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बसंत की कविताएँ // डा. सुरेन्द्र वर्मा

आशीष नाइक की जलरंग कलाकृति

(१)

डालियों से हरे पत्ते झांकते हैं

बच्चे किलकारते हैं

धन्य हैं बड़े बूढ़े

दरख़्त के नीचे, इनकी खातिर

जिन्होंने वैराग्य ले लिया

लो बसंत आ गया

(२)

औचक ही आ जाता है बसंत

पूरी प्रकृति ही बदल जाती है

यकायक

ऐसे में कब

कौन सी उत्कंठा जाग जाय

पता नहीं चलता !

काम का सहचर है बसंत

पलाश में लगी आग

तपाती है तन

अधीर कर जाती है हमारा मन

कोरे कागज़ पर, बस

तुम्हारा ही नाम है – बसंत

(३)

ओ बसंत

तुम संत कब से हो गए ?

दिन में कमल

और महकाकर बेला रात में

निहाल किया माधवी को तुमने

अपनी मादक बयार से उसे

बदनाम किया दिग-दिगंत

ओ बसंत

तुम संत कब से हो गए |

(४)

पत्ता पत्ता खिल उठा बसंत में

प्रकोप शीत का

मजबूर हुआ बसंत में !

वय: संधि की आहट

नीम-ठंडक

और ग्रीष्म की गुनगुनाहट

बचपन की विदाई

और यौवन की दस्तक

स्वाभिमान में उठा मस्तक

कुंठा रहित उल्लास है

विकुंठ का आनंद भाव है

ग्रंथियों से मुक्ति पा

मन उदात्त है

पता पत्ता पुष्प हुआ बसंत में

(५)

डालियों पर अटकी

पीली पत्तियां झरीं

धूलि के बगूले उठे

खड़क उठे पात

नीम के, पीपल के.

बासंती हवाओं में

भटकता रहा पतझर

इधर उधर.

खिल उठीं कलियाँ गुलाब

महक उठा गंध राज

जंगल जंगल लद गया

लाल फूलों से पलाश.

पत्ता पत्ता झड़ गया

जगह देकर दूसरों को.

कहीं स्वागत गान

तो कहीं मर्सिया

जीवन और मरण बीच

सिर्फ एक बारीक रेख

देख पतझड़ – बसंत देख

--

--डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद -२११००१

कविता 7442452915993412920

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