धर्मेन्द्र अरोड़ा"मुसाफ़िर" की 5 ग़ज़लें


1.

हौसला दिल का जगाना चाहता हूँ!

गर्दिशों में मुस्कुराना चाहता हूँ!!

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तीरगी को रौंदने का है इरादा!

बन के'जुगनू जगमगाना चाहता हूँ!!

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बात रिश्तों की अगर हो ज़िंदगी में!

तो ख़ुशी से हार जाना चाहता हूँ!!

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छेड़ दे जो तार सारे आज दिल के!

गीत ऐसा गुनगुनाना चाहता हूँ!!

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ये धरा परिवार सारा मान कर मैं!

फ़ासले दिल से मिटाना चाहता हूँ!!

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धड़कनें अब कर रही सरगोशियां हैं!

ज़िंदगी के सुर सजाना चाहता हूँ!!

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इक मुसाफ़िर हूं सदाकत के सफर का!

उम्र भर चलते ही जाना चाहता हूं!!

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धर्मेन्द्र अरोड़ा"मुसाफ़िर"


2.

ज़िंदगी में मुस्कुराना चाहिए!

दिलनशीं नगमे सुनाना चाहिए!!

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कामयाबी की तमन्ना है अगर!

हौसला अपना बढ़ाना चाहिए!!

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दूसरों को जो समझते कुछ नहीं!

आइना उनको दिखाना चाहिए!!

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शायरी का फ़न कहाँ आसान है!

सीखने को इक ज़माना चाहिए!!

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जब मुसाफ़िर हो अँधेरा हर तरफ़!

आस का सूरज उगाना चाहिए!!

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धर्मेन्द्र अरोड़ा "मुसाफ़िर"


3.

पांडवों को प्रभु की दुआ मिल गई!

साथ उनकी निराली अदा मिल गई!!

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तीरगी चीरने आज जुगनू चले!

रोशनी की उन्हें जो सदा मिल गई!!

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भाव के पारख़ी हैं मे'रे ये नयन!

अब निगाहों में हमको हया मिल गई!!

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इस कलम ने किया है अनोखा असर!

बिन कहे शारदे की दया मिल गई!!

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हर घड़ी साथ मिलके रहा जो बशर!

बात उसकी सभी से जुदा मिल गई!!

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रास्ता नेकियों का हमें क्या मिला!

दिलनशीं फ़िर मुसाफ़िर वफ़ा मिल गई!!

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धर्मेन्द्र अरोड़ा "मुसाफ़िर"


4.

*दवा से जो नहीँ होते*

वज़्न-1222 1222 1222 1222

अर्कान - मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन

मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन

काफ़िया-आम

रदीफ़-होते हैं

दवा से जो नहीँ होते दुआ से काम होते हैं!

जहाँ में आज भी ऐसे करिश्मे आम होते हैं!!

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गलत राहों से' जीवन में हमेशा दूर तुम रहना!

बुरे हर काम के देखो बुरे अंजाम होते हैं!!

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निराला सा चलन देखा जहाँ में आज लोगों का!

बगल में हैं छुरी रखते जुबाँ पे राम होते हैं!!

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दिलों में इस ज़माने के पनपती साज़िशें हरदम!

बशर की जान के तो बस ज़रा से दाम होते हैं!!

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मुसाफ़िर इस गज़ल में भी पते की बात को कहता!

भरोसा हो जिन्हें खुद पर नहीँ नाकाम होते हैं!!

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धर्मेन्द्र अरोड़ा ''मुसाफ़िर''


5.

नज़ारा लाख दिलकश हो मगर अच्छा नहीँ लगता!

रखे जो दूर छाया को शज़र अच्छा नहीँ लगता!!

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खुशी सारे ज़माने की भले मौजूद हो लेकिन!

भरा ग़म है अगर  दिल में  बशर अच्छा नहीँ लगता!!

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रहे अभिमान में अकड़ा हमेशा जो  ज़माने में!

सिवा अपने कोई भी नामवर अच्छा नहीँ लगता!!

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सियासत के दरिंदो की यही पहचान है होती!

बिना वोटों के कोई भी नगर अच्छा नहीं लगता!!

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सदा आसान हों राहें नहीँ मुमकिन यहाँ हरगिज़!

गिले हों ज़िन्दगानी से सफर अच्छा नहीँ लगता!!

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ज़माने को अगर देखो मुसाफ़िर की नज़र से तुम!

इरादों के बिना जीवन समर अच्छा नहीं लगता!

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धर्मेन्द्र अरोड़ा "मुसाफ़िर"

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