व्यंग्य : नमक ज्यादह, कम नमक // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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वे कोई रसोइया नहीं थे। बुद्धिजीवी थे। बातों बातों में नमक के बारे में उन्होंने अपनी बुद्धि दौडाई। बोले, खाने का अपना कोई स्वाद नहीं होता। सारा स्वाद नमक में होता है। खाने में नमक ज्यादह हो अथवा कम हो, खाने का स्वाद बिगड़ जाता है। खाना तो पृष्ठभूमि में पडा रहता है। बस नमक ठीक होना चाहिए। नमक ठीक तो सब्जी भी ठीक। ढेर सारी सब्जी का स्वाद बस चुटकी भर नमक ही तय करता है। पर चुटकी भर नमक, यानी कितना नमक ? ऐसा कोई यंत्र नहीं बना जो तौल कर बता दे की चुटकी भर नमक ग्राम के अनुसार बस इतना ही होना चाहिए।

मैं दिल का मरीज़ हूँ। बीपी भी कुछ ज्यादह ही रहता है। डाक्टर को दिखाया। तमाम परीक्षणों के बाद वे बोले, नमक कम कर दीजिए। मैंने कहा, नमक तो मैं वैसे भी ‘कम’ ही लेता हूँ। बोले, थोड़ा और कम कर दीजिए। अब ‘कम’ को भी ‘और कम’ कैसे किया जाए ? –बड़ी समस्या है। हांर्ट की समस्या से तो वैसे ही ग्रस्त था। अब एक समस्या और खड़ी हो गई। मैंने अपनी इस समस्या को नज़र-अंदाज़ करते हुए पूछा, मैं मीठा-प्रेमी हूँ, यदि नमक कम कर दूं तो शकर थोड़ी ज्यादह ले सकता हूँ ? प्रश्न सुनकर आपकी तरह डाक्टर साहब को भी हंसी आ गई। लेकिन फिर गंभीर होकर कहने लगे,‘चीनी कम’। नमक ही नहीं, शकर भी आपको कम ही लेना है। हार्ट पेशेंट्स के लिए यह बहुत ज़रूरी है कि वे नमक और चीनी दोनों से ही परहेज़ करें। मारे गए। बेचारे दिल के मरीजों की तो सारी ज़िंदगी इसी अंदाज़ के जुगाड़ में गुज़र जाएगी कि खाने में कहीं चीनी और नमक ज्यादह तो नहीं हो रहा है ?

बाइबल कहती है, अपने में नमक रखो। अपने में नमक सहेजकर रखना बड़ा ज़रूरी है। अगर आपने अपने में नमक नहीं रखा तो भला आपको पूछने वाला कौन रह जाएगा ? अगर आप सामाजिक हैसियत बनाए रखना चाहते हैं तो आपको अपना नमक बनाए रखना बहुत ज़रूरी है। कुछ लोग जन्मजात नमकीन होते हैं कुछ को नमकीन बने रहने के लिए प्रयत्न करना होता है। कई महिलाएं बेचारी नमकीन बने रहने के लिए क्या क्या नहीं करतीं। वे भूल जाती हैं कि ज्यादह नमक बदस्वाद भी कर सकता है। इंसान में नमक बस उतना ही होना चाहिए कि उससे दुबारा मिलने की वह प्यास जगा सके। हमें कोई भी नमकीन चीज़ खाने पर प्यास लगती है। ठीक इसी तरह एक बार किसी से मिलने पर उससे दुबारा मुलाक़ात करने की यदि प्यास जग जाए तो यही उसकी सही मात्रा में नमकीनियत है। नमक सिर्फ नमक नहीं होता। वह प्रतीक भी है। वह मेल-मुलाक़ात का प्रतीक है, एक दूसरे की मदद का प्रतीक है। संधि और वफादारी का प्रतीक है। नमक सामाजिकता का प्रतीक है।

नमकीनियत सिर्फ नमक में ही नहीं होती। विवाहित लोग समधिन में, साली में, सलहज में – कहीं भी इसे ढूँढ़ निकालते हैं। उनकी पत्नियां बदला लेने के लिए देवरों और बहनोइयों में नमकीनियत खोजने लगती हैं। पति-पत्नी के बीच थोड़ी बहुत नोक-झोंक तो होती ही रहती है। ये नोक-झोंक वैवाहिक जीवन का नमक है लेकिन वह इतनी न बढ़ जाए कि रिश्ते की मिठास ही ख़त्म हो जाए। नमकीनियत भी बस इतनी होनी चाहिए कि मीठी लगे।

बुद्धिमान लोग अपना दर्द छिपा कर रखते हैं। वे जानते हैं कि मरहम हर जगह नहीं मिलता और घाव पर मरहम लगाने वाले भी बहुत कम होते हैं। ल्रेकिन नमक हर घर में होता है। घर घर में होता है। क्या पता कोई कमज़र्फ आपका दर्द सुनकर आपके घाव पर ही नमक न छिड़क दे। सो होश्यार रहना पड़ता है। रहना भी चाहिए। अपना दर्द सबको न बताएं साहेब। ध्यान रखें जो बहुत ज्यादह मक्खन लगाते हैं, अमूमन नमक भी वे ही छिड़कते देखे गए हैं।

किसी का नमक खाया है तो उसे चुकाना पड़ता है। दुनिया में यों तो कई तरह के लोग हैं लेकिन नमक के दृष्टिकोण से उनकी दो किस्में हैं – नमक हलाल और नमक हराम। जो लोग दूसरों का खाया नमक चुकता कर देते हैं, नमक हलाल की कोटि में आते हैं। जो नमक डकार जाते हैं, नमक हराम होते है। नमक हरामों की उच्चतम श्रेणी में वे लोग आते हैं जो आपका नमक खाकर आपके ही ज़ख्मों पर उसे छिड़क देते हैं। दुष्टों में दुष्ट ऐसे लोगों की आजकल खूब बन आई है।

गांधी जी शायद पहले ऐसे राजनीतिज्ञ थे जो नमक को राजनीति में लाए। भारत का स्वतंत्रता आन्दोलन जब अपने पूरे शबाब पर था,गांधी जी की नज़र नमक जैसी एक अदना सी दिखने वाली चीज़ पर पडी। नमक हरेक की ज़रूरत है; समुद्र के पानी से इफरात से मिलने वाली चीज़ है। पर अंग्रेजी शासन इस पर भी टैक्स वसूलने से बाज़ नहीं आया। नमक बनाने पर प्रतिबन्ध लगा कर नमक पर अपना एकाधिकार कर लिया। इसके विरुद्ध गांधी जी ने नमक-आन्दोलन छेड़ दिया। अहमदाबाद से दांडी तक की कई रोज़ की यात्रा में लोग जुड़ते गए और अवैध रूप से नमक बनाते गए। इस नमक आन्दोलन ने दुनिया को सोचने को मजबूर कर दिया। ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत में यह आन्दोलन एक मजबूत कील साबित हुआ। सबको एक ज़रूरी सबक मिला – अदना से अदना वस्तु को भी अमहत्वपूर्ण मानने की गलती कभी न करें। नमक न होता तो आज हम अपनी राजनैतिक स्वतंत्रता का आस्वाद ही शायद नहीं ले पाते।

स्वाद के लिए कितना नमक चाहिए – न कम न ज्यादह। अति से बचिए। जीवन में भी संतुलन की ही ज़रूरत है, भाई !

--डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद -२११००१

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2 टिप्पणियाँ "व्यंग्य : नमक ज्यादह, कम नमक // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा"

  1. बहुत सार्थक व्यंग्य रचना नमक ज्यादह नमक कम...👌👌💐💐👌👌💐👌👌 हार्दिक बधाई सहित सादर नमन आपको आदरणीय सुरेंद्र वर्मा जी ..../\....

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद, गजानन जी।सुरेन्द वर्मा.

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