संस्मरण: दिल्ली यात्रा // दिल की डोर और पुस्तक मेले की पतंग // डॉ.अर्पण जैन 'अविचल'

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संस्मरण: दिल्ली यात्रा

दिल की डोर और पुस्तक मेले की पतंग

डॉ.अर्पण जैन 'अविचल'

arpan jain

मथुरा से फरीदाबाद और फिर हजरत निजामुद्दीन होते हुए नई दिल्ली रेल्वेस्टेशन पर हुई भोर के एहसास से दिल्ली यात्रा का आरंभ हो गया। अल सुबह ही महरौली दादावाड़ी पहुँच कर दर्शन लाभ से यात्रा की तमाम थकावट सिरहाने से निकल गई और देश की राजधानी में होने के सुखद अनुभव जुड़ने लगे।

दिलवालों की दिल्ली की प्रगति का एक अध्याय प्रगति मैदान पर चल रहा पुस्तक मेला भी था। यूँ तो हर वर्ष जनवरी माह में आता है, पर इस बार यह मेरे लिए और भी खास रहा क्योंकि पुस्तकों के प्रेम के साथ प्रकाशक परिवार और कुछ नए साथ ने दिल्ली को देखने का चश्मा बदल दिया ।

हाँ !

वही दिल्ली जहाँ से राष्ट्र का कद बनता है, जनमत का सौन्दर्य निखरता है, आन्दोलनों का समर तय होता है, राजनीति का भाग्य बनता और बिगड़ता है, विश्व की निगाहें हमारे देश को देखती है, वहीं जहाँ सभ्यता के नाम पर शासन, सल्तनत और हस्तिनापुर का संग्राम तकता है, जहाँ कुतुब के मीनार की गवाही होकर, लाल किले का प्रभाव बन जाता है, इन्डिया में आने के दरवाजे के रुप को जहाँ स्वीकारा जाता है । वही दिल्ली जिसने पुस्तकों के संसार को सप्ताह भर संभालकर सबको अर्पण कर दिया । सरपट दौड़ती मेट्रो ने राजनैतिक व्यक्तित्व को ऐसा बदला मानों निर्वाचन की रेखाओं ने दिल्ली का भाग्योदय ही कर दिया हो ।

साथी प्रीति सुराना जी के संग्रह 'दृष्टिकोण' का 'शिवना प्रकाशन' के माध्यम से लेखक मंच पर विमोचन हुआ। राष्ट्र की राजनैतिक धड़कन दिल्ली के प्रगति मैदान को मैं इसलिए भी याद रखूंगा क्योंकि मेरे प्रथम काव्यसंग्रह 'काव्यपथ' का विमोचन पुस्तक मेले के हॉल क्रमांक 12-ए के 1-6 में केबीएस प्रकाशन के स्टाल पर आ. केदारनाथ शब्दमसीहा, आ. मुकेश दुबे जी, आ. पवन अरोड़ा जी, आ. प्रीति सुराना जी व बतौर प्रकाशक संजय साफी जी व भावना जी के सहयोग से हो सका। साथ ही प्रीति जी के कथा संग्रह 'कतरा-कतरा मेरा मन' भी वहीं विमोचित हुआ ।

जिन्दादिल शब्दमसीहा के साथ गुजारा हुआ लम्हा ताउम्र की स्मृतियों का प्रतिमान बन गया।

बाद उसके पतंजलि योगप्रचारक प्रकल्प के आचार्य नविन जी का दिल्ली प्रवास और साथ में हिन्दी के ख्यात लेखक व वरिष्ठ साहित्यकार डॉ.वेद प्रताप वैदिक जी का सस्नेह हमें व हिन्दीग्राम को मिला दुलार शब्दों में अभिव्यक्त ही नहीं किया जा सकता है ।

kavypath

दिन ढल तो रहा था परन्तु समय की रफ्तार अपनों के अपनेपन को कम नहीं कर पा रही थी, कनाट पैलेस के कढ़ी चावल यादों के बागबान में गुलाब बन कर जी रहे है । बिलकुल वैसे ही जैसे श्वासनली में ऑक्सीजन का बहना ।

हाँ! नए रिश्ते बनाकर दिल्ली ने दिलतक की सुराही को सुरंग बना दिया । जहाँ प्यार खोजने हर इंसान को दिल खोलकर जाना चाहिए ।

दिल्ली के दिल से व्यापार के अलावा भी प्यार बहता है, खोजना आना भी चाहिए। मैंने महसूस किया सुबकते दर्द को वहाँ, पर प्रेम का संगीत स्वरलहरी भी वहीं बना रहा था ।

भावना प्रधान दिल्ली को देखने के लिए दिल की डोर से पतंग उड़ानी चाहिए जैसे नेशनल बुक ट्रस्ट ने विश्वपुस्तक मेले के रुप में उड़ाई ।

बहुत से प्रकाशक और उनका आत्मियता को खोजना बिलकुल वैसा ही है जैसा सोमा जी का एक कागज में कलाकृति के साथ एक थैला बना देना । कविताकोश के स्टाल के साथ साथियों के स्नेह का केलेन्डर भी बन गया ।

हाँ ! मैं थैले में अपने मानस की खुराक किताबों के रुप में समेट लाया बिलकुल वैसे ही जैसे आसाम के चाय के बागान से पत्तियाँ चुन लाना ।

फिर नरेन्द्र अरोड़ा जी का प्रेम मुझे और प्रीति जी को ससम्मान इंडिया एक्सिलेन्स प्राईड अवार्ड के रुप में इंडिया इंटरनेशनल सेन्टर में प्राप्त हुआ ।

बहुत कुछ समेट लिया स्वयं को दिल्ली की चकाचौंध के बीच। और मैं साथ लाया हूँ नए रिश्तों की सौगाते जो गहन और गंभीर होने के साथ-साथ उत्तरदायित्व के निर्वाह की प्रेरणा भी देते है।

दिल्ली वाकई दिलवालों का शहर है । जहाँ जिंदादिली का उत्तरायण मनाया जाता है ।

रिसते हुए प्रेमभावों को सहेजकर लाना सुखद ही नहीं वरन सार्थकता का प्रतिबिम्ब-सा है ।

दिल के तल को पुस्तक मेले ने जोड़-सा दिया और दिल्ली ने अपना मुरीद बना लिया ।


डॉ.अर्पण जैन 'अविचल'

पत्रकार और स्तंभकार

संस्थापक-हिन्दीग्राम

इंदौर

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1 टिप्पणी "संस्मरण: दिल्ली यात्रा // दिल की डोर और पुस्तक मेले की पतंग // डॉ.अर्पण जैन 'अविचल'"

  1. जी हाँ अब की बार पुस्तक मेला सचमुच अद्भुत था

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