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चिंतक नियरे राखिए.....[हास्य-व्यंग्य]

मेरे भारत महान में यदि कुछ किफ़ायती मात्रा में मिलता हैं तो वह हैं चिंतक। यह जीव अपनी भरी पूरी जमात सहित इस चिंतन के पवित्र और महत्वपूर्ण कर्म में दिन रात रत रह कर ज्ञान उलीचता हुआ देश की प्रगति में अपना सहयोग निस्ङ्कोच देता नहीं अघाता। चूंकि ये शास्त्रों के गहन अध्येता की श्रेणी के सिकंदर हैं सो इनके ज्ञान की पोटली समय समय पर लीक होकर जड़ और उजड्ड दोनों तरह के भारतियों का जीवन प्रकाशवान करते रहते हैं- ‘चिंतन करना चाहिए पर चिंता नहीं क्योंकि चिंतन से चित शांत और चिंता से अशांत होता हैं’ अब ये ज्ञान कभी कभी ओवरफ़्लो भी मार उठता -‘चिंता खुद न करो बल्कि दूसरे को न केवल मौका दो बल्कि ऐसी परिस्थितियाँ भी क्रिएट करो ताकि ‘परहित सरस धरम नहि’ का लाभ उठाया जा सके’।

इन महानुभावों द्वारा म्युनिसिपलिटी के पार्कों में अलस्सुबह से देर शाम तक जारी इस क्रिया में आई कमी पुर्सी को कभी कभार मोहल्ले के बीचों बीच खाट-पाटी डाल कर भी पूरा किया जाता हैं।आपके ज्ञान में थोड़ी श्री वृद्धि करूँ तो कह सकती हूँ कि हमारे मोहल्ले के धरमु काका ऐसे ही गूढ चिंतक टाइप व्यक्तित्व हैं पर आजकल उन्हें कबीर का सहज ज्ञान प्राप्त हो चुका जिससे प्रेरित वे ‘मनसा वाचा’ से कर्मना की ओर उन्मुख हो चले। वे अब सुबह पार्कों की शोभा लूटने के बाद अपने घर के बाहर चारपाई पर कर्म सजाते हैं। यहाँ ताश के राजा रानी से लेकर शतरंज के हाथी घोड़े तक खूब जी जान से लड़ते हैं, पीटते और पिटते हैं मतलब ईमानदारी से कर्म की ओर प्रवृत होते हैं। कई बार तो धरमु काका खुद भी मुश्किल से बचे हैं इस कर्म-युद्ध में शहीद होते होते। शर्तिया इलाज करनेवाले बाबाओ का ‘शर्त’ काका के डी एन ए में भी पाया जाता हैं और उन लोंडो लपाटों के भी जिनके वर्तमान से काका दिन भर खेलने के बाद रात को उनके पिता नामक जीव से उनकी भविष्य चिंता पर अक्सर चिंतियाते हैं। नौकरी से धकियाया और मन से अलसाया ‘पिता’ लोंडो की माँ को कूटपीसकर ही स्वयं को इतना स्फूर्त कर पाता हैं कि बच्चे के भविष्य पर चिंतन कर सके।

खेल अर्थात कर्मयुद्ध उर्फ ‘शर्तिया युद्ध’ में बढ़ती गरमा गर्मी से आसपास के नौसिखिये भी कुछ नया सीखते हैं और सट्टे जैसे कर्म में प्रवृत हो अपने सहित धरमु काका का नाम और जीवन दोनों सफल कर उठते हैं । ऐसे ही धार्मिक कार्यों में काका का जीवन सफल हो ही रहा था कि अचानक एक एक्सक्यूसिव खबर ने मेरे सहित मोहल्ले के कानों को खड़ा करने का सुकर्म किया। हुआ यूं कि बड़के नेताजी ने जनता के हित में काका को उपयुक्त पात्र पा अपने साथ उपवास पर बैठने हेतु न्यौता भिजवाया हैं। चूंकि उपवास से पूर्व एक शाही भोज का आयोजन हुआ हैं जिसमें काका की फेवरिट डिश ‘छोले भटूरे’ भकोसने का भी निमंत्रण हैं। काका चिंतन,चिंता और मुहल्ले के बालकों की दिनचर्या रूपी नाव को मझधार में छोड़ उपवास के विस्तारीकरण का हिस्सा बनने जा रहे हैं। उनका चित इस शाही भोज के चिंतन में रत हैं तो उनकी चिंता एक बार फिर लीक होकर जनहित,परहित,लोकहित आदि जाने कैसे कैसे हितों में डूब उतर रही हैं सिवाय स्वहित के।

संक्षिप्त परिचय –

डॉ अनीता यादव

आधा-दर्जन से अधिक पुस्तकों का सम्पादन

विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं- जनसत्ता समाचार पत्र,नवभारत टाइम्स समाचार पत्र ,अट्ठहास हास्य व्यंग्य पत्रिका , युद्धरत आम आदमी पत्रिका, आधुनिक साहित्य पत्रिका , सरस्वती सुमन पत्रिका,सहचर-ई पत्रिका,जन-कृति ई पत्रिका ,समज्ञा दैनिक समाचार पत्र [कोलकाता] कालवाड़ टाइम्स{जयपुर},स्वराज खबर आदि में- हास्य-व्यंग्य, कहानियाँ तथा लेख प्रकाशित ।

पिछले ग्यारह वर्षो से दिल्ली-विश्वविद्यालय [गार्गी महविद्यालय,हिन्दी विभाग] मे स्थायी रूप से प्राध्यापक पद पर कार्यरत।

कार्यस्थल का पता- गार्गी कॉलेज[दिल्ली यूनिवर्सिटी] ,सिरीफ़ोर्ट रोड,नई दिल्ली 110049


मेल- dr.anitayadav@yahoo.com

व्यंग्य 553070452924739149

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