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संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 8 // पानी रे पानी... // शशि रायजादा (लखनऊ)

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प्रविष्टि क्र. 8 पानी रे पानी... शशि रायजादा (लखनऊ) दोपहर के चार बजे थे। स्कूल से आ कर थक कर मैं सोई ही थी कि घंटी बजने की आवाज़ से उठना प...


प्रविष्टि क्र. 8

पानी रे पानी...

शशि रायजादा (लखनऊ)

दोपहर के चार बजे थे। स्कूल से आ कर थक कर मैं सोई ही थी कि घंटी बजने की आवाज़ से उठना पड़ा। पैरों में दर्द की वजह से उठने में आलस आ रहा था। एक्वागार्ड वाला आया था, मशीन की सर्विसिंग करने। सर्विसिंग करते करते वो बताने लगा – ‘इस बार की एएमसी खत्म हो गई है। यहाँ पानी में बहुत साल्ट आते हैं, एएमसी रीन्यू कराने की बजाय आप अब ये एक्वागार्ड हटवा कर आर॰ओ॰ लगवा लीजिए। एक्स्चेंज ऑफर में एक हज़ार रुपए का डिस्काउंट मिल रहा है।’

शाम को जब ये ऑफिस से आए तो मैंने उन्हें बताया कि एक्वागार्ड वाला एक्स्चेंज में आर॰ओ॰ लगाने पर एक हज़ार का डिस्काउंट दे रहा है। मेरे जोड़ों में दर्द होने का कारण पानी में एक्सेस साल्ट का होना भी हो सकता है, यही सोच कर आर॰ओ॰ वाले को फोन कर दिया गया कि आने वाले इतवार को वो आर॰ओ॰ लगा जाए। सब जगह आर॰ओ॰ प्यूरिफ़ाइर वगैरह का ऐसा चलन सा हो गया है कि ये एक ज़रूरत की बजाय स्टेटस सिम्बल भी होता जा रहा है। अगले इतवार को हमारे घर में भी आर॰ओ॰ लग गया। लगाने वाले से पानी का टी॰डी॰एस॰ चैक करने को कहा तो वो 250 निकला। लगा कि काफ़ी ज़्यादा है। वो बात दूसरी है कि आर॰ओ॰ का लिट्रचर पढ़ने पर पता चला कि जहां टी॰डी॰एस॰ पाँच सौ ज़्यादा होता है वहाँ ही आर॰ओ॰ ज़रूरी होता है पर अब कुछ नहीं हो सकता था।

आर॰ओ॰ तो लग गया पर उससे जो पानी बाहर निकलता था, उसे बहता देख कर मेरा मन बहुत बेचैन होता था। ऐसे पानी की बरबादी... ? जो एक बोतल पानी के बदले दो या तीन बोतल पानी बहा देता है। परंतु ये तो उस मशीन का सिस्टम ही है। साल्ट को बाहर निकालने के लिए उसे ऐसा ही करना होता है।

मैंने अपनी इस उलझन को दूर करने के लिए एक समाधान निकाल लिया । मैं आर॰ओ॰ को ज़्यादातर उसी समय चलाती हूँ जब सब खाना खा लेते हैं, तब उसका पाइप झूठे बर्तनों में लगा देती हूँ, या रसोई में एक बाल्टी किनारे पर रख कर उसमें ट्यूब लगा देती हूँ। ये पानी रसोई धोने में काम में ले लिया जाता है।

ये सब पढ़ कर कोई भी मुझे सनकी ही समझेगा,पर बचपन से बड़े होने तक ऐसी कई जगह पर रही हूँ, कि पानी की एक एक बूंद को कैसे संजो कर रखा जाता है, ये मुझसे बेहतर कोई नहीं जान सकता। पानी की बरबादी मुझसे नहीं देखी जाती। हालां कि पिछले बीस साल से जब से लखनऊ में रह रही हूँ, वहाँ पानी की ज़रा भी परेशानी नहीं है, इतना पानी आता है कि ओवर हैड टैंक में भी बिना पम्प के काफ़ी पानी भर जाता है और हर समय पानी उपलब्ध रहता है। फिर भी कभी बच्चों द्वारा या किसी मेहमान द्वारा डायरेक्ट पानी की लाइन का नल खुला रह जाने पर जब पानी आता है, तो बहते पानी का नल बंद करने के लिए मुझे चाहे भरी सर्दी में रज़ाई से,या भरी गर्मी में ए सी में से उठ कर जाना पड़े, मैं नल बंद करने ज़रूर जाती हूँ। पानी बहने की आवाज़ सुन कर आज भी मेरी आँख सोते समय भी चौंक कर खुल जाती है। आप समझ सकते हैं कि फिर ऐसे में मुझे आर॰ओ॰ का बहता पानी कैसे बर्दाश्त होता ?

मेरा बचपन पहाड़ी इलाकों में बीता है। सारे जग को पानी पहाड़ ही देते हैं, पर जो लोग वहाँ रहते हैं, ये केवल उन्हीं लोगों को मालूम है कि पहाड़ी इलाकों में पानी एक बड़ी समस्या है। बारिश का पानी, या फिर बर्फ पिघलने पर जो भी पानी बनता है, सब नीचे की तरफ बह जाता है। सीधी सपाट जगह न होने से बाँध या रिज़रवोयर बनाने मुश्किल होते है। बोरिंग करके भी पानी नहीं निकाला जा सकता क्यों कि पहाड़ों में पानी का तल बहुत नीचा होता है।

इन सब समस्याओं के अतिरिक्त सर्दियों के तीन चार महीनों में जब पानी घर में सप्लाइ होता है, तो अलग तरह की समस्याएँ होती हैं। वहाँ सारी की सारी पाइप लाइन या तो ज़मीन में दबी हुई होती हैं, या दीवार में चिनी हुई होती है। सामान्य ज्ञान रखने वाले ये बात जानते होंगे कि ऐसा इसलिए किया जाता है कि खुली पाइप लाइन में ठंड का असर ज़्यादा होता है और पाइप में पानी जम जाता है। पानी जब जम कर बर्फ बनता है तो वह फैल कर बढ़ जाता है जिस से पाइप लाइन फट जाती हैं। मुझे याद है कि मेरे घर में भी जितना नल दीवार से निकला हुआ था वो पीतल का बना था, और उतनी छोटी सी दूरी में भी नल में पानी जम जाता था। वहाँ सभी लोगों के घरों में नल काले –काले से होते थे, क्यों कि पानी आने के समय उन पर मिट्टी के तेल या स्प्रिट में भीगा कपड़ा लपेट कर आग लगानी पड़ती थी, तब कहीं जा कर नल में जमी बर्फ पिघलती थी और पानी आता था। ये रोज़ का ही काम होता था।

ध्यान रहे कि उस समय प्लास्टिक की बाल्टियाँ नहीं होतीं थीं। बाल्टियाँ केवल पीतल या गैल्वनाइज़्ड लोहे की ही होती थीं। यदि आपने होशियारी दिखा कर पानी बाल्टियों या ड्रम में भर कर रख लिया तो फिर रात भर में बाल्टी के पानी के ऊपर बर्फ की एक मोटी सी तह जम जाती थी, जिसके लिए बाथ रूम में हमेशा एक हथौड़ी रखनी पड़ती थी, जिस से ऊपर की तह तोड़ कर नीचे से पानी लिया जा सके। ये एक्सर्साइज़ हर सुबह ब्रश करते समय या टॉइलेट जाते समय करनी पड़ती थी। गीज़र वगैरह तब इतने प्रचलित नहीं थे। एक तो उस समय बनने वाले गीज़र इतनी ठंड में काम नहीं करते थे क्यों कि उनकी पतली ट्यूब में भी पानी जम कर जब फैलता है तो वो भी फट जाते थे। वहाँ दूसरी समस्या ये थी कि हर समय गीज़र तब ही चल सकता है जब पूरे चौबीस घंटे लाइट आती रहे, और ऐसा संभव नहीं था। डैडी के हॉस्पिटल का कोई कर्मचारी रोज़ ही सुबह सुबह अंगीठी जला कर पानी का एक बड़ा बर्तन उस पर चढ़ा देता था, जिससे हम लोगों को गर्म पानी मिल जाता था।

ये जान कर आपको बहुत अजीब तो लगेगा कि हमारे लिए रोज़ नहाने की शिक्षा, केवल स्कूल की किताबों या परीक्षा में उत्तर लिखने तक ही सीमित थी। मैं मानती हूँ कि रोज़ नहाना चाहिए, पर यदि पानी की समस्या, ईंधन की उपलब्धि और खर्चे की समस्या,धुले कपड़ों के सूखने की समस्या हों, तो ये कन्सैप्ट फ़ेल हो जाता है। डैडी को जो सरकारी मकान मिला था, उस में चार कमरे थे, जिसमें एक कमरे में केवल रज़ाई व गद्दों के बक्सों के अलावा ज़्यादा समान नहीं था, उसी में रस्सी बांध कर कपड़े सुखाये जाते थे, जो सूखने में भी तीन चार दिन ले लेते थे, क्यों कि वॉशिंग मशीन तो उन दिनों होती ही नहीं थी, और धूप के तो न जाने कितने कितने दिनों तक दर्शन ही दुर्लभ थे। मैंने कई बार मम्मी को उबाले गए दूध के भगोने के ढक्कन पर रखकर डैडी की बनियान या हमारी शमीज़ें सुखाते देखा था। मम्मी हम तीनों भाई बहनों में से किसी एक को ही नहलाती थीं, इस तरह हर एक का नंबर तीसरे दिन आता था। उन्होने कभी हमारे बाल बढ़ने नहीं दिये। लंबे बाल... मतलब, धोने के लिए ज़्यादा पानी, बालों के सूखने की समस्या, सर्दी लगने का डर, कई कई दिन तक धूप का न निकलना (ध्यान रहे कि उस समय ड्रायर, ब्लोएर ये सब नहीं थे )।इन सब कारणों से बड़े बाल रखने का कभी भी विकल्प ही नहीं था। हम दोनों बहनों के सीधे सीधे ब्लंट कट बाल रहते थे, और वो भी हमारी सिलाई कटाई में होशियार मम्मी घर में ही कैंची चला कर काट देती थीं। केवल डैडी व भैया ही नाई की दूकान पर बाल कटवाने जाते थे। हाँ कटे बाल होने का दूसरा फ़ायदा तब होता था, जब हम अपने ननिहाल मथुरा जाते थे और अपनी कजिंस के बीच कटे बालों की वजह से अपने को मॉडर्न समझते थे ।

पानी और ठंड की समस्या तो हमें उस उम्र में ज़्यादा समझ में नहीं आती थी, हाँ भयंकर ठंड में नहाने से बचने का मज़ा ही कुछ और था। सोचते थे कि और भाई बहन होते तो शायद और ज़्यादा दिन बाद नंबर आता। जिसका नहाने का नंबर होता था, उसकी सुबह से ही दम निकलने लगती थी। कई कपड़ों की परतें उतार कर, नहा कर फिर उतने ही कपड़ों को पहनना होता था।

कक्षा तीन, चार, और पाँच की पढ़ाई के दौरान डैडी की पोस्टिंग शिमला में थी। हम लोंगों की वार्षिक परीक्षा नवम्बर में खत्म हो जाती थी और बर्फ पड़ने की वजह से दो महीने की छुट्टियाँ हो जाती थीं। नवम्बर में पाँचवीं क्लास की वार्षिक परीक्षा दे कर हर साल की तरह जब हम लोग अपने ननिहाल गए, उस दौरान डैडी ने शिमला छोड़ कर डी॰ए॰वी॰ कॉलेज अजमेर में प्रोफेसर की नौकरी जॉइन कर ली थी। उसके बाद मेरा शिमला जाना न हो सका, पर आज भी उस जगह की एक एक याद ताज़ा है... रिज़, पोस्ट ऑफिस, जाखू, लक्कड़ बाज़ार, माल रोड आदि आदि।

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अजमेर जाने से पहले ये समस्या आई कि यहाँ प्लेन्स में स्कूल में सेशन मई व जून की छुट्टियों के बाद जुलाई में शुरू होते थे। इस कारण चार पाँच महीने हमें नानी के घर मथुरा में ही काटने पड़े। तब तक डैडी ने अजमेर में घर वगैरह देख कर व स्कूल के एडमिशन का काम पूरा किया।

पहाड़ों के बाद अकस्मात राजस्थान के एक शहर में शिफ्ट होना एक नया सा अनुभव था। डैडी ने अपने कॉलेज के पास ही रामगंज नामक एक बड़े एरिया में मकान किराए पर लिया था। पर हाय री किस्मत....! पानी की समस्या ने यहाँ भी पीछा नहीं छोड़ा।

अजमेर में पानी आने का कोई निश्चित समय नहीं था। दिन में किसी भी समय पानी की सप्लाई हो जाती थी। सब लोग अपने काम छोड़ कर पानी भरने में लग जाते थे। उस समय ओवर हैड टैंक का चलन नहीं था क्यों कि पानी प्रेशर से नहीं आता था, टुल्लू पंप या मोटर भी नहीं थे। इसलिए आपके पास जो भी बर्तन हों, उन्ही में पानी जमा कर के रखना पड़ता था। घर की बाल्टियों में, गंगाल में ( धातु की बनी बड़ी बाल्टी), डेग या ड्रम ... जिसके घर में जैसी व्यवस्था हो, उस हिसाब से पानी जमा किया जाता था, क्यों कि फिर पानी की सप्लाइ कब होगी, ये किसी को पता नहीं होता था। शुरू शुरू में हमारे पास पानी जमा करने के लिए बड़े बर्तन नहीं थे, तो मम्मी बाथरूम की बाल्टियाँ व रसोई की बाल्टी भरने के बाद सारे भगोनों में, और कभी कभी तो कुकर व कटोरों तक में पानी भर के रख लेती थीं।

पानी आने पर पूरी कॉलोनी में एक अजीब सी चहल पहल हो जाती थी। वहाँ प्राय: सभी घर दो फुट की ऊंचाई पर बने हुए थे, जिससे रेतीली आंधी आने पर धूल ज़मीन से उड़ कर घर में न आ सके। पानी में प्रेशर न होने की वजह से सबसे बड़ी समस्या ये हो जाती थी कि कुछ लोगों ने घर से बाहर नीची जगह पर पाइप लाइन में कनेक्शन लगा लिए थे जिससे पानी घर के अंदर आना बंद हो जाता था। यह देख कर सभी घरों के लोगों ने यही तरीका अपना लिया था। इससे ये परेशानी हो गई थी कि तब सारा पानी बाहर से बाल्टियों से भर भर कर घर के अंदर बड़े बर्तनों में डालना पड़ता था। कुछ लोगों ने तो अपने नल में एक कनेक्शन इतनी नीची जगह पर लगा लिया था कि उसके नीचे केवल परात ही आ सकती थी। उस परात में से गिलास से भर भर कर पहले बाल्टी में पानी डाला जाता था और फिर बाल्टी से घर में ले जाया जाता था। सारे घर की ज़रूरत का पानी यदि इस तरह भरना पड़े तो आप सोच सकते हैं कि दिन भर के तीन या चार घंटे इस पानी की व्यवस्था करने में ही निकल जाते थे क्यों कि हर बिल्डिंग में दो या तीन परिवार तो रहते ही थे। एक ही नल पर बारी बारी से एक एक बाल्टी भरने का नंबर आता था। इस काम में हम बच्चों की भी ड्यूटी लग जाती थी। हम लोग भी बाल्टियों को बिना छलकाए सीढ़ी चढ़ कर अंदर तक ले जाने में खूब कुशल हो गए थे।

कभी कभी तो रात के तीन बजे ही पानी आ जाता था। नल खुले रखने पर आवाज़ आ जाती थी और किसी एक के भी पानी भरने की आवाज़ सुनते ही धीरे धीरे सारे घरों में लोग जाग जाते थे। कई बार तो मम्मी हम लोगों को भी जगा देती थीं, ज़्यादातर इस काम में भैया की ड्यूटी लगती थी। रात के तीन बजे भी सारी सड़क पर ऐसी चहल पहल हो जाती थी, मानो किसी के घर में शादी हो और बारात आने वाली हो। जब इन सब कठिनाइयों से घर के लिए पानी भरना पड़े तो पानी की कीमत तो समझ में आ ही जाती है।

ओवर हैड टैंक न होने से वाश बेसिन, नहाने के लिए शावर, टॉइलेट में सिस्टन,फ्लश, कपड़े धोने के लिए वॉशिंग मशीन ...इन सब का तो सवाल ही नहीं उठता था। हाँ, अजमेर में जिस घर में हम लोग रहते थे, अच्छी बात ये थी कि टॉयलेट में फ्लश सिस्टम न होने पर भी, जो आजकल इस्तेमाल होती है, वैसी ही चीनी मिट्टी (सिरेमिक) की सीट थी, पर फ्लश सिस्टम न होने से उसमें बाल्टी से पानी डालना होता था। हम लोगों के नहाने के बाद मम्मी जब कपड़े धोती थीं, तो कपड़े खँगालने (रिंस) के बाद पानी कभी नहीं फेंकती थीं। मुझे याद है कि बाथरूम में तीन बाल्टियाँ उसी कपड़े खंगाले हुए पानी की भरी रखी रहती थीं जिसे टॉइलेट में डालने के लिए इस्तेमाल किया जाता था ।

उन दिनों कुकिंग गैस नहीं थी, न ही इंवर्टर थे। केरोसिन के स्टोव पर खाना बनता था। स्टोव या लैम्प में मिट्टी का तेल भरते समय तेल कहीं न कहीं हाथों में लग ही जाता था। ऐसे हाथ कम से कम तीन बार जब तक साबुन से न धोये जाएँ, मिट्टी के तेल की बदबू नहीं जाती है। क्या आप यकीन मानेंगे कि मैं आज भी केवल एक मग पानी से तीन बार हाथ धो सकती हूँ क्यों कि ये सब इस पानी की तंगी ने हमें सिखा दिया है।

कभी कभी पूरे दिन पानी की सप्लाइ नहीं होती थी। पता लगाया गया कि फिर क्या विकल्प हो सकता था। आस पास कुएं ढूँढे गए। वहाँ कुओं में भी बहुत खारी पानी निकलता था, जो न तो पीने और न ही नहाने या कपड़े धोने, किसी भी काम में नहीं लिया जा सकता था। बस एक ही कुआं था जिसमें मीठा पानी था। वह भी घर से बहुत दूर था। पानी न आने पर वहाँ भी बहुत भीड़ हो जाती थी। हमने भी खूब कुएं से पानी भरने का अभ्यास कर लिया था। फिर भरी हुई बाल्टियों को साइकिल पर टांग कर या कैरियर पर रख कर घर तक लाना, ये सब हमने छोटी उम्र में ही खेल खेल में सीख लिया था। हमारे लिए ये एक मज़ेदार अनुभव था।

और फिर एक दिन.... जब पानी दो दिन तक नहीं आया। हमारी परीक्षा चल रही थीं, इसलिए मम्मी हमें कुएं तक पानी के लिए नहीं भेजना चाहती थीं। वैसे एक दिन के लिए तो मम्मी हमेशा पानी स्टाक कर के रखती थीं, पर दो दिन तक सप्लाइ न होने पर बड़ी समस्या खड़ी हो गई। चाहे पहाड़ों में रहने से हमें बिना नहाए रहने की आदत थी, क्यों कि वहाँ तो मौसम ठंडा होता था, पर अजमेर में तो मौसम इतना गर्म रहता था कि किसी का भी बिना नहाए काम नहीं चल सकता था। हम लोगों ने कम से कम पानी में नहाने की आदत तो डाल रखी थी, पर उस दिन तो अति ही हो गई। हम एक बाल्टी में तीन लोग नहाए। क्या इसे आप नहाना कहेंगे ? उस पर मम्मी के पानी बचाने के नए नए तरीके... उन्हों ने हिदायत दी कि नहाने से पहले पटरे पर उतारे हुए कपड़े रखो और उस पर बैठ जाओ और तब नहाओ, जिससे आपके शरीर पर से जो पानी बह कर जाए, उससे कम से कम मैले कपड़े भीग तो जाएँ और उन्हे धोने में कम पानी खर्च करना पड़े।

उन दिनों बर्तन माँजने के लिए विम बार, स्कौच ब्राइट,तार का जूना... ये सब कुछ नहीं होता था। बर्तन राख़ से नारियल की जूट या रस्सी से मांजे जाते थे। एक्जाम के बाद स्कूल से लौट कर जब हम खाना खा चुके तो देखा कि मम्मी बर्तन माँजने वाली बाई से कह रहीं थीं... “पानी नहीं है, कैसे भी हो, आज तुम्हें आधी बाल्टी पानी में ही बर्तन माँजने हैं।” (आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि रोज़ के दिनों में भी वो केवल एक बाल्टी पानी में भी इतने साफ बर्तन धो कर जाती थी जितने आज के समय की बाइयाँ पूरा नल खोल कर भी नहीं धोती हैं)। मम्मी की बात सुन कर वो बोली –‘माँजी, थोड़ी राख और एक साफ कपड़ा दे दो, तो हम आपका ये आधी बाल्टी पानी भी खर्च नहीं करेंगे।‘

मम्मी ने अवाक हो कर पूछा –‘बिना पानी के बर्तन कैसे माँजोगी ?’

वो हंस के बोली – ‘आधा राजस्थान तो ऐसे ही बर्तन माँजता है। आपको तो शहर में इतना पानी मिल भी जाता है, पर गाँव में तो तीन चार मील तक जा जा कर पानी लाना पड़ता है, तो बस पीने और खाना बनाने का ही पानी भर के ला पाते हैं। बाकी तो नहाना, कपड़ा धोना तो सब कुएं पर जा कर ही करना पड़ता है।‘

मम्मी ने उसे और राख दी। हम सब दर्शकों की तरह उत्सुकता से कुछ नया देखने के लिए खड़े हो गए। उसने पहले सारे झूठे बर्तनों पर ज़्यादा सी राख छिड़क दी और राख के सहारे घिस कर सारी झूठन निकाल कर फैंक दी। फिर नई राख ले कर उससे सूखे सूखे ही घिस कर सारे बर्तन साफ कर दिये। बाद में सारे बर्तन साफ़ कपड़े से पोंछ कर रख दिये। बर्तन एक दम चमक रहे थे।

हम आँखें फाड़े ये सारी प्रक्रिया देख हैरान थे। हमारे लिए ये बिल्कुल नई बात थी। शाम को खाना परोसने से पहले हम थाली, कटोरियों व चम्मचों को ध्यान से देख रहे थे कि कहीं कुछ गंदगी छूट तो नहीं गई है। हमारी मानसिकता शायद ये स्वीकारने को तैयार नहीं थी कि बिना पानी के बर्तन साफ़ कैसे हो सकते हैं ?

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शादी के कुछ साल बाद मेरे पति की पोस्टिंग बॉम्बे ( आजकल मुंबई) रही। उस दौरान हम लोग विरार के पास रहे थे। हम जिस बिल्डिंग में रहते थे वो छः मंज़िला थी। हम लोग दूसरी मंज़िल पर रहते थे। बराबर के फ्लैट में एक महिला हैदराबाद की थीं, वो बताती थीं कि हैदराबाद में एक दिन छोड़ के पानी आता है, वो भी एक या दो घंटे के लिए। मुंबई में भी पानी की बड़ी समस्या थी। सोसाइटी में सारा पानी टैंकर से आता था और अंडरग्राउंड टैंक में भर दिया जाता था। वहाँ से पम्प कर के मल्टी स्टोरीड बिल्डिंग के ओवर हैड टैंक में चढ़ाया जाता था, जहां से अलग अलग डाउन पाइप्स से सब घरों में पानी सप्लाइ होता था।

जो लोग मुंबई नहीं गए हैं, या पाइप ले कर रोज़ अपनी कारें या पोर्च साफ़ करते हैं, या गर्मियों में पम्प चला कर सड़कों पर रोज़ाना पानी डालते रहते हैं, उनकी जानकारी के लिए कुछ बताना चाहूंगी। मुंबई में मल्टी स्टोरीड बिल्डिंग में ओवर हैड टैंक तो कॉमन होते हैं, पर उस से हर घर के लिए जो डाउन पाइप अलग अलग घरों को पानी सप्लाई करते हैं, उनमें मीटर लगा होता है, जिसका बिल आता है। जितना पानी खर्च करेंगे उतना ही बिल भरना होगा। पानी के पाइप में मीटर... ! शायद ये बात बहुत लोगों के लिए आश्चर्य का विषय हो सकती है। पानी की बरबादी तो छोड़िए… वहाँ किसी घर में यदि कोई नल टपक रहा होता है तो सब काम छोड़ कर पहले नल ठीक करवाया जाता है। वहाँ रहने वालों को भी पानी की बहुत कद्र है।

एक दिन शाम को मैं छत पर गई तो आश्चर्य चकित रह गई। सारी छत पर टाइल्स के टुकड़ों का बड़ा सुंदर फर्श बना हुआ था। छत पर टाइल्स लगी हुई मैंने पहली बार ही देखी थी। मुझे उसका उद्देश्य समझ नहीं आया। सोचा सफाई करने में आसानी होती होगी, क्यों कि छत बहुत साफ़ सुथरी थी।

फिर गर्मियों के बाद बरसात का मौसम आया। एक दिन जब ज़ोर की बारिश हुई तो मैंने अपनी मंज़िल के बाक़ी लोगों और बच्चों को बाल्टियाँ और मग ले कर ऊपर छत पर जाते देखा। सोचा कि बारिश में नहाने गए होंगे। फिर थोड़ा शोर भी सुनाई देने लगा। उत्सुकतावश मैंने अपने फ्लैट से बाहर निकाल कर देखा। बच्चों को छोटी छोटी बाल्टियों में पानी भर कर सीढ़ियों से उतरते देखा। कुछ समझ नहीं आया, तो मैं भी छत पर चली गई। छत पर जो नज़ारा देखा वो बड़ा अजीब था। छत से नीचे जाने वाली नालियों के मुंह लोगों ने कपड़े ठूंस कर बंद कर दिये थे, और वो छत पर जमा पानी को मग से बाल्टियों में भर रहे थे और उस पानी को घरों में ले जा रहे थे। मैं आश्चर्य में आ गई। उस दिन समझ में आया कि छत टाइल्स कि क्यों बनी है...और इतनी साफ़ रखने का क्या उद्देश्य है ?

पर फिर भी पानी तो ज़मीन से ही बटोरा जा रहा था, ज़ाहिर है, साफ़ तो होगा नहीं... ! उत्सुकतावश एक महिला से पूछा कि इस पानी का आप क्या करोगे... ? वो बोली – बहुत काम आयेगा, बारिश में बाहर से आने वाले लोगों से सीढ़ियाँ गंदी होतीं हैं, बच्चे दिन भर बारिश में ऊपर नीचे खेलते हैं और गंदी चप्पलें और पैर गंदे करते हैं, उन्हें धोने के काम आयेगा। टॉयलेट में भी डाल सकते हैं, पोंछा भी लगा सकते है... ! और कुछ ज़्यादा बताने से शायद उसका ध्यान बंट रहा था, तो वो फिर से पानी भरने में जुट गई।

पानी के जब पैसे देने पड़ें, तब ही शायद पानी की कीमत समझ आती है, वरना मुफ्त में मिल रहे पानी की बरबादी करना बहुत आसान होता है। अब आप ये न कहने लगिएगा कि वॉटर टैक्स तो हम भरते ही हैं। दिल पर हाथ रख कर कहिएगा कि क्या वो टैक्स काफी होता है उस पानी के लिए, जो आप दिल खोल कर खर्च करते हैं, सड़कों पर रोज़ पानी डालते हैं, रोज़ाना पोर्च व कारें धोते हैं... !

अब की बार जब पानी का इस्तेमाल करें तो मेरी बातें ध्यान में रखें।

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श्रीमती शशी रायजादा

पोस्टल संपर्क – द्वारा, डा, सुरेन्द्र वर्मा. १०, एच आई जी , १, सर्कुलर रोड / इलाहाबाद -२११००१

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रचनाकार: संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 8 // पानी रे पानी... // शशि रायजादा (लखनऊ)
संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 8 // पानी रे पानी... // शशि रायजादा (लखनऊ)
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