370010869858007

---प्रायोजक---

---***---

नीचे टैक्स्ट बॉक्स से रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -
 नाका संपर्क : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी यहाँ [लिंक] देखें.

****

Loading...

धर्मेन्द्र अरोड़ा"मुसाफ़िर" की 5 ग़ज़लें


1.

हौसला दिल का जगाना चाहता हूँ!

गर्दिशों में मुस्कुराना चाहता हूँ!!

:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

तीरगी को रौंदने का है इरादा!

बन के'जुगनू जगमगाना चाहता हूँ!!

:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

बात रिश्तों की अगर हो ज़िंदगी में!

तो ख़ुशी से हार जाना चाहता हूँ!!

:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

छेड़ दे जो तार सारे आज दिल के!

गीत ऐसा गुनगुनाना चाहता हूँ!!

:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

ये धरा परिवार सारा मान कर मैं!

फ़ासले दिल से मिटाना चाहता हूँ!!

:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

धड़कनें अब कर रही सरगोशियां हैं!

ज़िंदगी के सुर सजाना चाहता हूँ!!

:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

इक मुसाफ़िर हूं सदाकत के सफर का!

उम्र भर चलते ही जाना चाहता हूं!!

:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

धर्मेन्द्र अरोड़ा"मुसाफ़िर"


2.

ज़िंदगी में मुस्कुराना चाहिए!

दिलनशीं नगमे सुनाना चाहिए!!

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

कामयाबी की तमन्ना है अगर!

हौसला अपना बढ़ाना चाहिए!!

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

दूसरों को जो समझते कुछ नहीं!

आइना उनको दिखाना चाहिए!!

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

शायरी का फ़न कहाँ आसान है!

सीखने को इक ज़माना चाहिए!!

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

जब मुसाफ़िर हो अँधेरा हर तरफ़!

आस का सूरज उगाना चाहिए!!

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

धर्मेन्द्र अरोड़ा "मुसाफ़िर"


3.

पांडवों को प्रभु की दुआ मिल गई!

साथ उनकी निराली अदा मिल गई!!

*****************************

तीरगी चीरने आज जुगनू चले!

रोशनी की उन्हें जो सदा मिल गई!!

*****************************

भाव के पारख़ी हैं मे'रे ये नयन!

अब निगाहों में हमको हया मिल गई!!

*****************************

इस कलम ने किया है अनोखा असर!

बिन कहे शारदे की दया मिल गई!!

*****************************

हर घड़ी साथ मिलके रहा जो बशर!

बात उसकी सभी से जुदा मिल गई!!

*****************************

रास्ता नेकियों का हमें क्या मिला!

दिलनशीं फ़िर मुसाफ़िर वफ़ा मिल गई!!

*****************************

धर्मेन्द्र अरोड़ा "मुसाफ़िर"


4.

*दवा से जो नहीँ होते*

वज़्न-1222 1222 1222 1222

अर्कान - मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन

मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन

काफ़िया-आम

रदीफ़-होते हैं

दवा से जो नहीँ होते दुआ से काम होते हैं!

जहाँ में आज भी ऐसे करिश्मे आम होते हैं!!

:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

गलत राहों से' जीवन में हमेशा दूर तुम रहना!

बुरे हर काम के देखो बुरे अंजाम होते हैं!!

:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

निराला सा चलन देखा जहाँ में आज लोगों का!

बगल में हैं छुरी रखते जुबाँ पे राम होते हैं!!

:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

दिलों में इस ज़माने के पनपती साज़िशें हरदम!

बशर की जान के तो बस ज़रा से दाम होते हैं!!

:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

मुसाफ़िर इस गज़ल में भी पते की बात को कहता!

भरोसा हो जिन्हें खुद पर नहीँ नाकाम होते हैं!!

:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

धर्मेन्द्र अरोड़ा ''मुसाफ़िर''


5.

नज़ारा लाख दिलकश हो मगर अच्छा नहीँ लगता!

रखे जो दूर छाया को शज़र अच्छा नहीँ लगता!!

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

खुशी सारे ज़माने की भले मौजूद हो लेकिन!

भरा ग़म है अगर  दिल में  बशर अच्छा नहीँ लगता!!

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

रहे अभिमान में अकड़ा हमेशा जो  ज़माने में!

सिवा अपने कोई भी नामवर अच्छा नहीँ लगता!!

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

सियासत के दरिंदो की यही पहचान है होती!

बिना वोटों के कोई भी नगर अच्छा नहीं लगता!!

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

सदा आसान हों राहें नहीँ मुमकिन यहाँ हरगिज़!

गिले हों ज़िन्दगानी से सफर अच्छा नहीँ लगता!!

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

ज़माने को अगर देखो मुसाफ़िर की नज़र से तुम!

इरादों के बिना जीवन समर अच्छा नहीं लगता!

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

धर्मेन्द्र अरोड़ा "मुसाफ़िर"

ग़ज़लें 5307749512255148959

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

emo-but-icon

मुख्यपृष्ठ item

रचनाकार में छपें. लाखों पाठकों तक पहुँचें, तुरंत!

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं.

   प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 14,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें.

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. किसी भी फ़ॉन्ट में रचनाएं इस पते पर ईमेल करें :

rachanakar@gmail.com
कॉपीराइट@लेखकाधीन. सर्वाधिकार सुरक्षित. बिना अनुमति किसी भी सामग्री का अन्यत्र किसी भी रूप में उपयोग व पुनर्प्रकाशन वर्जित है.
उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.

इस साइट का उपयोग कर आप इस साइट की गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं.

नाका में प्रकाशनार्थ रचनाएँ भेजने संबंधी अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

आवश्यक सूचना : कृपया ध्यान दें -

कविता / ग़ज़ल स्तम्भ के लिए, कृपया न्यूनतम 10 रचनाएँ एक साथ भेजें, छिट-पुट एकल कविताएँ कृपया न भेजें, बल्कि उन्हें एकत्र कर व संकलित कर भेजें. एकल व छिट-पुट कविताओं को अलग से प्रकाशित किया जाना संभव नहीं हो पाता है. अतः उन्हें समय समय पर संकलित कर प्रकाशित किया जाएगा. आपके सहयोग के लिए धन्यवाद.

*******


कुछ और दिलचस्प रचनाएँ

---प्रायोजक---

---***---

फ़ेसबुक में पसंद करें

---प्रायोजक---

---***---

ब्लॉग आर्काइव