संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 30 : मैं ,मेरी नानी और ननिहाल // डॉ अनीता यादव

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प्रविष्टि क्र. 30 :

मैं ,मेरी नानी और ननिहाल

डॉ अनीता यादव

शैशवकालीन सुखद अथवा दुखद स्मृतियाँ हरेक जीवन का अंश होती हैं। ये स्मृतियाँ रह-रह कर अन्तर्मन को आलोड़ित,विलोडित और आंदोलित करती रहती हैं। बचपन के उस अमृतमयी वक्त को जब मैं जहनी तौर पर महसूसती हूँ तो ओष्ठ-स्मित के साथ साथ नेत्र पनीले हो उठते हैं। मेरे बचपन और मेरी सोच का केंद्र वह नानी हैं जो ननिहाल रूपी परिवार का दरख्त थी तो हम सब उसकी शाखायें। इसी दरख्त की शाखा रूप में मैंने बचपन का माकूल हिस्सा बिताया। मेरी स्मृति में दृश्यवत खड़ी नानी रूपी 'स्मृति- स्तम्भ' को देखने की भरसक कोशिश के बावजूद आंखें धुंधला उठती हैं और सोच के घोड़े दौड़ने की बजाय घुटनों बैठते दिखते हैं। नानी के कारण ‘ननिहाल’ शब्द मेरे लिए मात्र एक शब्द नहीं बल्कि पूरी कायनात हो उठता हैं जो बिन परवाज़ भी उड़ने में मदद करता हैं। दादी के परिवार से मात्र दो महीने की एक बच्ची के रूप में तिरस्कृत मुझे पालना बिन माँ और उसके दूध के आसान हो पाता?नहीं! पर नानी के हृदयगत स्नेह,प्रेम,करुणा, वात्सल्य पूर्ण देखभाल और हृदय की गहराइयों में खूबसूरत ममत्व की गमक ने ये संभव बनाया। एक बिन्दु पर आकर डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था पर अभी उस प्रौढ़ा का जवाब देना बाकी था, और वह अपनी स्नेहशीलता के बल पर खींच लाई मुझे मृत्यु के उन गहन गह्वरो से,जिसका बदला किसी भी कीमत पर चुकाना संभव नहीं।

भरे पूरे परिवार की मालकिन नानी के घर में नाना के अलावा पाँच बेटे -बहुयें, तीन बेटियाँ और बालक या बालिका के तौर पर मात्र मैं ही थी। श्रद्धा,प्रेम,स्नेह,करुणा जैसे मानवीय भावों की परिभाषा का ज्ञान उस नानी से ही हुआ जिसकी याद आज भी मानस के अंतस में कहीं गहरे दबी हैं और गाहे बगाहे सामने आ खड़ी होती हैं। दिल्ली जैसे महानगरों के गाँव की पैदाइश मुझे पैदा होते ही दादी द्वारा मार दिया जाता यदि माँ मुझे अपने मैके हरियाणा (जिला झज्जर) के एक छोटे से गाँव पलड़ा में नानी के पास नहीं छोड़ आती। दिल्ली की प्रगतिशील सोच के बुद्धिजीवी परिवार में भी लिंग-भेद की शिकार मुझे वहाँ जीवन मिला जो राज्य बेटियों के जनमते ही मारने के लिए कुख्यात रहा हैं। माँ के लिए अपने बच्चे को अपने से दूर रखना ही नहीं बल्कि असीम समय के लिए छोड़ देना आसान नहीं था, पर बच्चे की जान प्यारी हो तो दूरी भी मीठी लगती हैं ,यह माँ समझ गई थी। साथ ही पत्नी, बहू,भाभी जैसी अनेक भूमिकाओं के चलते माँ को ‘माँ की भूमिका’ उतार फेंकने के लिए मजबूर होना पड़ा जिसे नानी ने ओढ़ने में जरा देर न की और मरते दम तक मैं उसके लिए नातिन न होकर चौथी बेटी ही रही। मैं भी उसे न केवल माँ कहती थी बल्कि मन से स्वीकारती भी थी। ‘माँ’ शब्द सुनते ही आज भी मेरे जहन में वह प्रौढ़ा ही दृष्यवत हो उठती हैं। क्यों न हो ? अपनी सूखी और दूध रहित छाती से दो महीने के मांस के लोथड़े-सी मुझे उसने दूध न सही स्नेह की धार से रूखे,सूखे ओठों को सिक्त कर जीवन दान दिया था।

मृतप्राय शरीर को उसका लाड़ भरा स्पर्श पाकर जैसे मेरे उस निरीह और निर्जीव से तन में प्राण आ गए थे। मुझे गोद में लेते ही वह अधेड़ा वात्सल्य और अगाध विश्वास से परिपूर्ण मानो मानसिक स्तर पर सद्य प्रसवा हो उठी थी, फिर जीवन के दस वसंत कैसे हाथ से रेत मानिंद सरर से फिसलते चले गए पता ही नहीं चला। इस अवधि में उसने उस मांस के लोथड़े से मुझे इंसान के रूप में उसी तरह गढ़ और तराश डाला जैसे कोई कुम्हार चाक पर मिट्टी को आकार दे खूबसूरत बर्तन या मूर्तिकार मूरत तराशता है। मेरे लिए उस झुर्रियों से युक्त और सिक्त चेहरे का कर्ज उतारना असंभव हैं पर जब मैं उन लटकती खाल को अपने हाथों में ले प्यार से सहलाती तो वह प्रसन्न वदना हो उठती। फिर जब मेरी घर वापसी [दादी के घर,दिल्ली] की प्रक्रिया चली तो नानी को लगा जैसे किसी ने उसके शरीर से प्राण खींच लिए हो! आखिरकार मान मुनौवल के बाद सशर्त मैं पिताजी संग रवाना कर दी गई। शर्त थी - विद्यालय की गर्मी की छुट्टियाँ नानी के साथ ही बितानी होंगी बिना नागा किए। इस पर किसी को भी कोई हर्ज नहीं था। इस दौरान मुझ दस साल की बच्ची ने उस अनपढ़ नानी से लोकाचार भरपूर सीखा था जो जीवन भर काम आनेवाला था। जिसका परिचय मैं वही रहते दे चुकी थी। घर में मामी को दौरे पड़ने की बीमारी थी और जब घर कोई नहीं होता तो कई बार स्थिति विकट हो जाती थी । ऐसे ही एक बार मामी को दौरा पड़ा तो घर पर कोई बड़ा नहीं था। ऐसे में मैंने पानी भरी चम्मच उनके दांतों के बीच फंसा थोड़ा पानी डाला जैसा कि मैं घर में पहले देख चुकी थी,और वह सामान्य हो उठी, फिर क्या था मेरी तारीफ की चर्चा कई दिन गाँव में जोरों पर रही।नानी फूल कर कुप्पा। उसी दिन सबने मान लिया था की यह बालिका अपने अन्य समवयस्कों से कहीं अधिक समझदार हैं। ये समझदारी मेरी और नानी के प्रेम की दुश्मन निकली और इसने मुझे मेरी दादी के घर ला पटका जहां मैं ग्यारह साल की ही मानो अपना सारा बचपन नानी के साथ ही छोड़ आई।

गाँव की भांति ही शहरी समाज भी लड़की के पैदा होते ही न केवल घबरा उठता हैं बल्कि कई तरह की दुश्चिंताओं से घिरा महसूस करता है। उनका सबसे बड़ा बोझ विवाह और उसमें दिया जानेवाला दहेज मुख्य रहता हैं। लड़की पर लड़के की तरह धन खर्च करने को अपव्यय माना जाता हैं। वह ‘पराई’ या ‘अमानत’ कहीं जाती हैं। मानो वह कोई वस्तु हो जो बेची और खरीदी जाती हैं। यदि लड़की का रंग काला हो तो वह अभिशाप ही हो उठती है। पिताजी खुद शिक्षित थे,बावजूद इसके परिवार की मुखिया दादी अनेक समस्याओं की जननी रही। वह औरत होते हुये भी पितृसत्ता की आजन्म पक्षधर रही थी । जिस परिवार ने मुझे बोझ और लड़की समझ फेंक ही दिया था उनको आज नानी का लाड़-प्यार मेरी पढ़ाई में बाधक लगने लगा था। शुरू के कुछ साल दो महीने नानी के पास जाकर मानो 'जी' उठती थी। ये वो समय था जो मुझमें नई स्फूर्ति भर देता ताकि फिर दिल्ली की तंग गलियों में जाकर जी सकूं। एक समय ऐसा भी आया जब दो महीने दो दिन में बदल गए और इस तरह ननिहाल जाना कम से कमतर और फिर बंद सा ही हो गया। उस प्रौढ़ा ने मूक भाव से मेरा बिछोह स्वीकृत तो कर लिया पर उस अनचाही स्वीकृति ने उनके मन और जीवन पर बेचैनी का वितान सा तान दिया था । समय किसी के रोके कहाँ रुका है और वह जैसे पंख लगा कर उड़ चला । पढ़ लिख कर अब मैं नानी के लिए बाबू बन चुकी थी। इस बाबू के विवाह के कार्यक्रम में उसे किसी भी कीमत पर आना था और यह आना उस बुजुर्गा का पहली बार था क्योंकि उत्तर भारत के ग्रामीण समाज में बेटी के घर का पानी पीना भी पाप का भागी होना माना जाता हैं। एक दिन उसने मेरे जीवन को बचाने का उत्तरदायित्व ओढा था तो आज इस ‘पाप’ को भी ओढ़ लेना चाहती थी अपने बाबू के लिए यानी मेरे लिए । मुझे भी हफ्ते भर तक जब तक नानी मेरे साथ रही ,लगा जैसे जीवन का वह बिछड़ा बचपन लौट आया है और पौध को पतझड़ से जूझन हेतु सींचन मिल रहा हैं जो वैवाहिक जीवन की कठिन राहों में मुझे ताकत से भर देगा। अपने हाथों से क्या तैयार नहीं किया उन्होंने मेरे दहेज के नाम पर। छोटी से बड़ी चीज को अपने ही हाथो से बनाने की जैसे जिदद- सी पकड़ी थी।

बिना चश्मे के ही सुई को अपने आप धागे में पिरोती हुई वह लग ही नहीं रही थी कि साठ पार कर चुकी हैं। मैं कहाँ जानती थी कि उस अमरबेल के मेरे साथ ये आखिरी कुछ ‘अच्छे दिन’ हैं। वैवाहिक जीवन की जिम्मेदारियाँ ओढ़ मैं भी अपने दायित्व निर्वाह में मशरूफ़ हो गई और उसके सिखाये संस्कारों के निर्वाह में किसी भी तरह की कोताही नहीं बरतना चाहती थी। उस बुजुर्गा को सालों बीतने पर भी भूली नहीं पर मिल भी न पाई। पंद्रह वर्ष के अंतराल पर अचानक उस मशरुफियत भरे जीवन में एक बुरी खबर आई कि नानाजी नहीं रहे और नानी की मानसिक हालत कुछ ठीक नहीं हैं। भाई और माँ को साथ ले अपनी ‘जीवांदायिनी शक्ति’ को एक बार देखने गई जो अब मात्र एक कृशकाय या हड्डियों का ढांचा ही शेष थी। देखते ही उनकी सूनी आंखें चमक उठी और फिर आंसुओं की लड़ी से गंगा बनते देर न लगी। मेरी सजल आंखे भी अब यमुना की तरह बांध तोड़ गंगा में जा मिली। वे लोग अचंभित थे जो ये कह रहे थे कि उन्हें स्मृति-लोप हैं। नाना के मरने पर भी जिसकी आंखों से आँसू की एक बूंद न गिरी आज नदी बह रही थी। आज वह मेरे हाथों में उसी भांति थी जैसे बचपन में मेरे रूठने पर अपनी गोद में मेरा सिर रख लाड़ से खाना खिलाती थी। कुछ घंटों की बैठक से मुझे आभास हो चुका था कि वह मानसिक ही नही शारीरिक रूप से भी दुखी हैं। मामी उन्हें अंदरूनी अंगो की कमजोरी के कारण खाना केवल सुबह शाम ही दिया करती ,वह भी आधा पेट । पानी भी सीमित मात्रा में ताकि बिस्तर भीग न जाये और उन्हें कुछ काम मिल जाये। मेरे हाथ से एकसाथ दो गिलास पानी पीना और सामने रखे बिस्कुट को खाते खाते अपनी कमीज की जेब में अगली बार के लिए सहेज कर रखने जैसे नानी के क्रियाकलापों में मैं अपना बचपन तो कतई नहीं ढूंढ सकती थी क्योंकि यह बचपना नहीं बुढ़ापे की वो भूख थी जो उस परिवार ने उसे मात्र इसलिए दे दी ताकि गू-मूत्र साफ न करना पड़े। अपने साथ रखने की जहमत भी नहीं उठाता वह परिवार यदि नानी की पेंशन का सवाल नहीं होता। अपनी बहू का खौफ उसकी बेजुबान आंखें बयां कर पाने में समर्थ थी। उसकी ममतालु आंखें आज कितनी नीरस और बेजान लग रही थी जो मानो मुझे अनकहे ही कह रही थी-‘ले चल मुझे अपने साथ’ पर घरेलू विवशताओं के चलते असमर्थ थी या स्वार्थी हो उठी थी जो उसकी निरीह आँखों में झाँकने से बचने लगी और मात्र मामी को कुछेक हिदायतें देकर ही अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ उसे उन्हीं खौफजदा हाथों के भरोसे ही छोड़ आई। उसके ‘मन की बात’ को सुनकर भी अनसुना कर आई थी। फिर उस दिन दुख के परनाले में डूब गई जब कुछ ही महीनों में उसके स्वर्गवासी होने की खबर पाई। सोचती हूँ जिन परंपरागत रूढ़ियों को तोड़ वह मेरे विवाह में चली आई थी ,यदि मैं भी पारिवारिक बंधनों से स्वयं को थोड़ा भी ढीला कर लेती तो वह प्रौढ़ा जीवन के कुछ आखिरी दिन मेरे साथ गुजार लेती तो शायद आज वह कचोट मेरे अंतस में बार बार उभर कर न सालती।

एक माँ अपने दस बच्चों को भी अनेक समस्याओं का सामना करते हुये भी पाल लेती हैं लेकिन दस बच्चे मिलकर एक माँ को अंत समय भी सुख मुहैया कराने की बजाय स्वार्थी हो शतुरमुर्गी मुद्रा अपना लेते हैं। माँ-बाप जितना करते हैं अपने बच्चों के लिए यदि उससे आधा भी बच्चे कर पाये तो समाज में दिन-प्रतिदिन कुकुरमुत्ते की भांति उगनेवाले वृद्धाश्रमों की आवश्यकता न रहे। मेरी उस माँ रूपी नानी का अंत भी थोड़ा अलहदा हो सकता था यदि मैं उस नैसर्गिक फूल को माकूल वक्त दे पाती। पर अब तो मात्र मानस पटल पर उभरती उसकी स्मृति को महसूस करते हुये अपनी मन ,आत्मा को ही चोटिल करती हूँ। अब केवल-‘आठों सिद्धि नव निधि को सुख,नन्द की गाय चराय बिसारौ’ की तरह बचपनी सुख को स्मृति में ही गुन रही हूँ और आजीवन गुनती रहूँगी।

संक्षिप्त परिचय –

डॉ अनीता यादव

आधा-दर्जन से अधिक पुस्तकों का सम्पादन

विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं- युद्धरत आम आदमी पत्रिका, सरस्वती सुमन मासिक पत्रिका ,आधुनिक साहित्य पत्रिका ,सहचर-ई पत्रिका,जन-कृति ई पत्रिका,जनसत्ता दैनिक समाचार पत्र ,समज्ञा दैनिक समाचार पत्र [कोलकाता] कालवाड़ टाइम्स{जयपुर}आदि में- व्यंग्य, यात्रा संस्मरण ,कहानियाँ तथा लेख प्रकाशित ।

पिछले ग्यारह वर्षों से दिल्ली-विश्वविद्यालय [गार्गी महविद्यालय,हिन्दी विभाग] में स्थायी रूप से प्राध्यापक पद पर कार्यरत।


पता- 6/10, third floor, indra vikas colony, mukherji nagar, delhi-110009

मेल- dr.anitayadav@yahoo.com

2 टिप्पणियाँ "संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 30 : मैं ,मेरी नानी और ननिहाल // डॉ अनीता यादव"

  1. अत्यंत मर्मस्पर्शी चित्रण ,साधुवाद आपको

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  2. kamini kamayani1:59 pm

    bahut achcha sansmaran .

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