विषादेश्वरी भाग 2 // उड़िया उपन्यास // सरोजिनी साहू // अनुवादक - दिनेश कुमार माली


भाग 1 
"अरे क्या हुआ ? दीर्घश्वास क्यों ? " हर्षा ने पूछा।
"नहीं, नहीं, कुछ भी नहीं। " चेहरे पर मुस्कुराहट लाते हुए अल्बर्टो ने कहा, "तुमने बताया नहीं कि किस परिस्थिति में तुम्हें शर्म आती है ?"
"अरे, मैं तो लड़की हूँ, हर चीज में मुझे शर्म लगती है। अगर कोई मेरी तरफ लगातार देखता है तो मुझे लाज आती है। कोई मेरी तरफ इशारें करता है, तो शर्म आती है। लेकिन क्या आप जानते हो मुझे किस चीज पर सबसे ज्यादा शर्म आती है ? क्रोध से ?अगर कभी आपे से बाहर होकर मैं कुछ अंट-शंट बोलती हूं, तो अगले ही पल में मैं खुद को संकुचित और लज्जित अनुभव करने लगती हूं। "
"वंडरफूल!, " अल्बर्टो ने कहा "क्या मैं आज का अंतिम सवाल पूछ सकता हूं, हाना?"
"ओह, बच गई !"
"क्या मैं तुम्हें परेशान कर रहा हूं? मेरी धारणा यह है कि तुम प्रश्नोत्तरी खेल का आनंद ले रही हो। आनंद लेने के अतिरिक्त, हमें एक-दूसरे को जानने का मौका मिल रहा है। "
"ठीक है, पूछो, पूछो, जो भी तुम्हें पसंद हो। मैंने तुम्हें चिढ़ाने के लिए नहीं कहा था। वैसे भी इस खेल के माध्यम से बहुत कुछ तुम्हारे बारे में जान चुकी हूँ। "
हर्षा की यह बात सुनकर अल्बर्टो बहुत उत्साहित हो गया था। कहने लगा, "हाना, तुम अपने को शिव-भक्त या शैव क्यों मानती हो?"
"तुम बताओ, तुम बौद्ध क्यों हो?"
"क्योंकि मैं मोक्ष चाहता हूं। प्रेम और ध्यान के मार्ग से मैं अंतिम लक्ष्य तक पहुंचना चाहता हूं, जिसे तुम्हारे यहाँ 'मोक्ष' कहते हैं। "
"ओह, मेरे गोरे 'संन्यासी'?"
"क्या तुम मुझे चिढ़ा रही हो? क्या कहा, फिर कहो तो। मैं तुम्हारी भाषा समझ नहीं पाया। "
"मैंने तुम्हें ‘व्हाइट मांक’ कहा, नहीं, नहीं, मैंने तुम्हें 'संन्यासी' कहा था। मैंने तुम्हें चिढ़ाया नहीं। "
अल्बर्टो उत्तर से संतुष्ट नहीं था। शायद कभी-कभी जब आप भाषा नहीं समझते हो, तो चेहरे की भाव-भंगिमा यह बता देती है कि कोई तारीफ कर रहा है या व्यंग्य। अल्बर्टो के चेहरे से पता चल रहा था कि वह खुश नहीं था। फिर भी कहने लगा: "हाना, अब तुम्हारी बारी है, बताओ तुम शैव क्यों हो?"
"पता नहीं क्यों, मेरा विश्वास है कि शिव निरासक्त, निर्विकार पुरुष है। एक योगी की तरह। जानते हो, अल्बर्टो, हमारे हिंदू-शास्त्रों में भगवान शिव को बोहेमियान के रूप में दर्शाया गया है, भले ही, वह सांसारिक है और उनके बाल-बच्चे हैं। "
अल्बर्टो खिलखिलाकर हंसने लगा, “वास्तव में तुमने बड़ी कौतूहल भरी बात कही। भारत में ' एंथ्रोपोमोर्फिक ' में बहुत विश्वास है.”
"एंथ्रोपोमोर्फिक? यह क्या है ?"
"ईश्वर की मनुष्य के रूप में कल्पना कर उसके मानवीय रूपों और गुणों में सजाना। खैर, छोड़ो यह बात! विश्वास बहुत बड़ी चीज है। तुम शिव में क्यों विश्वास करती हो, यह मुझे बताओ। "
"शिव के पास कोई घर नहीं है। कभी-कभी वह हिमालय के बर्फ से ढके पहाड़ों पर बैठते हैं, तो कभी-कभी श्मशान में रहते हैं। कपड़े कहने से केवल बाघ की खाल पहनना है। गहनों के बदले गर्दन में साँप। प्राय: ध्यान-मग्न रहते है। अनेक लोग उन्हें दयालु भगवान मानते हैं। जो कोई चीज उनसे मांगता है, तो वे उसे तुरंत वरदान दे देते है। उनकी एक खूबसूरत कहानी सुनाऊँगी, जिससे तुम उनके निर्विकार गुणों के बारे में समझ सको। " प्रवचन देने की भांति हर्षा ने भावुकता से भगवान शिव के गुणों के बारे में बोलना शुरू किया।
"वास्तव में ? फिर मुझे वह कहानी सुनाओ। " अल्बर्टो एक छोटे बच्चे की तरह कहानी सुनने के लिए जिद्द करने लगा।
"भारत के वेद-पुराणों के बारे में तुम बहुत कुछ जानते हो, यह कहानी भी पहले से सुनी होगी?"
"कौनसी कहानी, मुझे बताओ ?"
"समुद्र-मंथन की। "
"समुद्र-मंथन? वह क्या है ? क्या यह महाभारत की कहानी है? यदि हां, तो मैं इसे नहीं जानता हूं? "
"नहीं, यह कहानी भागवत की है। देवताओं और राक्षसों के बीच लड़ाई की सबसे दिलचस्प कहानी है। "
"तब सुनाओ, हाना। "
अल्बर्टो के साथ मुलाक़ात करने के दिन से हर्षा बहुत अच्छी तरह जान चुकी थी कि पुराणों की कहानियों, आख्यान-उपाख्यानों को सुनने में उसकी बहुत रुचि है। कहानियों को सुनते समय वह एक छोटा बच्चा बन जाता था, लेकिन दार्शनिक बात आने पर तर्क करने के लिए तैयार हो जाता था। कहने लगता था कि वह तर्क के बिना कुछ भी स्वीकार नहीं कर सकता। हर्षा का लगता था कि दर्शन के क्षेत्र में वह थोड़ा अहंकारी है।
“चलिए घूमकर आते हैं, एक जगह पर बैठे-बैठे अच्छा नहीं लग रहा है। टहलते-टहलते मैं तुम्हें पूरी कहानी सुना दूँगी। क्या दुर्वासा का नाम सुना है, अल्बर्टों? "
"वह ऋषि जो अपने क्रोध के लिए विख्यात थे ?"
"हाँ, सही कह रहे हो। एक बार उनकी स्वर्ग के राजा इंद्र से रास्ते में मुलाक़ात हुई। उन्होंने इंद्र को फूलों की माला दी। इंद्र ने उस माला को अपने हाथी के गले में डाल दिया। हाथी ने अपनी सूँड से उस माला को बहुत दूर फेंक दिया। यह देखकर दुर्वासा ने क्रोधित होकर उसे अभिशाप दिया, ' तुम्हारा इतना घमंड कि तुमने मेरे द्वारा दिए गए हार की अवमानना की ? मैं तुम्हें अभिशाप देता हूँ कि तुम्हारे अहंकार का प्रतिफल तुम्हें वहुत जल्दी ही मिलेगा। राक्षसों के साथ तुम्हारा घोर युद्ध होगा।
और सच में राक्षस देवताओं के खिलाफ भंयकर युद्ध की तैयारी करने लगे। इंद्र का सिंहासन हिलने लगा। उनके बीच एक घोर लड़ाई हुई। देवतागण राक्षसों का सामना करने में सक्षम नहीं थे। दूसरी ओर, राक्षसों की नृशंस गतिविधियों से स्वर्ग पूरी तरह से तबाह हो गया। भयभीत देवता मदद के लिए भगवान विष्णु के शरण में गए। तब तक कई देवता मारे जा चुके थे। भगवान विष्णु ने सुझाव दिया कि युद्ध जीतने के लिए अमृतपान कर देवताओं को अमर होना चाहिए। अन्यथा थोड़े ही समय में राक्षसों का स्वर्ग पर अधिकार होगा। लेकिन अमृत मिलेगा पाताल में, समुद्र में। उन्होंने देवताओं से राक्षसों के पास जाकर अमृत-प्रलोभन हेतु समुद्र-मंथन के बारे में प्रस्ताव रखने के लिए सुझाव दिया। इंद्र ने राक्षसों को अमृत का लालच देकर उन्हें समुद्र-मंथन करने में सहयोग करने के लिए राजी किया। राक्षस अमर होने की आशा में इंद्र के प्रस्ताव में सहमत हुए। राक्षस वैसे भी बहुत शक्तिशाली और धन-संपत्ति में समृद्ध थे। उनके पास केवल एक चीज का अभाव था तो वह थी चिरकाल की शक्ति। क्षीर-सागर मंथन के लिए तय किया गया और मंदार पर्वत को मथनी के रूप में। भगवान विष्णु कछुआ बनकर खुद समुद्र में छुप गए। उनके ऊपर मथनी के रूप में मंदार पर्वत रखा गया। वासुकी नाग को रस्सी की तरह मंदार पर्वत पर लपेटा गया। एक तरफ देवताओं और दूसरे पर से राक्षसों द्वारा मंथन किया जाना था, देवता 'वासुकी' की पूंछ की तरफ और राक्षस उसके मुंह की तरफ गए। दोनों ने मंथन की प्रक्रिया शुरू की। समुद्र से अमृत के स्थान पर जहर बाहर निकला, कोई भी इसे छूना नहीं चाहता था। अमरत्व की बजाय मृत्यु कौन चाहता है? भगवान शिव निर्विकार पुरुष थे। उन्होने देखा कि अगर इस जहर का पान नहीं किया गया तो पूरी दुनिया नष्ट हो जाएगी। बिना कुछ विचार किए उन्होंने सारा जहर पी लिया, इस वजह सेउनका कंठ नीला हो गया। "
“ वाह! बहुत सुंदर कहानी सुनाई, हाना” अल्बर्टों ने कहा।
"लगभग 70 प्रतिशत भारतीय लोग इस कहानी को जानते हैं। उसके बाद समुद्र से निकली कामधेनु, उच्चैश्रवा अश्व, ऐरावत हस्ती, कौस्तुभ मणि और फिर कल्पवृक्ष। क्या आप जानते हो कल्पवृक्ष क्या है? कल्पवृक्ष के पास जो भी इच्छा करोगे, वह आपको मिलेगा। फिर समुद्र से देवी लक्ष्मी बाहर आई। भगवान विष्णु ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। समुद्र से अप्सराएँ बाहर आईं। "
"तुम्हारी तरह", अल्बर्टो ने मुस्कुराते हुए कहा।
"तो मैं कहानी सुनाना बंद करती हूँ। "
"अरे गुस्सा क्यों करती हो? तुम समुद्र-तट की लड़की हो इसलिए पूछ लिया। "
"शरारत बंद करो, ऊपर से साधारण कहानी या फेंटेंसी लगने वाली कहानी से मैं अमृत कैसे निकालूँगी?"
"ऐसा है क्या? तो देर क्यों ? "
"अप्सराओं के बाद बाहर निकली शराब। अंत में धन्वन्तरी निकले अमृत-पात्र साथ लेकर। देवताओं ने शुरु से ही राक्षसों के साथ छल-कपट आरंभ किया। वे बहुत अच्छी तरह से जानते थे कि अगर अमृत राक्षसों के हाथों में लग गया, तो उनकी योजना कभी सफल नहीं होगी। इसलिए उन्होंने अमृत-पात्र को राक्षसों से दूर रखा, कभी स्वर्ग में, कभी धरती पर और कभी पाताल में। कहीं राक्षसों को पता न चल जाए। लेकिन इस चीज को लंबे समय तक छिपाया नहीं जा सका। भगवान विष्णु जानते थे कि अमृत के लिए देवताओं और राक्षसों के बीच युद्ध अवश्य होगा, इसलिए वह अमृत-पात्र के साथ मोहिनी रूप में उपस्थित हुए। उन्होंने अमृत पान के लिए दोनों देवताओं और राक्षसों को अलग-अलग पंक्तियों में बैठने के लिए कहा। लेकिन मोहिनी की कटाक्ष और मनोरम मुस्कान देखकर राक्षस मोहित हो गए। वे अमृत के बजाय मोहिनी हासिल करने में अधिक रुचि दिखाने लगे। यह अवसर देखकर भगवान विष्णु 'मोहिनी' के भेष में देवताओं को अमृत देने लगे।
"अद्भुत, बहुत अच्छी कहानी सुनाई, हाना, ग्रीक महाकाव्यों में इस तरह की अनेक कहानियाँ हैं। "
"क्या तुम केवल कहानी सुनकर संतुष्ट होना चाहते हो या इसके अंतर्निहित सार को जानने में भी रुचि रखते हो?"
"बेशक, मैं इसके आंतरिक अर्थ को जानना चाहता हूं। "
"तो सुनो। देवता और राक्षस क्रमशः अच्छे और बुरे के प्रतीक हैं। साधक अच्छे और बुरे दोनों रास्तों से गुजरते हुए आगे बढ़ते हैं, जिसे आप दर्शन की भाषा में ज्ञान और अज्ञान कहते हैं। क्षीर-सागर मनुष्य का मन है और समुद्र की तरंगें मन की चेतना हैं। क्या आप जानते हैं कि मंदार पर्वत किसका प्रतीक है? 'मंदार' का मतलब एकाग्रता है। जिस तरह अपनी खोल के अंदर छिपकर कछुआ दुनिया से विच्छिन्न होता है, वैसे ही एक साधक को दुनियादारी से दूर रहना चाहिए। वासुकी नाग हमारी इच्छा है। इच्छाओं का अतिभोग करने से ज़हर निकलता है। मोहिनी एक अहंकारी आदमी के लगाव और आकांक्षाओं का प्रतीक है। फिर धनवंतरी किसका प्रतीक है? यह अमरत्व या मुक्ति की खोज है। "
"वंडरफूल, माय गर्ल, " कहते हुए अल्बर्टो ने हर्षा को कमर से पकड़कर उसके माथे को चूमा। "मुझे तुम पर गर्व है, हाना, तुम मेरे जीवन की सबसे अनमोल वस्तु हो, मुझसे वादा करो, तुम कभी भी मुझे छोड़कर नहीं जाओगी, हाना। "
उस समय हर्षा लज्जा से पानी-पानी हो गई। शर्म से उसकी नाक थरथरा रही थी। अल्बर्टो ने सार्वजनिक स्थान पर उसका चुंबन लिया था। लोग क्या सोच रहे होंगे, जिन्होंने यह दृश्य देखा होगा ! पता नहीं क्यों, उसकी आँखों में आँसू आ गए। छाती में वह उत्तेजना महसूस करने लगी। सिहरन से सारे रोम खड़े हो गए थे उसके। "यह तुम्हारा पुर्तगाल नहीं है। मेरी कमर से अपना हाथ बाहर निकालो, मैं बिल्कुल सहज महसूस नहीं कर रही हूं। "
कहते ही अल्बर्टो ने अपना हाथ उसकी कमर से बाहर निकाल दिया।
उसने आश्चर्य से पूछा "क्या मुझसे कुछ गलती हो गई ?"
हर्षा अभी भी अपनी कमर पर उसके हाथ का स्पर्श अनुभव कर रही थी। क्या अल्बर्टों उसकी बात से नाराज हो गया? क्या अपमानित अनुभव कर रहा है ? फिर वह चुप क्यों है ? उसका मन हो रहा था यह कहने के लिए कि वह भी अपने जीवन में उसके जैसा एक साथी चाहती थी। जिसे पाकर वह अपना खाना-पीना सब भूल जाती। भूल जाती, दिन-रात, शोक-दुख। नहीं, हर्षा अपने दिल की बात नहीं कह पाई। हडबड़ाकर उसने अल्बर्टो का हाथ पकड़कर कहा: "क्या अब हम घर चलें?" दोनों चुपचाप पार्क के गेट की तरफ़ चले गए।
2.
“क्या तुमने पीटरब्रुक का नाम सुना है, हाना?"
"कौन है यह ?"
"पीटरब्रुक का महाभारत पश्चिमी देशों में बहुत प्रसिद्ध है। "
" सही? क्या उन्होंने महाभारत को अंग्रेजी में लिखा है? "
"ओह, नहीं, नहीं, उन्होंने महाभारत पर एक फिल्म बनाई है। "
"मैंने बी॰आर॰चोपड़ा का महाभारत टी॰वी॰ पर देखा है। । "
"क्या तुम उस बी॰आर॰ के सोप ओपेरा की बात कर रही हो, जिसमें समय का पहिया घूमता है?"
"ठीक वही है, तो तुमने भी बी॰आर॰ का महाभारत देखा है, अल्बर्टो। "
"हाँ, मैंने देखा। फिर भी मुझे पीटरब्रुक के महाभारत की गुणवत्ता बेहतर लगती है। "
हर्षा ने आश्चर्य से कहा, " क्या मतलब ?" "क्या तुम्हें पता हैं कि बी॰आर॰का महाभारत हर रविवार को एक घंटे के लिए पूरे भारत के हृदय की धड़कन को रोक देता था? लोग अपने सारे काम-धाम छोड़कर टीवी के सामने बैठ जाते थे। "
" हो सकता है। लेकिन यह कोई तर्क नहीं है। जब तक तुम पीटरब्रुक की महाभारत नहीं देख लेती हो तब तक तुम इसे नहीं समझ पाओगी। ”
हर्षा को अल्बर्टो पर बहुत गुस्सा आ रहा था। देखो, इस आदमी का साहस देखो। उसका रुचिबोध? यह कैसे संभव है? एक विदेशी व्यक्ति भारतीय नाड़ी को पकड़ सकता है, जबकि वह भारतीय नहीं है। भारत में बच्चे-बच्चे को रामायण और महाभारत की कहानियों का पता है; एक अनपढ़ औरत भी एक घंटे या उससे ज्यादा समय तक महाभारत की बता सकती है। लेकिन अल्बर्टो उसे कह रहा है कि पीटरब्रुक का महाभारत बेहतर है?
नहीं, वह दो कारणों से अल्बर्टो के साथ बहस नहीं कर सकती। पहला कारण, उसने पीटरब्रुक का महाभारत नहीं देखी है और दूसरा कारण, महाभारत अल्बर्टो की कमजोरी है। वह महाभारत से बहुत प्रभावित था। जैसे एक बार उसने पूछा: " दुर्योधन की माता गांधारी, कृष्ण को ईमानदार और सत्यवादी नहीं मानती थी न ? गांधारी को कभी-कभी कृष्ण की भूमिका पर संदेह होता था। मैं ठीक कह रहा हूं, हाना ? और वह कभी कहता: कुंती और सूर्य के पुत्र कर्ण को अर्जुन का प्रतिद्वंद्वि क्यों बनाया? कृष्ण की सहायता और सलाह के कारण उसकी दुखद मौत हुई? उसका पूरा जीवन कटुता और आत्म-घृणा में क्यों बीता ? वह तो अपने जन्म के लिए ज़िम्मेदार नहीं था। क्या तुम्हें पता हैं, फ्रायड ने अपने अध्याय 'मूसा और एकेश्वरवाद' में कर्ण का उदाहरण दिया है?
हर्षा अल्बर्टो के ऐसे सभी सवालों का कैसे उत्तर दे पाती ? ये सवाल तो बचपन से उसके दिमाग में घूम रहे हैं। जीवन सभी दर्शन, पूर्वजन्म, परजन्म और कर्मफल के सिद्धांत इत्यादि को ध्यान में रखने पर भी उसे एक निर्धारित नियम नहीं मिला। आज तक कर्ण के लिए उसके मन में उनकी थोड़ी सहानुभूति है।
हर्षा ने कहा: "मैंने कहीं गांधारी के बारे में पढ़ा था। एक बार उसने कृष्ण से पूछा, 'हे अंतर्यामी!, हे परमपुरुष! क्या आप मुझे बता सकते हैं कि मेरे कौनसे पापों के कारण मैंने अपने सौ-पुत्रों को खो दिया हैं? क्या तुम जानते हो अल्बर्टो, कृष्ण ने क्या उत्तर दिया था? कृष्ण ने न्याय, परजन्म और कर्मफल की बात कही थी। उन्होंने कहा था, 'ऐसा नहीं है कि हम सदैव इस जन्म के कर्मफल भोगते हैं। हमारी आत्मा जन्म-जन्मों के पाप-पुण्य ढोती जाती है। माँ, आप अपने पूर्व जन्म के कर्मों के फल भोग रही हैं। ’ उन्होंने गांधारी को अपनी आँखें बंद कर अपने पूर्व जन्मों के बारे में जानने की सलाह दी। गांधारी को अपनी आँखें बंद करते ही अपने पूर्वजन्म दिखने लगे। लेकिन उसे यह महसूस नहीं हुआ कि उसने कहीं कुछ पाप किया है। जब उसने कृष्ण को यह बताया, तो कृष्ण ने फिर से एक बार आँखें बंद कर अपने पूर्व जन्म का अनुधान करने के लिए कहा। उसने देखा कि अपने पिछले छह जन्मों में उसने कोई पाप नहीं किया है। अंत में, वह अपने पिछले सातवें जन्म के दृश्य देखने लगी। उसने देखा कि वह चंचल लड़की बालिका के रूप में एक बार वह समुद्र तट पर भ्रमण कर रही थी तो वहाँ कछुए के अंडे देखकर उसकी उत्सुकता जागृत हो गई। उसने एक के बाद एक करते हुए सौ अंडे तोड़ दिए। निरीह कछुए के सौ अंडों को तोड़ने के खातिर उसे अपने सात जन्मों के बाद इस जन्म में बिना किसी पाप के सौ बेटों को खोना पड़ा। "
अल्बर्टो कहानी सुनकर कुछ समय के लिए चुप रहा। फिर उसने कहा:
"क्या यह विश्वसनीय है? सात जन्मों तक... ? "
“ अल्बर्टो, मुझे कुछ भी नहीं पता। मुझे तो यह भी पता नहीं कि मौत के बाद जीवन है या नहीं, यह भी पता नहीं कि क्या पाप-पुण्य वास्तव में मनुष्यों का पीछा करते हैं या नहीं? मैं ऐसे जटिल योग-वियोग के बारे में नहीं जानती। मुझे नहीं मालूम कि किसी विश्व नियंता ने अपने आश्रितों के लिए ये नियम बनाए है या सब-कुछ बिना किसी कार्य-कारण के घटित होता है? लेकिन मुझे लगता है कि मनुष्य को बिना अपनी गलती के अनेक आकस्मिकताओं का सामना करना पड़ता है। "
अल्बर्टो ने सिर हिलाकर कहा: " सही है। "
"क्या सही है ?"
"ओह, कुछ भी नहीं, मैं इन अनसुलझे प्रश्नों के बारे में सोच रहा था। "
उससे परिचित होने के कुछ ही दिनों के भीतर हर्षा को पता चला था कि अल्बर्टो का एक छद्म नाम है और उसने उस छद्म नाम से कुछ निबंध लिखे थे। वह विदेशी नाम नहीं था, वह नाम था युधिष्ठिर।
अल्बर्टो ने कहा: "युधिष्ठिर ने कभी भी झूठ नहीं बोला, हाना, मैं भी कभी तुमसे झूठ नहीं बोलूंगा। वे धर्म-पुत्र, धर्म-रक्षक थे; हालांकि मैं धर्म-पुत्र नहीं हूँ, मगर धर्म-रक्षक होने में कोई समस्या नहीं है। नहीं, नहीं, मैं कट्टरपंथी नहीं हूं। धर्म-रक्षक का गलत अर्थ मत लगाना। मैं सत्य-धर्म की बात करूंगा। "
हर्षा इस पागल युधिष्ठिर के मुंह की देखने लगी। क्या इस आदमी का कभी पूर्व जन्म भारत में हुआ था? अल्बर्टो ने उसे महाभारत के अध्याय 'स्वर्गारोहण' की कुछ घटनाओं को याद करने के लिए कहा। "सभी स्वर्ग पहुँचने से पहले एक के बाद एक गिर गए। मगर अकेले युधिष्ठिर अविचलित भाव से चल रहे थे। आखिर तक केवल एक कुत्ता उनके साथ था। युधिष्ठिर मायामुक्त थे। मोक्ष पाने व्यक्ति ही ऐसा हो सकता है। फिर वह अकेला यात्री थे। वह अपने आप के नहीं थे। सभी की उपस्थिति के बावजूद भी वह अकेले थे। यह एक अद्भुत उत्थान है। हिमालय केवल एक प्रतीक है। शिखर तक पहुंचने का मतलब है मोक्ष। मैं उस मुक्ति की तलाश में हूं, हाना, मैं मुक्ति चाहता हूं। "
उसकी दिन-प्रतिदिन ये बातें सुनते-सुनते हर्षा उसकी तरफ आकर्षित हो रही थी। महाभारत की कहानियां और उपाख्यान उसे कंठस्थ थीं। महाभारत का यह चरित्र प्राय इस महाकाव्य के दायरे में विचरण करता था।
पिछले तीन-चार महीनों से वे एक दूसरे से परिचित हुए थे। उनकी पहला परिचय नाटकीय तरीके से हुआ था। पुरी की निवासी होने के कारण हर्षा ने अपने बचपन से कई विदेशियों को देखा था। इसलिए वह विदेशियों के नाम और पते से बहुत परिचित थी। अल्बर्टो की व्यक्तिगत तौर पर मिलने से पहले उसने उसे लेंस में देखा था। पुरी के रथयात्रा पर अपना प्रोजेक्ट पेपर तैयार करने के लिए उसने कुछ तस्वीरें खींची थी। उस समय अल्बर्टो उसे अपने कैमरे के लेंस में दिखाई दिया था। उसने अनगिनत मनुष्यों की भीड़ के भगदड़ में से अल्बर्टो को बाहर लाकर खुले स्थान पर खड़ा किया था।
"अरे, क्या तुम्हें अपने जीवन की परवाह नहीं है? तुम वहाँ क्या कर रहे थे ? भीड़ का इतना बड़ा समुद्र तुम्हारी तरफ आ रहा था, तुम्हें पता नहीं चला ? "
जैसेकि कोई ध्यान की अवस्था में से अपनी प्रकृत अवस्था में लौट आता है, वैसे ही वह चौंककर कहने लगा : "धन्यवाद, बहुत-बहुत धन्यवाद आपको। मुझे खेद है कि मेरी वजह से तुम्हें कष्ट उठाना पड़ा। "
"ठीक, ठीक है, क्या तुमने भगवान जगन्नाथ के दर्शन कर लिए?” तब तक वे एक सुरक्षित स्थान पर आ गए थे।
"नहीं, मैंने उसे स्पष्ट रूप से दर्शन नहीं किए है, मगर मैं निश्चित रूप से दर्शन करना चाहता हूं। "
उस दिन बहुत मुश्किल से हर्षा ने बड़दांड के किनारे अपने सहेली के घर की छत पर जगह का इंतजाम किया था।
अगर हर्षा नहीं होती तो पता नहीं कितने डालर खर्च करने पड जाते अल्बर्टो को, फिर उसे भगवान जगन्नाथ के 'दर्शन हो पाते, इसमें संदेह था। रथ खींचते-खींचते अंधेरा हो गया था। तीर्थयात्रियों के समूह छत से नीचे उतर रहे थे।
सरिता हर्षा के कान के पास अपना मुंह लाकर फुसफुसाई, "यह गोरा कौन है? क्या दिल्ली से तुम्हारा परिचय हैं? "
"आह, तुम्हारा मतलब क्या है? इस आदमी को कुछ मिनट पहले तक जानती नहीं थी। जब मैं अपने प्रोजेक्ट पेपर की तैयारी के लिए कुछ तस्वीरें खींच रही थी, तो यह मूर्ख खचाखच भीड़ में चलते हुए रथों को देख रहा था। इतनी भीड़ में वह कुचल गया होता, अगर मैं उसे बाहर नहीं खींचती तो कल के समाचार पत्र में इसकी मृत्यु की खबर छपती। सच कह रही हूँ, मैं इसका नाम तक नहीं जानती। तुम्हारा घर छोड़ने के बाद हम अपने-अपने रास्ते चले जाएंगे। "
हर्षा ने उस दिन सरिता से कहा था कि हम अपने-अपने रास्ते चले जाएंगे, लेकिन क्या वह खुद अपने रास्ते जा पाई? उसके लिए अल्बर्टो की उपस्थिति अचानक और अप्रत्याशित थी जैसे कि किसी के जीवन में आकस्मिकताएँ और दुर्घटनाएं होती हैं।
"क्या आप ब्रिटेन के वासिन्दा हैं?" सरिता के घर से बाहर निकलते समय हर्षा ने पूछा।
"नहीं, नहीं, " अल्बर्ट ने अपना सिर हिलाया।
"तो क्या आप ऑस्ट्रेलिया या अमेरिका से हैं?"
"मैं पुर्तगाल से हूं, मेरा नाम अल्बर्टो पासोआ है। कभी मेरे माता-पिता गोवा में रहते थे। लेकिन मैं लिस्बोआ के नजदीक एक छोटे से गांव कॉकसीस में रहता हूं। "
"यह लिस्बोआ कहां है?"
"लिस्बोआ, पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन ही है। क्या तुम पुरी की रहने वाली हो ? क्या मैं तुम्हारा नाम जान सकता हूँ ?"
"हां, हम पुरी में रहते हैं और मेरा नाम हर्षा है। "
अल्बर्टो ने कहा, "बहुत अच्छा हुआ कि हमारी मुलाक़ात हो गई। "
"इसमें क्या अच्छा है?"
"मैं तुमसे पुरी और जगन्नाथ के बारे में बहुत कुछ जान सकता हूं। बेशक, मुझे पुरी के बारे में ईस्कॉन की पुस्तकों से कुछ जानकारी है। लेकिन तुमसे और ज्यादा जान सकूँगा। तुम्हें पता है, समुद्र तट पर एक फोटोग्राफर मेरे पीछे पड़ गया था? मुझे पता है कि मुझे इन लोगों से सही जानकारी नहीं मिल सकती है। किसी तरह मैं उसके चंगुल से बचकर आया हूं। "
"सच में ?" हर्ष जोर से हँस पड़ी।
"हर्स, क्या तुम मुझे बता सकती हों कि जगन्नाथ का कलेवर इतना अमूर्त क्यों है?"
"ओह, आप गलत बोल रहे हैं, मेरा नाम हर्षा है, हर्स नहीं है। "
"मुझे बहुत खेद है कि मैं तुम्हारा नाम सही ढंग से नहीं कह पा रहा हूं। मगर मुझे तुम्हारे नाम का अर्थ पता है। "
"क्या ?" हर्षा ने आश्चर्य से पूछा।
“तुम्हारे नाम का मतलब है आनंद, सुख, हैप्पीनेस, प्लीजिंग, ब्लिसफुल। क्या मैं ठीक कह रहा हूँ ?”
उस दिन वह सचमुच चकित हों गई थी कि एक विदेशी आदमी उसके नाम का अर्थ कैसे बता सकता है।
"वास्तव में, अल्बर्टो तुमने मुझे बहुत आश्चर्यचकित किया है। "
"मैं थोड़ा-थोड़ा संस्कृत जानता हूं। मुझे संस्कृत पसंद है। मैं देवनागरी स्क्रिप्ट पढ़ सकता हूं, मगर ज्यादा तेजी से नहीं। तुम्हारी भाषा संस्कृत से अलग है? मेरा मानना है कि तुम्हारी भाषा संस्कृत जैसी है। अन्यथा, तुम्हारा नाम हर्षा कैसे हो सकता है? "
"अरे, अल्बर्टो, आप जो चाहें कर सकते हैं, लेकिन मेरा नाम विकृत मत करो। "
अल्बर्टो हर्षा के असंतोष दुखी होने के बजाए हँस-हँसकर लोट-पोट हों गया। शायद इसी दौरान वह हर्षा के साथ थोड़ा सहज हो गया था।
" बचपन से ही भारत मेरी कमजोरी रहा है। भारत आने की बड़ी इच्छा थी। मुझे आशा थी कि निश्चित रूप से एक दिन वह इच्छा पूरी होगी। अब मैं दिल्ली में एक अतिथि प्रोफेसर के रूप में आया हूं। "
"क्या तुम दिल्ली में रहते हों ? मैं भी दिल्ली में पढ़ रही हूं। मैं दक्षिण दिल्ली में रहती हूं, फिर तो वहाँ कभी हमारी मुलाक़ात हों सकती हैं। "
"मैं अपने आपको सौभाग्यशाली समझूँगा। क्योंकि तुमने मेरे प्राण बचाए हैं। "
"सब ‘कालिया’ की इच्छा है, किसी का जीवन बचाने वाली मैं कौन हूँ? "
"यह 'कालिया’ कौन है? 'कालिया ' का मतलब क्या है?
"कालिया भगवान जगन्नाथ है। क्या तुमने देखा नहीं कि उसका चेहरा काला मुगुनी पत्थर की तरह है? "
" क्या ? मैंने ध्यान नहीं दिया। मगर तुमने यह नहीं बताया कि जगन्नाथ की अमूर्त कल्पना क्यों की गई है? "
“ क्या भगवान का कोई रूप या आकार है? क्योंकि हम मनुष्य हैं, इसलिए हमने उन्हें मानवीय आकार दिया हैं। यदि पौधे, मवेशियों या पक्षियों में से कोई भी प्राणी अधिक बुद्धिमान और विवेकशील होता, तो वे भगवान को अपना रूप देते, है ना?
"हां, तुम सही कह रही हों" अल्बर्टो ने कहा, " फिर भगवान का रूप क्या हो सकता है? "
उस दिन उसने राजा इंद्रद्युम्न और रानी गुंडीचा की कहानी सुनाई और साथ ही, जगन्नाथ के आधे गढ़ने की कहानी भी सुनाई।



(क्रमशः अगले भागों में जारी...)

0 टिप्पणी "विषादेश्वरी भाग 2 // उड़िया उपन्यास // सरोजिनी साहू // अनुवादक - दिनेश कुमार माली"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.