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संस्मरण // सुशील का जाना // यशवंत कोठारी

श्रद्धांजलि

सुशील सिद्धार्थ

सुशील सिद्धार्थ का इस तरह जाना बहुत दुखद रहा.उनसे कोई लम्बा परिचय नहीं था. दिल्ली गया तो किताब घर गया वहीँ उनको देखा , इस से पहले फेस बुक पर देखता था. फिर पढ़ा भी.

वे बड़े प्रेम से मिले. चाय पानी को पूछा . लगभग २ घंटे की यह मुलाकात रहीं उन्होंने हाशिये का राग व् चुनिन्दा व्यंग्य की पुस्तकें भेट दी . व्यंग्य की उठापटक के अलावा भी कई बातें हुयीं . उन्होंने किताब घर के मालिक से मुलाकात करवाई , वे बड़े प्रेम से मिले. लेकिन मैं कोई पाण्डुलिपि नहीं भेज सका. सुशील मुझे बाहर तक छोड़ने आये. एक स्थानीय प्रकाशक व्यंग्य पर कोई सीरीज छापना चाहते थे , मेरे कहने पर सुशील ने स्वीकार कर लिया था, मगर नियति को कुछ और ही मंज़ूर था. कुछ महीनों बाद फिर मिलना हुआ, इस बार मुलाकात छोटी थी मगर ज्ञान वर्धक थी मेरे जेसे कस्बाई लेखक को भी उन्होंने पूरा मान दिया उन्होंने मेरे लिए फेस बुक पर लिखा भी . मुझे उनके उपन्यास का इंतजार था मगर अब कभी नहीं आएगा.

ज्ञान चतुर्वेदी सम्मान के बारे में मैंने वैचारिक मतभेद भी प्रकट किया मगर उनकी आस्था,श्रद्धा व् निष्ठा नहीं डिगी.

मुझे उम्मीद थी की वे अभी लम्बी पारी खेलेंगे,उम्र भी कम थी मगर वे थोडा और अच्छा देकर चले गए.

कल अनूप शुक्ल से उन पर फोन पर लम्बी बात हुयी ,गला भर गया .

दर्द की सबसे बड़ी चट्टान उनके घर परिवार के हिस्से मे है. बहुत से लोग लिखेंगे और बेहतर लिखेंगे मगर मेरी भी एक अंजली भर श्रद्धांजलि . प्रणाम सुशील

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