये मुस्करा रहा है। यहां भी मंडलीय है, खंडीय है, चीफिय है। इनके बीच कोई जायदाद नहीं है फिर भी मरणासन्न पड़ी हैं। कभी-कभार अपने पदाधिकारी को बुला कर सभा आदि कर लेते है लेकिन कर्मचारियों की सँख्या नगण्य ही होती है। क्योंकि अधिकांश लोग यूनियन से कोई मतलब नहीं रखना चाहते बकौल उनके उनकी बातों क्रिया कलापों में ऐसा कोई आकर्षण नहीं है कि वे अपनी यूनियन के प्रति रूचि दिखायें।

रामलाल कहने लगा, ‘‘यार तुम तो बड़ी खरी-खरी कहते हो क्या इसीलिये तिवारी से खरे हो गये हो?’’ ‘‘नहीं पता नहीं लोग मुझे जिस नाम से भी बुलाते हैं,उसे मान लेता हूँ। कुछ असंसदीय भाषा का भी प्रयोग करते हैं। अपनी मर्दानी ताकत दिखाते हुये अक्सर अपने को दूसरे से ताकतवर मर्द सिद्ध करने की बात करते हैं। नाम में क्या रखा है,खेर इस बात को यहीं रहने दें। ’

जिस प्रकार से बच्चे-उनके बच्चे-उनके-उनके-इसी प्रकार से संयुक्त परिषद है-प्रादेशिक स्तर पर -मंडलीय,फिर वर्ग,यहां भी वर्गवाद घुसा हुआ है। प्रत्येक वर्ग की अपनी यूनियन है-सहायक अभियन्ता, अवर अभियन्ता, सीचपालों, अमीनों, मुशियों और न जाने किन-किन की। ये यूनियनें चौराहों पर पान की दुकान सी हैं, जिसे अपना काम होता नहीं दिखा यूनियन बना ली, फिर अपने व्यक्तिगत व्यवहार पर-हमारी यूनियन में आओ नहीं तो हमारी कुटटी। लोकतंत्र में यूनियन सबसे बड़ी वरदान हैं। यूनियन विहीन समाज की कल्पना ही नहीं की जा सकती।

जहाँ ये वरदान हैं,वहीं देश के लिये, देश की प्रगति के रास्ते में बाधा उत्पन्न करने में सबसे बड़ा हाथ यूनियन का ही है,वे कभी-कभी अभिशाप भी सिद्ध होती हैं। यूनियन की कार्यवाही से सामान्य जनजीवन ठप हो जाता है और निर्दोष सामान्यजन हमेशा पिस जाता है। ऐसे कई उदाहरण हैं। देश के सामान्य चलते हुये जीवन की प्रगति रोक देने में बड़ी भूमिका निभाती हैं। इनमें कई अपवाद भी हो सकते हैं। ऐसा भी नहीं है जो मैं कह रहा हूँ, उसे आप मान्यता ही दें, बाध्य नहीं है-बाध्य नहीं होता न कोई,और हो भी क्यों? सबकी अपनी मान्यता है। अतिक्रमण भी नहीं करना चाहता,आपकी अपनी योग्यता का।

अभी भी पार्क में संजीदा मौसम था। लगता था,बड़े पेड़ शोकग्रस्त खडे़ है और एक कोने में बच्चे भी हल्ला मचा रहें हैं। लोग बतिया रहे थे,हवा का नामोनिशान नहीं था। तब भी हर कोई सांस ले रहा था। तब भी सभी कार्य कलाप चल रहे थे। कार्यालयों में यूनियनों के पदाधिकारियों के प्रति कोई सकारात्मक रुख नहीं होता,न ही सम्मान की भावना होती है। और न ही उनके प्रति कोई उत्तरदायित्व की प्रेरणा क्योंकि पदाधिकारी भी अपना स्वार्थ ज्यादा और कर्मचारियों के काम पर कम ध्यान देते है-हर कार्य के लिये उन्हें बताना पड़ता है। अधिकांश कर्मचारियों को ये भी नहीं मालूम होता कि जिस यूनियन को चन्दा दे रहे हैं,उसके पदाधिकारी कौन हैं, चन्दा किस प्रकार के कामों में व्यय हो रहा है। उस यूनियन की उपलब्धि कितनी है,क्या औचित्य है?

अरे क्या हुआ कसमसा गये न,ठहरे, चाहो तो आप लेट लो,कोई बातें अब नहीं चलेंगी। जब कहोगे फिर क्या हुआ? तभी कहूँगा। तभी ठीक रहेगा। .

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पार्क में ज्यादा भीड़ नहीं थी। पेड़ जैसे शान्त खड़े, किसी के गम शरीक हो़, बिना हिले-डुले शोक ग्रस्त थे। बड़ी उमस थी। लेकिन बच्चों को क्या? वे तो अपने खेल में मगन थे। गर्मी में अपने आप को किस तरह स्थिर रखे हुये थे-वही जाने। बच्चे खेल रहे थे-मगन हो पसीने से नहाये भाग दौड़ कर रहे थे। अब हमी को देखो न हमारे दुखी होने का कोई टाइम होता है क्या? जब कोई बात पसन्द नहीं आई,किसी ने कुछ कह दिया दुखी हो गये। घर में हमारे साथ क्या होता है । कोई पत्नी से दुखी है कोई गरीब है-दुखी है। कोई मर गया तो दुखी है। इसके लिये कही नहीं जाना पड़ता। दुखी होना कोई कठिन है क्या?

हमारे विभाग कौन दुखी नहीं है। सभी दुखी हैं’- सभी के ऊपर मानो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। हर काई असन्तुष्ट है। कोई कोई ज्यादा सक्रिय होता है तो अपने समर्थकों को ले उड़ता है। नियमानुसार कार्यवाही किये जाने पर हर किसी का स्वार्थ आहत होता है तो यूनियन की ओर दौड़ लगाता है। कई बार यूनियन के क्रिया कलाप व्यक्तिगत स्वार्थ से जुड़ कर यूनियन शब्द को ही बदनाम कर देता है,आप कोई भगवान तो हैं नहीं। हर समाज में कोई बुराई तो होती है। ऐसा अक्सर लोग अपने को उदार मान कर कह लेते हैं। हर यूनियन निष्क्रिय नहीं होती। रामविलावन वर्मा कभी कभी हमारे साथ रहते हैं। उनका अलग सोचना है। वैसे तो अक्सर गुमसुम बैठे रहते है लेकिन मेरी बातों से उत्तेजित हो उठे-‘‘क्या कहते हो क्या सभी कुछ नकारा हैं-कोई कुछ नहीं करता,देखा नहीं उस वर्ष कैसी तो हड़ताल हुई। कभी यूनियन के कहने में होती है,कभी अपने आप हो जाती हैं। क्या 86 की हड़ताल कुछ कम थी। अपने आप में अभूतपूर्व थी। वैसी हड़ताल न देखी न सुनी।’’ आप सही कहते हैं, मैं भी कब कहता हूं कि कुछ होता नहीं। सब होता चलता है,अपने आप,हम आप तो साधन मात्र हैं। आप सोचते होगे यूनियन की अपनी सीमायें हैं-अपने सैकडों लफडे़ हैं। कोई कितना कुछ कहें अगर कहे तो -कहता ही रहे बैठे। और कोई काम नहीं है,आप ही बोलो,क्या किसी को दिखाई देता है,समाज कहाँ जा रहा है?कही बम फट रहे हैं,बेरोजगारों की भीड़ बढ़ रही है, सबकी अपनी अलग पद्धति है। समाज में जैसे चल रहा है,वैसा ही चलाने देने के लिये लोग तत्पर रहते हैं। भगवान भरोसे चलता रहता है। समाज में कभी कोई उत्साही आ गया तो थोडी़ हलचल हो गई वर्ना फिर वैसा का वैसा। समस्त कार्यों के आदेश ऊपर से चलते हैं। पहले सचिव, प्रमुख अभियन्ता, मुख्य अभियन्ता, मंडल, फिर खंड। इस प्रक्रिया में गति होते हुये भी अपेक्षित परिणाम में देरी होती है। गम्भीर समस्यायें अक्सर अपने से उच्च अधिकारी के लिये ठेल देता है-और किनारा कर लेता है। अक्सर समस्या वैसी की वैसी रह जाती हैं और विभाग समस्या ग्रस्त बनता जाता हैं। मानव स्वभाव है-अपनी समस्या का हल तुरन्त चाहता है जो कि हो नहीं पाता जिससे असन्तोष बढ़ता जाता है। कर्मचारियों में यह डर बना रहता है,अगर कोई बात उच्च अधिकारी तक गई तो अपने अधिकारी की नजर न टेढ़ी हो जाये। इसी टेढ़ी नजर के चलते वह खून के घूँट पीता चुप रह जाता है। और तिल.-तिल जीता मरता है। विभाग द्वारा समस्त कर्मचारियों से वर्ष में एक बार समस्यायें सीधे मांगी जायेगी तो सम्भव है विभाग में कुछ तेजी आये। खैर इसे यही छोड़ें। आप रूके रहिये,मैं आपको सेने की मोहलत नहीं दूँगा।

हमारे विभाग में एक और अजीब सा प्राणी है-निरीह,लापरवाह,बेबस। पार्क के पीछे,बायें -दायें कई मकान हैं। लेकिन दायें भाग में अभी भी शान्त वातावरण है,उन मकानों में रहने वाले हारे थके से लौटे हैं-अपने अपने घरों को अपनी बुसाती गृहस्थी में। सबसे नीचे से ऊपर, कुछ ऊपर से नीचे के लोग। इनके कार्य करने का ढंग भी निराला है-कोई नियम या अनुशासन नहीं। उसे करना है तो ठीक नहीं करना तो अफसर तो क्या भगवान भी नहीं करा सकता उसके कार्य उसकी मर्जी से चलते है। ऐसी बात नहीं कि उसकी इस आदत का शिकार वह स्वयं नहीं होता क्योंकि उसका कार्य करने को कोई ‘‘बाबू’’ बैठा होता है,जो स्वयं उसी आदत से ग्रस्त होता है। उसका मनपसन्द कार्य-चाय पीना, पान खाना या फिर परनिन्दा होता है-उसे हर उस आदमी में बुराई दिखाई देती है-जो सामने नहीं होता। उसका सतही,छिछला जीवन उसे कोई गम्भीरता नहीं देता। अपने सेवाकाल में पूरे जीवन में वह स्वंय को भी प्रभावित नहीं कर पाता क्योंकि उसके पास किसी को न कुछ देने को होता है और न ही उसे कोई कुछ देता है-अपना जीवन ही सिसक सिसक कर और घिसट कर जीता है।

अपने यौवन काल में जब सपने जवान होते हैं-वह अपना कार्य शुरू कर चुका होता है। सारे सपने चूर तो तब होते हैं,जब वह दस वर्ष की सेवा कर चुका होता हैं-विवाह हो जाता है, दो-एक बच्चे हो जाते हैं। जीवन एक कोल्हू के बैल सा हो जाता है। आप को तो पता है कि सभी एक तरह के तो नहीं होते। मैं ऐसा कहते हुये संकोच करता हूँ। लेकिन सभी ऐसा नहीं सोचते। किसी को सोचने पर क्या पाबंदी।

पार्क के बांयी ओर खड़े हुये बच्चों के झुंड को क्या कहेंगे ? ये कहिये कि तीन-चार बच्चों की टोली आपस में बातें कर रही थी। गुप्ता जी लड़का कह रहा था,‘‘ आज रात दस बजे जब मेरे पापा आये तो बता रहे थे कि संजू के पापा के बड़े खराब हैं। ‘‘क्यों ’’ गुप्ता के लड़के जितना दूसरा जैन का लड़का बोला-‘‘मेरी मम्मी भी यही कह रही थी। गुप्ता अंकल रोज शराब पीकर ऊधम मचाते हैं-सारे मुहल्ले का जीना हराम किये हैं आज मेरे पापा लाटरी में जीत गये, बता रहे थे कि अब तो संतोष की पेंट बनेगी। मम्मी के लिये साड़ी लायेंगे,और मेरी छोटी बहन के लिये भी कपड़े बन जायेंगे।

छोटे बच्चों की बातें ऐसी होती हैं सुनते जाईये, सुनते जाईये। बड़ों से अधिक समझदारी की बातें करते हैं। खैर छोडिये यह सब फिर कभी,अभी तो आप हमारे ‘‘बाबू’’ की सुनिये । फिर न कहना कि आप अधूरी छोड़ गये आप तो ऐसा ही करते हैं। मैं कहाँ कुछ करता हूँ-‘‘बाबू’’है ही ऐसी चीज जो किसी को मोहित नहीं करती लेकिन बरोजगारी और वर्तमान शिक्षा पद्धति का अनिवार्य परिणाम है। यह एक बेबसी है,मजबूरी है और उसके क्रिया कलाप निशब्द बदला है-उस समाज को जो यह स्थिति पैदा करता है। सिंचाई विभाग बाबू भी अपने आप में विडम्बना है। प्रतिकूल परिस्थतियों में कार्य करते हुये, वह समाज को कुछ नहीं दे पाता क्योंकि विषम परिस्थतियों, आर्थिक कारणें के चलते न वह अपने मित्रों,को आकर्षित कर पता है,न वह अपने मां-बाप, भाई-बहन,या अन्य रिश्तेदारों को-आज सभी रिश्ते आर्थिक डोरी के मोहताज है।

बाबू एक ऐसी शै है, जिससे हर कोई पनाह मांगता है-वह स्वयं भी क्योंकि उसे भी किसी न किसी किल-अर्क से पाला पड़ता है जो उसी की आदतों, संस्कृति, बेबसी,मजबूरी की दुनिया में पलता पुसता है और उसी को काटता है,जिसके साथ उठता बैठता -साथ रहता है-सारी जिन्दगी ।यही एक ऐसा प्राणी है अपना मांस खाता है-एक कहावत है-कुत्ता कुत्ते का मांस नहीं खाता लेकिन बाबू खाता है। यह प्रवृत्ति किसी और वर्ग के अधिकारियों,कर्मचारियों में नहीं पाई जाती। इसी कारण वह अपने वर्ग के साथियों की निगाहों में तो गिरता ही है।-दूसरों की निगाहों में भी गिर जाता है। अपनी कमजोरियों ,आदतों,से समाज तो क्या बड़े बड़े राष्ट्र तक मिट्टी में मिल जाते हैं-जो अपने हितों को नहीं देखता वही वर्तमान युग में मिट्टी में मिल जाता है।

पार्क में ज्यादा भीड़ नहीं थी। पेड़ जैसे शान्त खड़े, किसी के गम शरीक हो़, बिना हिले-डुले शोक ग्रस्त थे। बड़ी उमस थी। लेकिन बच्चों को क्या? वे तो अपने खेल में मगन थे। उन्हें किसी के दुख दर्द से क्या मतलब है,वे तो अपने में मस्त थे। लेकिन हर कोई तो मस्त नहीं होता न, कुछ प्रौढ़ किस्म के लोग अपने अपने दर्द समेटे,कुछ देर के लिये ही सही,सब कुछ भूले बैठे-हँसी मजाक में मस्त थे। ये समझिये कि अपने आप को छल रहे थे। इसी छलावे को मैं आपको बताने जा रहा हूं कि सब कुछ जानते समझते हुये भी बाबू अपने हितों के लिये लड़ नहीं पाता क्योंकि उसमें संगठन शक्ति का अभाव है। इसके चलते कई बार अपने हितों के लिये लड़ने को कौन कहे-मुंह से शब्द निकालते भी डरता हैं। सबसे ज्यादा बाबू के हितों पर ही कुठाराघात होता है और क्या क्या सुनाउँ- आप कहेंगे क्या लेकर बैठ गये। लेकिन बैठो तो अभी कितना दर्द समेटे है, यह विभाग अपने आप में। खण्डीय, मंडलीय, चीफीय केडर के बाबू अलग-अलग हैं। चीफीय मंडलीय को छोटा समझता है, मंडलीय खण्डीय को । मंडलीय अपनी अकड़ में है और चीफीय अपने ठसके में। यह बात नहीं कि बाबू ही परेशान है-अधिकारी भी कम परेशान नहीं है-लेकिन वे किससे कहें-जहां कठिन कर्तव्य है-अधिकारों के होते हुये भी राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते उनका प्रयोग कम कर पाते हैं। ड्यूटी चौबीस घंटे,सु रक्षा कुछ भी नहीं। कई बार तो अपने कर्तव्यों का पालन करते हुये बलिदान भी हो गये। कोई भी छुटभैया नेता धमका जाता है और खून का घूंट पी कर रह जाना पड़ता है। सारी जिन्दगी नौकरी की-मिला क्या? न तो समय पर प्रमोशन, न सामाजिक आधार , न उत्साह, न संतुष्टि, बस जुटे रहते हैं, अपने कर्तव्यपालन पर।

शहर में ,समाज में, गांव में कस्बे में, सभी कुछ बदलता रहता है-अविरल। शर्मा जी ही कहता आया हूँ वर्षों से। दुबले-पतले,रंग गोरा, एक साथ नौकरी में आये लेकिन वे चमोली के रहने वाले,खाते-पीते परिवार के वर्षों साथ रहा है। हाँ शर्मा जी को उस समय रंग गोरा,मोटा शरीर होने से गुलगुला बाबू कहते थे-सभी उनका मजाक बनाते थे। वे अपने चमोली के बारे में सुनाया करते-गांव, कस्बे, पहाड़ों, लोगों बारे में इतने किस्से उनके मुंह से सुनते कि दूसरे किस्से-कहानियों की कभी जरुरत नहीं पड़ी। रामभजन शर्मा ने उस दिन अपनी पहली तनखा ली और बोले,‘‘ यार चलो, हम लोग ऐश करें। एस समय तनखा मिलती ही कितनी थी-मात्र चालीस रुपये। लेकिन हम तो झक्क हो गये -सुनत ही सब हक्के बक्के, उनकी ‘‘ऐश’’ को सुन कर। सब अपनी सीट पर हकबकासे से, उनकी सीट पर पहुँचे। हम सोच रहे थे-आखिर इसे हो क्या गया है? वे मजाकिया तो थे ही। सब यही सोच रहे थे कि जरूर दिमाग हिल गया है। वो जमाना ही दूसरा था। बाबू ऐसा सोच भी नहीं सकता था-ऐश करने की। अँग्रेजों का जमाना था, ऊपर से अगर कर्नज फ्रिगेट को पता चल गया तो खैर नहीं। जो भी हो, बडे़ सस्पेंस में हमस ब कुछ सुनने को व्याकुल थे।

कर्नल फिग्रट हमारे ऐक्जक्यूटिव इंजीनियर थे। बड़े दबंग,काम में सख्त और वक्त के पाबंद। बड़ी कोठी में रहते थे जिसमें 26 कमरे थे। सामने का कमरा हमारा कार्यालय था के बाद आता था,वहीं से हमारे कार्यालय पर नजर रखते थे और किसी की आवाज उंची हो जाये तो फौरन चपरासी को भेजते,फिर तो जिसे बुला लिया,उसकी खैर नहीं। लेकिन एक बात बड़ी अच्छी थी,हम सभी को बड़ा प्यार देते,कहते,‘‘ तुम सब हमारे हाथ-पैर, आंख कान हो तुम्हारी परेशानी मेरी परेशानी तुम्हारा दुख मेरा दुख है, तुम लोग कहाँ कहाँ से आकर,अपने मां-बाप,भाई-बहन छोड़ कर यहां आये हो। यहाँ तुम्हारा गार्जियन हमीं है।

एक बार की बात है,यही गुलगुले बाबू सीढ़ी से गिर पड़े,दफतर नहीं आये,पैर में सूजन आ गई,चलने से लाचार,। बडे बाबू को साहब ने पर्ची भेजी -शर्मा जी को लेकर मिलो। बड़े बाबू ने जाकर बताया कि वे शायद सीढी से गिर गये हैं-कार्यालय नहीं आये है। इतना सुनना था कि एक सख्त वक्त के पाबंद अधिकारी फ्रिगेट उठे बड़े बाबू को साथ लिया,कार्यालय रजिस्टर से घर का पता लेकर,कार से गुलगुले बाबू के घर जा पहुँचे,बोले-‘‘तुमको क्या हुआ? हमको क्यों नहीं बोला,चलो अभी डाक्टर के पास’।’’ साथ लेकर डाक्टर को दिखाया और हिदायत दी-जब तक ठीक नहीं होते,घर पर ही रहने का। लौटते वक्त गाड़ी में बड़बड़ा रहे थे,‘‘हम साला मर गया था जो हमको नहीं बोला,किस वास्ते है,तुम लोगों पर हुकुम चलाने वास्ते क्या?’’

वही गुलगुले बाबू आज ऐश करने चले थे कि सभी हकबकाये से उनकी शक्ल ताके जा रहे थे। उन्होंने अपनी जेब में हाथ डाला और एक रुपया कलदार रामआसरे को दिया और बोले -‘‘ जाओ ढाई सेर रबड़ी ले आओ।’’ फिर क्या था-रामभजन शर्मा की तूती बोलने लगी थी। क्या-क्या बतायें खैर छोडिये ये सब ,आप कभी सोच सकते हो क्या? -कल का ओवरसियर का क्या हाल था। सेक्शन इंजिनियर कहलाता था। हमारे दफतर में नईम खां ओवरसियर थे। कहने को कद पॉंच फुट लेकिन काम -बाप रे! जुट गये सो जुट गये। पूरे सेक्शन का दौरा करना क्या मजाक था। अगर चार दिन लगातार चलो तो भी पूरा न हो। काम के कीड़ा। ठेकेदार की हिम्मत नहीं पड़ती, मेट से दूर से पूछते कि ओवरसियर साब के मिजाज कैसे हैं। हिदायत थी कि साइट नहीं छोडना, चाहे आंधी आये या तूफान। काम समय पर चाहिये टंच सोलह आना, मिलने की जरुरत नहीं, घर पर तो बिलकुल नहीं। लेकिन क्या मजाल कि किसी ठेकेदार का भुगतान होने में देर हो जाये। अगर चार को बोला तो चार को भुगतान होना ही होना।

आज भी याद है वो बात-भुलाये नहीं भूलती। मूसलाधार बारिश हो रही थी, पानी रुकने का नाम नहीं ले रहा था। नदियां उफनी पड़ रही थी और नईम खां ओवरसियर अपनी फटफटिया से एक कोने से दूसरे कोने तक चकरघिन्नी बने हुये थे। छोटे साहब का आदेश था-‘‘खां साहब मेरी लाज तुम्हारे हाथ।’’ और खां साहब जुटे पड़े थे। बांध से खतरे की घंटी बज चुकी थी। बॉध अब टूटा कि तब। नईम खां ने बांध को बचा लिया लेकिन खुद को नहीं बचा पाये। बांध का एक हिस्सा कमजोर पड़ रहा था, जहाँ आशा की कोई किरण नहीं थी। अपने मेट और चालीस लेबर लिये रेत की बोरियां ढ़ोकर कमजोर हिस्से को मजबूत बना दिया और सबसे कहा जायो, मैं अभी आ रहा हूँ। और पता नहीं क्या हुआ-मेट ने देखा, ओवरसियर साब किनारे को चल दिये,पानी में भीगते हुये कुछ कदम चले-सुबह की शुरुआत हो चुकी थी,कि पैर फिसला और चार गुलाटी खाई। सर के बल नीचे गिरे तो फिर नहीं उठ सके। पानी ने तुरंत निगल लिया। हाहाकार करता पानी किसे छोड़ता है। समय चला जाता है-याद रह जाती है-लोगों की बातें।

हाँ उस दिन तो हम भौचक्के रह गये, कारण था-गुलगले बाबू की ढ़ाई सेर रबड़ी, सभी छक चुके थे कि बडे़ साहब का चपरासी आया कि बड़े साहब ने बुलाया है-गुलगुले बाबू को। हम सभी तो चौंक ही गये थे, आखिर क्यों? क्या अच्छा काम कर दिया, गुलगुले बाबू न। हम थे कि एक दूसरे की ओर असमंजस में देख रहे थे। हम लोग पांच बजे अपना सामान बटोर रहे थे कि रामदीन आया कि आप सबको बड़े साहब ने बुलाया है। अन्दर पहुँचे तो बड़े साहब ने इशारा कर दिया- सभी बैठ गये, बड़े असमंजस में थे कि बडे़ साहब ने पूछा,-‘‘ ये बताओ, आप लोग क्या मुझे डायबटीज है। आप सभी ने मिल कर रबड़ी खाई और मुझे नहीं खिलाई। किसी के मुँह में जबान नहीं थी। -क्या कहते, इसलिये मैंने तुम लोगों को बुलाया है कि जब कभी तुम लोगों को कुछ खाने का मन करे, हम तुमको मंगा कर देगा, किसी को पैसा खर्च करने का क्या काम -जब हम है।’’ आज भी लोग अंग्रेज अधिकारियों को यों ही नहीं याद करते। रात होने में कुछ देर थी, आजादी मिल चुकी थी। कर्नल फ्रिगेट का आखिरी दिन था। वे रिटायर नहीं हुये थे लेकिन अपने देश जा रहे थे। हर किसी को कुछ न कुछ उपहार दिया। हम सभी ने चाहा कि कुछ दें परन्तु मना कर दिया। नहीं मुझे तुम्हारा उपहार नहीं,चाहिये, तुम सबका प्यार मिला-यही हमारा उपहार है। मरते दम तक याद रहेगा आपका साथ। आजादी आ चुकी थी। नये अधिकारी ने चार्ज लिया-एक के बाद एक अधिकारी, कर्मचारी का काफिला आता गया, जाता गया, एक के बाद एक। आजादी मिली, विकास मिला, प्यार कम होता गया, आदमी मशीन होता गया। समय बदलता गया, तारीखें , महीने, साल-आज वे दिन याद आते हैं-वे सभी जो थे कभी साथ-साथ-था प्यार का, इंसान का।

-----------------समाप्त--------

परिचय व संपर्क

अजय कुमार दुबे

जन्म तिथी-15.-8-1951

माता का नाम-स्व. श्रीमती पुष्पा दुबे

पिता का नाम-श्री के0एन0 दुबे

जन्म स्थान-उरई जिला जालौन, उ0प्र0

शिक्षा-एम0 ए0 हिन्दी,बुन्देलखंण्ड कालेज,झाँसी

लेखनः- कहानी,लघुकथा,लेख,व्यंग,वार्ता,नाटक,साक्षात्कार,,आलोचना आदि।

प्रकाशन :- दैनिक जगरण, दैनिक भास्कर ,दैनिक जन सेवा मेल , दैनिक जनसत्ता, अर्थयुग,निधि मेल (साप्ताहिक),जाहनवी,समरलोक,साक्षात्कार- 2/15 ंएवं 1/17,सुपर आईडिया(मासिक) इद्रप्रस्थ.-भारती मासिक, पुष्पगंधा त्रैमासिक आदि में प्रकाशित । हस्ताक्षर वेव पत्रिका में मई,2017. में सन्समरण एवं अनुभव वेब मासिक में जुलाई, 2017 में बेबसी कहानी ,साहित्य सुधा में लेख, रचनाकार लघु कथा एवं,, यथावत पाक्षिक 1 से 15 अक्टूबर,2017 में कहानी प्रकाशित, आकाशवाणी छतरपुर म0प्र0 आकाशवाणी झॉंसी से कहानी,कविता,वार्ता आदि प्रसारित

सम्मान :- मुंशी प्रेमचन्द सम्मान-2015 बुन्देलखण्ड साहित्य कला एकेडमी,झॅांसी ( साहित्य सृजन एवं शोध संस्था ) ,आलोक स्मृति सम्मान-2012, प्रथम बुन्देलखण्ड भारतीय समकालीन कला प्रदर्शनी-2013 कहानी संग्रह- ‘‘खालीपन का अर्न्तद्वन्द’’ 2008 मे प्रकाशित ।

अजय कुमार दुबे, 691,सिविल लाईन्स,झॉंसी

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