370010869858007
Loading...

लघुकथा // जीवन-संघर्ष // योगेश किनकर

image

जिंदगी चलने का नाम है, ढेर-सा प्यार तो कभी गम हजार। लेकिन इस सब के बीच जिसने सामंजस्य बिठा लिया समझो उसने जिंदगी का अहम अध्याय सीख लिया। और एक लड़की के लिये तो समझो इस रूढ़िवादी समाज में मुश्‍किलें -ही- मुश्‍किलें है फिर भी उन्होंने हर परेशानी का सामना करके आज अपने मुकाम को हासिल किया। आज उनका अपना अलग रूतबा है समाज सम्मान की नजरों से देखता है। लेकिन वो पुराने दिन ! वे अतीत की यादों में खो गयी। ”दीपा ! ओ दीपा ! कहॉं मर गयी ये लड़की, सुबह-सुबह माँ चिल्ला रही थी। वो जब खेल कर आई तो मॉं ने दो तमाचे लगा दिये और पूछा, कहॉं चली गई थी री सुबह-सुबह ? कोई काम धंधा नहीं है क्या ? क्या लड़कों की तरह खेलती रहती है ? ढेरों सवाल लेकिन एक औरत होकर भी मॉं उसकी बाल-सुलभ इच्छाओं को समझ नहीं पाती। ऐसा नहीं था कि घर में सब अनपढ़ हो, स्कूल-मास्टर थे बाबूजी । लेकिन फिर भी उसके भाई में और उसमें फर्क किया जाता। भाई कुछ भी करें, कहीं भी जाए कोई बात नहीं लेकिन उसे स्कूल से आने में भी थोड़ी देर हो गई तो मॉं के ढेरों सवाल उसकी प्रतीक्षा कर रहे होते। पढ़ने में वह बहुत होशियार थी हर साल अच्छे नंबरों से पास होती फिर भी घरवालों को उतनी खुशी नहीं होती मगर भाई तृतीय श्रेणी से भी पास हो गया तो समझो सारे मुहल्ले में मिठाई बॅंटनी है।

आज 12 वीं कक्षा का रिजल्ट आने वाला था घर में सब बेसब्री से रिजल्ट का इंतजार कर रहे थे। बाबूजी जब घर आये तो उनका चेहरा उतरा हुआ था, माँ ने पूछा-क्या हुआ जी ? क्या नीरज पास नहीं हुआ ? बाबूजी ने बुझे मन से बताया कि वह दो विषयों में फेल हो गया हैं लेकिन दीपा पूरे नगर में प्रथम आई है। आगे पढ़ने की इच्छा जाहिर की तो माँ ने मना कर दिया और कहॉं-अरी ! आगे पढ़कर क्या करेंगी ? संभालना तो तुझे चौका ही है न । आज उसके सब्र का बांध टूट गया। खूब रोई वह अकेले में जाकर । जब मन कुछ हल्का हुआ तो सोचने लगी क्या यही जिंदगी है मेरी ? लड़की होने की इतनी बड़ी सजा ? फिर मन में निश्‍चय किया और चल दी मास्टर जी के पास । उन्हें जब पता चला की उसे आगे पढ़ाना नहीं चाहते तो घर आकर उन्होंने बाबूजी को खूब समझाया और कहॉं - क्या रामचरण जी आप खुद इतने पढ़े लिखे होकर ऐसा सोचते है ? लड़के और लड़की में कोई फर्क नहीं होता और अगर आज नीरज पास होता तो क्या आप उसे शहर नहीं भेजते आगे की पढ़ाई के लिये । बाबूजी मास्टर जी की बात तो मान गये और मुझे शहर भेजने के लिये राजी हो गये लेकिन फिर भी उनके मन में शंका थी।

शहर छोड़ने मास्टर जी भी आये थे उन्होंने दीपा का दाखिला अच्छे कॉलेज में करा दिया। ग्रेज्युएशन करने के बाद सिविल सेवा का फार्म भरा और उसकी तैयारी में जुट गई। शहर आने के बाद भी मॉं ने कितनी बार शादी के लिए जोर डाला लेकिन वो राजी नहीं हुई। प्रारंभिक परीक्षा में पास हुई तो मॉं-बाबूजी से ज्यादा खुशी तो मास्टर जी को हुई। उन्होंने दिल से उसकी सफलता के लिये आशीर्वाद दिया। उसकी लगन, उसकी मेहनत रंग लाई और सिविल सेवा परीक्षा में पूरे भारत में महिला वर्ग से टॉप किया। ट्रेनिंग के पश्चात् उसकी पोस्टिंग हो गयी थी। मॉं-बाबूजी को अब अपनी सोच पर पछतावा होने लगा था लेकिन उसकी सफलता में सबसे बड़ा योगदान देने वाले मास्टरजी उसकी खुशियों में भागीदार बनने के लिये अब इस दुनिया में नहीं थे। लेकिन उसने अपनी मेहनत और संघर्ष से मास्टरजी के कदम को सही ठहराया था। संघर्ष करके उसने अपनी अलग पहचान बनाई थी।

योगेश किनकर

सारनी, जिला-बैतूल (म.प्र.)


e-mail – ykinkar1987@gmail.com

लघुकथा 2426863801596915932

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

emo-but-icon

मुख्यपृष्ठ item

कुछ और दिलचस्प रचनाएँ

फ़ेसबुक में पसंद करें

---प्रायोजक---

---***---

ब्लॉग आर्काइव