विषादेश्वरी भाग 4 // उड़िया उपन्यास // सरोजिनी साहू // अनुवादक - दिनेश कुमार माली

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भाग 1 भाग 2 भाग 3
"तुम तो बहुत दिनों से मेरे देश के भोजन-पानी के आदी हो। मज़ाक मत करो, सच बताओ। "
"प्रोफेसर नंदी के घर में कल डिनर था। सभी आइटम तैलीय और मसालेदार थे। तुम्हें पता है, मैं एक लैक्टोज शाकाहारी हूं, इसलिए जो भी कारण हो, पानी भी हो सकता है। जो भी तुम कहो, दिल्ली में पानी की अवस्था बहुत हॉरीबल है। "

हर्षा ने कहा, “ हमारे यहाँ एक कहावत है: 'जब तुम रोम में हो, रोमन बनो। ' तुम्हें इसे मानना पड़ेगा; जब हमारे लोग तुम्हारे देश जाते हैं, तो क्या वे तुम्हारे देश का खाना खाकर नहीं जीते हैं? इसके अलावा, आवश्यकता पड़ने पर मनुष्य को बांस की जड़े खाकर भी जिंदा रहना पड़ता है। इस बात से मुझे एक अच्छी कहानी याद आ गई।
"सुनाओ", बहुत रुचि दिखाई थी अल्बर्टों ने। उसके पास विभिन्न देशों के मिथकों की एक किताब थी। हर्षा ने देखा उसमें महाभारत की अनेक कहानियां प्रकाशित हुई थी। इसलिए जब भी उसने हर्षा से कहानी सुनाने के लिए कहा, तो उसने कभी संकोच नहीं किया। मगर उसके बीमारी की अवस्था में कहानी सुनाना उचित होगा?
"तुम बीमार हो, " हर्षा ने कहा।

"ओह, हाना, मैं मर नहीं जाऊंगा। कृपया सुनाओ न। "
"तब सुनो। यह 'त्रेता' और 'द्वापर' युग के संक्रमण-अवधि की कहानी है। कई सालों से बारिश नहीं होने के कारण संसार विनाशकारी अकाल की चपेट में आ गया। किसी भी आदर्श या आचार संहिता का उल्लंघन करते हुए लोग भोजन की तलाश में विभिन्न देशों में चले गए। मां अपने बेटे के लिए उद्दिष्ट खाना खाने में संकोच नहीं करती थी। लोग खाद्य-अखाद्य पदार्थों के बीच भेद नहीं करते थे। तुम जानते हो, जब दुनिया में जीवों की संख्या सीमा से अधिक बढ़ जाती है, प्राकृतिक विपदाएँ पैदा होती हैं। संसार आधे प्राणियों के विनाश के बाद ही राहत की सांस लेता है। "

"ऐसी स्थिति में महर्षि विश्वामित्र ने सपरिवार अपना निवास-स्थान छोड़कर भोजन की तलाश में विभिन्न गांवों में भटकने लगे। जहां भी वे जाते थे, खाद्य तो दूर की बात मकई का एक दाना नसीब नहीं होता था। गृहस्थी के रूप में अपने परिवार के पोषण की ज़िम्मेदारी उनकी थी। भोजन की तलाश में यहां-वहाँ भटकते हुए एक दिन उन्होंने शहर के किसी बाहरी इलाके के एक विशेष स्थान के आस-पास बहुत सारे कौओं को उड़ते देखा। उन्हें उम्मीद बंधी कि वहां कुछ खाना अवश्य मिलेगा। इस जगह की ओर आगे बढ़ने के लिए, अपने परिवार को उन्होंने एक पेड़ के नीचे छोड़ दिया। शहर के बाहरी इलाके में चांडाल बस्ती थी। नजदीक पहुँचने पर उन्होंने कुत्तों और गधों को विचरण करते हुए देखा। उन्होंने अनुमान लगाया कि इस बस्ती में खाने का अभाव नहीं होगा। सड़क पर चलते समय उन्होंने कई लोगों को मांस खाकर शराब पीने के बाद एक दूसरे को गाली-गलौच करते हुए देखा। वे आश्चर्यचकित थे और यह सोचकर प्रसन्न भी थे कि यह बस्ती अकाल की चपेट से कैसे बच गई। जो हो, उन्होंने सोचा कि इस बस्ती से भिक्षा मांगकर खुद और अपने परिवार को बचाया जा सकता है। वे दरवाजे से दरवाजे जाकर भिक्षा मांगने लगे, मगर किसी ने उनकी प्रार्थना नहीं सुनी। बल्कि उपहास से लोग उन पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी करने लगे। द्वार-द्वार भिक्षा मांगते-मांगते विश्वामित्र थक गए थे। वह और एक कदम नहीं चल सकते थे। तभी उन्हें एक चांडाल के घर के दरवाजे की फांक से बीच में कुत्ते का मांस पड़ा हुआ दिखाई दिया और वह आराम करने के बहाने वहाँ बरामदे में सो गए। अंदर में चांडाल और उसके दोस्त लोग शराब पीकर कोलाहल करने लगे। धीरे-धीरे शाम हो गई। दोस्त लोग चले गए। जब विश्वामित्र ने घर में शराब के नशे में चूर चांडाल को अकेले देखा तो वह कुत्ते के मांस को लेने के लिए उसके घर में प्रवेश किया। उसी क्षण हाथ में तेज चाकू लिए चांडाल गरजने लगा, मेरे घर में घुसकर कौन मांस की चोरी कर रहा है? बहुत शर्मिंदा होकर विश्वामित्र ने अपना परिचय दिया, यह सुनकर चांडाल आश्चर्यचकित था। उसने माफ़ी मांगी, मैं आपको अंधेरे और नशे की वजह से पहचान नहीं सका, मुझे माफ कर दो। मगर मेरे मन में एक प्रश्न आया है। क्या यह काम आपके जैसे महान व्यक्ति के लिए अच्छा है? '

"तुम जानते हो कि विश्वामित्र ने क्या जवाब दिया? मैं अपने काम से शर्मिंदा हूँ। मेरे पास कोई रास्ता नहीं था I मेरे भूखे परिवार के लिए भोजन ढूंढना ही मेरा एकमात्र कर्तव्य था। भिक्षा नहीं मिलने के कारण जब मैं निराश हो गया, तभी मेरी नजर इस कुत्ते के मांस पर गिरी, इसलिए मैं अपने परिवार की जान बचाने के लिए चोरी कर रहा था।
चांडाल ने फिर से कहा, “आप ब्राह्मण होकर भी एक चांडाल के जूठे भोजन को लेने के लिए तैयार थे, क्या यह धर्म के अनुसार अभक्ष्य नहीं है? तुम जानते हो अल्बर्टों, विश्वामित्र ने क्या जवाब दिया? उन्होंने कहा: बुभुक्षित या मरने वाला व्यक्ति अपनी जान बचाने के लिए जो कार्य करता है, वह धर्म के अनुसार है और सही कर्म है। " हर्षा ने कहानी को समाप्त करते हुए कहा, "जब तक तुम मेरे देश में रहते हो, तब तक तुम्हें मेरे देश का भोजन-पेय लेना पड़ेगा। "
अल्बर्टो ने कहानी को सुनने के बाद हर्षा से पूछा कि क्या चांडाल विश्वामित्र की बात सुनकर चुप रहा।
"नहीं, उनके बीच काफी तत्व-चर्चा और तर्क-वितर्क हुआ था, मगर मैं उन सभी बातों को भूल गई हूं। "
अल्बर्टों ने कहा, "यू आर रियली वंडरफूल लेडी। इसलिए जिस दिन तुमसे नहीं मिलता हूँ तो खाली-खाली लगाने लगता है। "

एक दिन के भीतर उसका चेहरा सुखकर काला काठ हो गया था। हर्षा बाहर चौकी पर बैठी हुई थी और घर में चारों तरफ किताबें-ही-किताबें नज़र आ रही थी। टेबल पर किताबों के ढेर पड़े हुए थे। बिस्तर के पास प्लास्टिक की टोकरी में ओआरएस घोल के कवर पड़े हुए थे। वह अल्बर्टो के फ्लैट में पहली बार आई थी।
"हाना, थोड़ी देर प्रतीक्षा करो, मैं अभी आ रहा हूं। " कहकर वार्डरोब से कपड़ों की एक जोड़ी लेकर बाहर चला गया अल्बर्टों और एक नीली पैंट और आसमान-नीली शर्ट पहनकर जल्दी लौट आया।
"तुम सूटेड-बूटेड होकर कहाँ जा रहे हो? तुम बीमार हो! तुम कमजोर हो!"
" मुझे लगता है कि बाहर घूमकर आने से अच्छा लगेगा। दिन भर घर में बैठे-बैठे बहुत खराब लग रहा है। "
" ठीक है चलो, मगर ज्यादा दूर नहीं, तुम क्या कहते हो?"
थोड़ा चलने के बाद वे बच्चों के पार्क में बैठ गए।
" कैसा लग रहा हैं, अल्बर्टो?"

“ आगे से अच्छा लग रहा है। बंद कमरे से बाहर निकलने पर खुला-खुला लग रहा है।
आज सवाल पूछने की तुम्हारी बारी थी। हाना, क्या तुम्हें याद हैं? "
"नहीं, आज नहीं। किसी और दिन। आज मुझे देर हो रही है। मैं ज्यादा समय नहीं बैठ पाऊँगी। अगर मैं तुम्हारे पास एक घंटे या उससे ज्यादा बैठती हूं तो लौटते-लौटते मुझे अंधेरा हो जाएगा। तुम तो जानते हो, दिल्ली आजकल बिलकुल सुरक्षित नहीं है। मैंने तुम्हारे लिए सात सवाल तैयार करके रखे हैं। "
" वास्तव में, फिर क्यों नहीं पूछ रही हो ? पूरे दिन न तो पढ़ाई और न ही चर्चा होने के कारण खराब हो गया। यहां तक ​​कि मैं भी तुम्हारे साथ अच्छी तरह समय नहीं बिता सका। यदि तुम मुझे प्रश्न पूछोगी तो अच्छा लगेगा। ”
" नहीं, देर हो जाएगी, अल्बर्टो। "

" मैं तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ आऊँगा। मुझ पर तुम्हें क्या इतना विश्वास नहीं है?”
“ भरोसा है तभी तो मैं बिना किसी झिझक के तुम्हारे पास आई हूँ। ” हर्षा ने कहा।
“ ठीक है, तुम्हारे लिए पहला सवाल : तुम्हारा सपना क्या है, अल्बर्टों? "
“सपना?” उसने अपने नीचे वाले होठ को ऊपर वाले होठ से दबाया; उसके माथे पर एक शिकन दिखाई दे रही थी। “ अकेलेपन से मुक्ति”
हर्षा अल्बर्टो के इस उत्तर पर आश्चर्यचकित थी। क्या कोई इस तरह का जवाब देता है? अपने जीवन का सपना अकेलेपन से मुक्ति है? वह इतना अकेला क्यों है? उसके चारों ओर बहुत से लोग हैं, इतनी भीड़ हैं, फिर भी वह अकेला है?
"तुम्हें इतना अकेलापन क्यों लगता है, अल्बर्टो? क्या तुम साठवें दशक के अस्तित्ववाद से प्रभावित तो नहीं हो? "
“ नहीं, नहीं” अल्बर्टो ने कहा।

“ किसी से प्रभावित होने से अकेलापन क्यों महसूस होगा? अकेलापन फैशन नहीं है; न यह असंगत है। जो व्यक्ति किसी लक्ष्य को पाने के लिए दौड़ता है, वह अकेला हो जाता है। तुम गौतम बुद्ध या आइंस्टीन का उदाहरण देखो, सभी किसी समय अकेलेपन का शिकार हुए थे। "
“ तब तुम तो महान संत हो ?” हर्षा ने पूछा।
" नहीं, हाना, मैं एक संत नहीं हूँ। तुम्हारे महात्मा गांधी भी एक दिन अकेले थे। याद करो, जब अंग्रेज़ भारत छोड़कर जा रहे थे, तो भारत का पहला प्रधानमंत्री कौन बनेगा, विषय पर विवाद चल रहा था? : जिन्ना या नेहरू? गांधी भूख हड़ताल पर बैठे थे, कोई भी उन्हें समझ नहीं सकता था। क्या कम बड़ा अकेलापन नहीं था!"“ तुम्हारे पास अकेलेपन से मुक्त होने का कोई रास्ता तो होगा ?" हर्षा  ने पूछा।
"मैं ईश्वर के साथ एक होना चाहता हूं। मुझे मोक्ष चाहिए। अब यह तुम्हारी बारी है, हाना, तुम मुझे बताओ, तुम्हारा सपना क्या है? "

"मुझे सपने देखने में बहुत डर लगता है। आंखें बंद होने पर मुझे अंधेरा नजर आता है। क्या मैं कभी सपने देख पाई हूँ? हमेशा ही बुरे सपने। बुरे सपनों से मुझे कोई राहत नहीं मिली। मैं अपने अतीत को भूलना चाहती हूं।  तुम इसे मेरा सपना मान सकते हो। "
"तुम इतनी उदास क्यों हो, हाना? इस दुनिया में किसे कोई दुख नहीं है? इसके बावजूद क्या जीवन किसी एक बिंदु पर रुक जाता है? कभी-कभी नकारात्मक दृष्टिकोण हानिकारक सिद्ध होता है, क्या तुम इसे नहीं जानती हो?  तुम्हारा अतीत क्या है? "
"छोड़ो अभी, कभी दूसरे दिन बात करेंगे। अब मुझे बताओ, तुम्हारी नजरों में एक महिला के आवश्यक गुण क्या है ? "
"दूसरों को अच्छी तरह से समझने का गुण और प्यार देने में कंजूसी न करने का गुण। "
"अँग्रेजी में जिसे तुम ‘सेंस’ एंड ‘सेन्सुअलिटी’ कह सकते हैं। " अल्बर्टो के हाथ को दबाते हुए वह हँसने लगी।
"एक असामान्य बयान! एक संन्यासी के मुंह से 'प्रेमालाप' शब्द ?

"आह, तुम्हें क्या लगता है कि  महिला भोलीभाली होने से ही मुझे पसंद आएगी ? क्या यह सही नहीं है कि एक नारी में प्रेमिका का हृदय होना चाहिए? अब तुम्हारी बारी है, हाना, तुम बताओ, नारी कैसी होनी चाहिए? "
"कभी-कभी मैं क्या सोचती हूँ जानते हो, अल्बर्टों? मुझे लगता है नारी जैसी भी हो, उसके होने या न होने, उसके अच्छे गुण या बुरे गुण- ये सब अर्थहीन हैं। ज्यादातर लोगों के पास ये सब देखने का समय नहीं है। वे इतना पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं कि वे उसे नरक का द्वार, ईर्ष्यालु और बच्चा पैदा करने वाली मशीन मानते हैं। पुरुष भी ईर्ष्यालु हो सकता है? क्या वह पतन के रास्ते में नहीं जाता है ? क्या केवल नारी को प्यार देना चाहिए, पुरुष को नहीं? छोड़ो, मैं ये सारी बातें तुम्हें क्यों कह रही हूं? नारी को हमेशा मृदुभाषी और दृढ़ होना चाहिए। मुझे बताओ, प्यार के बारे में तुम क्या सोचते हो ?  देखते है संन्यासी के लिए प्रेम का क्या अर्थ है? "
" क्यों मुझे संन्यासी कह रही हो ? मैं संन्यासी नहीं हूं, हाना। मैं क्रिस्टीना को बहुत प्यार करता हूँ। क्या तुम  नहीं जानती हो कि तुम्हारे लिए भी मेरा प्यार असीम है? What is though lovestwell remainsthe rest is trash.' 'कहकर चुपचाप हर्षा की ओर देखने लगा अल्बर्टों।

हर्षा ने सोचा कि इस आदमी को मेरे प्रेम-निवेदन की कला मालूम नहीं है, मगर वह हर्षा  से बहुत प्यार करता है। तब फिर उसने यह नहीं कहा होता कि वह क्रिस्टीना से बहुत प्यार करता है और तुमसे भी। उसने स्पष्टवादी अल्बर्टों की तरफ देखा; नहीं, वह झूठ नहीं बोल रहा था। नहीं, वह ढोंगी नहीं है। मन-ही-मन हर्षा उसे मूर्ख कह रही थी, वह इसे और अधिक अच्छे ढंग से नहीं कहसकता था?

हर्षा ने कहा, "दुनिया में सबसे सुंदर चीज प्यार है। मुझे नहीं पता कि तुम्हारे जैसे दार्शनिक क्यों इसे  माया कहते हैं? "" तुम शंकराचार्य की बात कर रही हो ? नहीं, हर्षा, मेरा प्यार कोई माया नहीं है। तुम ऐसा क्यों सोचती हो?"" मैं बहुत खुश हूँ कि तुम इस समय दार्शनिक की तरह बात नहीं कर रहे हो। वरना, मैं निराश हो जाती। "हर्षा अपने चौथे प्रश्न को बदलना चाहती थी। उसका चौथा सवाल था, "तुम किस काम के लिए खुद को दोषी मानते हो?"  वह इस प्रश्न को थोड़ी देर बाद पूछने का सोच रही थी। अल्बर्टो के मन की बात जानने के लिए वह उस पल ऐसा प्रश्न पूछना चाहती थी, जिससे उसके अंदर छिपी हुई भावना प्रकट हो। “ परकीया प्रेम के बारे तुम्हारे क्या विचार है, अल्बर्टों ?"<“ अगर किसी को कोई क्षति नहीं होती है तो असुविधा क्या है ?”इस बौद्ध की इस राय पर हर्षा को आश्चर्य हुआ। उसकी धारणा थी कि अल्बर्टो इसे अन्यायपूर्ण और पाप मानेगा। मगर अल्बर्टो के अंदर से कोई प्रेमी बोल रहा था।

"मैं एक और सवाल पूछूंगी, जो थोड़ा व्यक्तिगत हो सकता है, मुझे डर है कि कहीं तुम मुझे गलत न समझ लो। "
"हाना, तुम हमारे खेल के नियम भूल रही हो, पहले हम दोनों एक ही सवाल का जवाब देंगे, मगर तुमने पिछले प्रश्न का उत्तर नहीं दिया। "
"हाँ, मैं भूल गई थी। तुम तो जानते हो कि मैं प्यार को कितना महत्त्व देती हूं, इसलिए समाजिक बाधा-बंधन मेरे लिए अर्थहीन हैं। लेकिन अल्बर्टो, मुझमें सामाजिक आचार-संहिता का उल्लंघन करने की हिम्मत नहीं है। मैं रक्षणशील परिवार में पैदा हुई। मेरे पिता हाई स्कूल के हेडमास्टर थे, वह थोड़ा उदारवादी थे। लेकिन मेरे दादा पूरी तरह से अलग, कठोर और रूढ़िवादी थे। वह पुरी के जगन्नाथ मंदिर के मुक्तिमंडप के पंडित थे। उन्होंने वेद-वेदांतों का काफी अध्ययन किया था; लेकिन उन्हें अपने एक कुलीन ब्राह्मण होने का कम गर्व नहीं था। मैंने उन्हें साष्टांग दंडवत तीर्थयात्रियों के सिर पर अपने पैरों से विष्णु-मुद्रा में आशीर्वाद देते हुए देखा हैं। पाप-पुण्य का हिसाब मानो उनकी उंगलियों पर हो। जानते हो, मेरी बुआ की आठ साल की उम्र में शादी हुई थी, पैतालीस वर्ष के पंडित के साथ। दुर्भाग्यवश, यौवन प्राप्त करते-करते वह विधवा बन गई। सारे कठोर अनुष्ठानों, व्रत-उपवास का पालन करते हुए उन्हें वैधव्य-जीवन बिताना पड़ा। जब मेरे सनातन मामा आते थे तो बुआ को अच्छा लगता था। जिस दिन वे चले जाते थे, मैं बुआ की आँखों में आँसू देखती थी। मैंने आज तक यह बात किसी से नहीं कही। चाहे आप स्पर्श करें या न करें, व्यक्त करें या न करें, प्रेम वायवीय रूप से जोड़ सकता है। मेरी बुआ की तुलना में मैं अधिक स्वतंत्र हूँ , लेकिन हिम्मत ? "

"तुम तो एक निजी सवाल पूछना चाहती थी, हाना, पूछो। "
"नहीं, रहने दो। , " हर्षा ने कहा।
"मैं तुम्हारे सारे सवालों का जवाब देने के लिए तैयार हूं, बिना किसी झिझक के पूछ सकती हो। "
हर्षा पहले असमंजस में पड़ गई कि कैसे प्रश्न पूछा जाए।
"मैंने सुना है कि पश्चिमी देशों में तुम्हारे जीवन में कोई सेक्स-प्रतिबंध नहीं है, मतलब तुम लोग अपनी पत्नी के अतिरिक्त भी...। "

"हे, हाना, इतनी झिझक? तुम सीधे क्यों नहीं पूछती? मैंने शुरु से कह चुका हूँ, मैं अपने जीवन की सारी बातें बताऊंगा, उसका कोई मतलब नहीं है। मगर मैं तुमसे कभी झूठ नहीं बोलूँगा। जब मैं कॉलेज में था, मेरा दो सहेलियों के साथ शारीरिक संबंध थे, लेकिन मेरी शादी के बाद अब ऐसे कोई संबंध नहीं है। मेरे लिए बिना प्यार के शारीरिक संबंध असंभव है। तुम्हें यह जानकर हैरानी होगी कि मैं कभी वेश्यालय नहीं गया हूं। "
हर्षा ने कहा, "तुम तो बहुत अच्छी तरह से जानते हो कि मैं कैसे परिवार से आई हूं। तुम मेरी स्थिति की कल्पना कर सकते हो। मैं तुम्हारे प्रश्न का उत्तर कैसे दे सकती हूं? आज यहां तक ही, बाकी प्रश्न और किसी दिन पूछूंगी। "
अल्बर्टो उठ खड़ा हुआ। "जब मैं बारह साल का था, तब स्कूल में यौन-शिक्षा दी जाती थी। इस तरह की शिक्षा भारत में भी दी जानी चाहिए। "

हर्ष हँसने लगी। "क्या तुम पागल हो गए हो? तुम्हारे वहाँ यौन-शिक्षा दिया जाने से क्या अच्छा हुआ है? अभी भी समलैंगिकता, समलैंगिक-विवाह तुम्हारे देशों में अधिक है। खैर छोड़ो, यूरोपीयन लोगों की और बात नहीं करूंगी। "
" देन व्हाट्स द रोंग? मुझे समलैंगिकता में कुछ खराबी नहीं लगती। "
"प्लीज बंद करो। आज और नहीं। और कभी इस विषय पर चर्चा करेंगे " अल्बर्टो ने अचरज से उसे देखा। फिर वह कहने लगा, "चलो, मैं तुम्हें छोड़ आता हूँ। "
"मैं चली जाउंगी। ज्यादा देर नहीं हुई है। तुम चिंता मत करो। मैं जा रही हूँ। "
अल्बर्टो ने हर्षा को उसे लेडी ऑफ फातिमा की कहानी सुनाने के लिए बुलाया। तेरह अक्टूबर, रविवार का दिन था। नवीना पारेख नवरात्रि-उत्सव के लिए अहमदाबाद चली गई थी। भैरवी चक्रवर्ती 'षष्ठी' पर अपना सूटकेस लेकर कलकत्ता चली गई। घर पर हर्षा को बोर लग रहा था। अल्बर्टो का फोन आया, ' क्या कर रही हो, हाना? मैं तुम्हारे लिए एक अच्छी फिल्म लाया हूँ। क्या तुम आ सकती हो? हम एक साथ फिल्म देखेंगे। रविवार अच्छे ढंग से कट जाएगा। इसके अलावा, आज मेरे लिए एक स्पेशियल दिन है। यह मेरे देश के लिए विशेष दिन है। आज का दिन निश्चित रूप से मेरे देश में मनाया जाता है। "

"स्पेशियल दिन किस खुशी में है, अल्बर्टो? क्या तुम्हारा कोई त्योहार है?”
“ आज फातिमा-दिवस है। लेकिन तुम क्या फोन पर सब-कुछ जानना चाहती हो? तुम आओ, मैं तुम्हें उसकी कहानी सुनाऊँगा। "
हर्ष का मानना ​​था कि इन विदेशियों के आम तौर पर अधिक त्योहार नहीं है, इसलिए वे फादर डे, मदर डे, वेलेंटाइन डे आदि जैसे दिनों के नाम से त्योहार मनाते है। फातिमा कौन है? जिसके नाम पर ‘डे’ मनाया जाता है?
इस बार वह दुर्गा पूजा पर घर नहीं गई। उसकी माँ बार-बार फोन पर उससे पूछ रही थी: "कुनी, तुम नहीं आओगी तो मैं अकेले पूजा देखने कैसे जाऊँगी? क्या तुम मेरी गठिया की बीमारी के बारे में नहीं जानती हो? मैं न तो बैठ सकती हूं और न ही झुक सकती हूं,। तुम्हारे पिता नौ दिनों तक निष्ठा से पूजा करते हैं। तुम्हारी बुआ को आँखों से दिखता नहीं है। "

हर्षा के सामने मां ने जितना संभव था, उतनी अपनी असहायता को प्रकट किया।
हर्षा को बहुत अच्छी तरह से पता है कि मां आजकल जोड़ों के दर्द के कारण उठ-बैठ नहीं पा रही है। वह जानती है कि उसका भाई विदेश में है। वह कैलिफ़ोर्निया से तुरंत यहाँ उड़ कर नहीं आ सकता। उसकी बुआ भी काम की नहीं रही; मगर हर्षा चाहती तो आसानी से अपनी मां की सहायता कर सकती थी। वह वास्तव में अपनी मां, पिता, अपने आप पर और भगवान पर रुष्ट थी। वह केवल गुस्से के कारण जगन्नाथ मंदिर में भी नहीं जाती थी। आजकल उसने उपवास-व्रत करना छोड़ दिया है। सभी से उसका विश्वास उठ गया है। उसे अपने लोग भी अजनबी लगने लगे हैं। उसे अपने माता-पिता पर भी भरोसा नहीं रहा। पता नहीं क्यों, उसे ऐसा लग रहा है कि उसके खिलाफ कोई साजिश चल रही है। उसे संदेह हो रहा है कि उसकी मां के फोन के पीछे भी कुछ गुप्त मकसद हो सकता है। उसके मन में हर मनुष्य के प्रति अविश्वास पैदा हो गया है, फिर भी पता नहीं किस फांक से अल्बर्टो उसके जीवन में घुस गया था।

छोटे बच्चे के रोने पर लॉलीपॉप खिलाने की तरह पिता ने शायद उसे दिल्ली भेज दिया था। वे सोच रहे थे कि जब वह दो साल में अपनी पढ़ाई पूरी कर लेगी, तब तक उसका मन बदल जाएगा। कोई भी उसकी पीड़ा नहीं समझ पा रहा था? यही कारण है कि हर्षा नाराज होकर खुद उन लोगों से दूर चली गई। इस दौरान माँ ने चार- पांच बार फोन किया था। हर्षा कभी पढ़ाई का बहाना कर, कभी चुप रहकर और कभी विरोधकर उनसे दूरी बनाए रखती थी। वह मुक्ति चाहती थी, दर्द से मुक्ति। उसने हर एक को मनाने के लिए अपनी पूरी कोशिश की थी, लेकिन कोई उसे समझ नहीं पाया। किसी के पास उसकी आर्तनाद नहीं पहुंची।

अल्बर्टो ने सब-कुछ भूला दिया था उसे। कम से कम बुरे सपने की तरह पुराने दिन उसके अस्तित्व को मिटाने के लिए उद्यत नहीं होते थे। जीवन उस पर और अधिक बोझ नहीं डाल रहा था। पता नहीं क्यों, उस समय उसे अल्बर्टो बहुत करीब और अंतरंग लग रहा था। अल्बर्टो का विचारशील चेहरा और मुस्कुराहट क्लोज-अप बनकर उसकी आंखों के सामने तैरने लगा। उनका पसंदीदा रंग नीला था। हर्षा ने एक नीले रंग की राजस्थानी कढ़ाई वाली पोशाक पहन ली थी। लंबे समय से उसने चेहरे पर पाउडर नहीं लगाया था, अब उसने लगाना चालू किया था। उसने कभी लिपस्टिक का इस्तेमाल नहीं किया था, नवीना के अलमारी से निकालकर इसे भी लगा दिया हल्का-हल्का। उसका यह रूप देखकर उसकी दोनों सहेलियाँ पता नहीं क्या टिप्पणी करती? चिढ़ाने लगती ? तुम इतनी सज-धज किसके लिए रही हो ? कहीं तुम उस गोरे के प्यार के चक्कर में तो नहीं पड़ गई हो ? वास्तव में इसलिए तुम इस बार घर नहीं गई ? "

हर्षा उन्हें कैसे समझाती? पुरी नहीं जाने के क्या कारण हो सकते है? अचानक वह उदास हो गई। दर्पण में उसका चेहरा ऐसा दिख रहा था मानो किसी कब्र पर फूलों का गुलदस्ता रखा हो।अल्बर्टो उसकी प्रतीक्षा में होगा। उसे जाना चाहिए। लेकिन इस पोशाक में? वह क्या सोचेंगा?  कहीं यह  नहीं सोचेगा  कि खास तैयारी के साथ वह क्यों आई है? नहीं, वह उसके सामने अपनी दुर्बलता का पर्दाफाश नहीं करेगी। बाथरूम में जाकर हर्षा ने अपने चेहरे को साफ धोया। उसके बाद पता नहीं क्यों उसे सहज लगने लगा। पड़ोसी घर की छोटी लड़की उसे अपने घर में पूजा के लिए आमंत्रित करने आई थीं। इसलिए हर्षा कमरे में ताला लगाकर बाहर आ गई। उसे याद आने लगा कि इन दिनों उसके घर में कितने उत्सव मनाए जाते थे। दो चाचा घर आते थे। दादाजी  नौ दिन उपवास करते थे। भले ही वे वैष्णव थे, मगर शक्ति  की पूजा उनके घर में लंबे समय से चलती आ रही थी। फालाहर और दूध को छोड़कर  उसके दादाजी इन नौ दिनों में कुछ भी नहीं छूते थे। मगर उनके घर में खिचड़ी और पीठा बनते थे। दादाजी कहते थे, जगतधात्री माँ परम वैष्णवी है। कन्या-रूप में उसकी पूजा की जानी चाहिए। यही कारण है कि शायद मेरी सबसे बड़ी बुआ की पूरी जिंदगी ‘कन्या-रूप’ में बीत गई। कन्या नहीं है, तो और क्या है? आठ साल की उम्र में उनका बाल-विवाह हुआ था।
जब वह रजस्वला हुई तो उसके ससुराल वाले उसे एक नई दुल्हन के रूप में पारंपरिक उपहारों के साथ ससुराल ले जाने की जिद्द करने लगे। दादाजी जिस बैलगाड़ी में वीर पुरुषोत्तमपुर गए थे, उसी शाम उसी गाड़ी में बुआ को ले आए थे। नहीं, बुआ की सुहाग रात भी नहीं हुई थी। दादाजी ने कहा कि उसकी सबसे बड़ी बुआ एक परम वैष्णवी है। कोई भी पुरुष उसे स्पर्श नहीं करेगा। कन्यादान नहीं करने के पाप से बचने के लिए उसकी कहीं शादी करा दी गई थी। दादाजी को तर्क में हराने वाले उस समय बहुत कम लोग थे। वे ग्रंथों और पुराणों से उदाहरणों का हवाला देते हुए सभी को परास्त कर देते थे। उसी दादाजी की इच्छा के कारण उसका जीवन बदल गया था। उस समय वह लगभग बीस या उससे थोड़ी अधिक होगी, उसके विवाह का निर्णय लिया गया था। जब कोई बुआ की पीड़ा को नहीं समझ पाया तो  उसकी पीड़ा समझने के लिए किसी से क्या उम्मीद की जा सकती थी ? हर्ष ने याद आ गया- दक्षिण दिशा में खुली खिड़की, वह खिड़की जो कभी बंद नहीं हुई थी। वह खिड़की फोटो-फ्रेम की तरह उसका क्लोज-अप बांधकर रखती थी। कभी-कभी प्रतीक्षा करते-करते सुबह की ठंडी हवा में उसकी आँख मूँद जाती थी और उस झरोखे के पास अनिद्रा से उठकर उसने कई रातें गुजारी थीं। वह मिट्टी के गीले लोथड़े की तरह खिड़की के रेलिंग के पास ढुलक जाती थी। 

कभी वह आदमी सुबह-सुबह लौट आता था, कभी आधी रात को। कभी वह पूरी रात पैर पसारे फाटक के पास पड़ा रहता था, जबकि दक्षिण दिशा की खिड़की के पास प्रतीक्षारत हर्षा कुछ भी समझ नहीं पाती थी।
जब हर्षा अल्बर्टो के घर पहुंची तो वह अपने लैपटॉप पर टाइपिंग कर रहा था। हर्षा को देखकर कहने लगा, "तुमने बहुत देर कर दी, हाना। आज मैंने तुम्हारे लिए विशेष भोजन बनाकर रखा है। "
"इसका मतलब आज अच्छा खाना मिलेगा। "

लैपटॉप से अपना चेहरा ऊपर ​​उठाकर उसने कहा, "वाह, वाह, यू आर लुकिंग ब्युटीफूल। " हर्षा चौंक गई थी। क्या उसके होंठों पर लिपस्टिक अभी भी लगा हुआ है ? पता नहीं क्यों उसने इसका उपयोग किया, वह थोड़ी शर्मा गई। अल्बर्टो ने उसे बताया कि नीला उसका पसंदीदा रंग है। वह कहने लगा, "तुम इस नीले रंग की पोशाक में बहुत आकर्षक दिख रही हो, लेकिन मुझे लग रहा है कि तुम मानसिक रूप से परेशान हो। क्या कोई दिक्कत है? "
"नहीं" हर्षा ने जवाब दिया।
"लेकिन ऐसा लग रहा है मानो बादलों की ओट में चाँद छुप गया हो। "

(क्रमशः अगले भागों में जारी...)

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