जल तू जलाल तू - 4 // प्रकृति और जीव के अन्तःसम्बन्धों का सशक्त उपन्यास // प्रबोधकुमार गोविल

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जल तू जलाल तू

प्रकृति और जीव के अन्तःसम्बन्धों का सशक्त उपन्यास

प्रबोधकुमार गोविल


अध्याय 1 | अध्याय 2 | अध्याय 3 |


चार

किन्जान की माँ रस्बी मूल रूप से भारत की रहनेवाली थी। वहाँ उसका जन्म जैसलमेर के पास एक बहुत छोटे-से गाँव में हुआ था। रस्बी ने अपने जीवन के पहले चार वर्ष तक कभी चन्द्रमा नहीं देखा था। उसे यह भी पता नहीं था कि तारे क्या होते हैं। फूल-पत्तियाँ, पेड़ और पंछी रस्बी को जीवन के पहले चार साल तक कभी नहीं दिखे।

रेत और रेत के चारों ओर एक ऊँची-सी पत्थरों की दीवार, और आसमान से आती सूखी धूप ही बस उसका जीवन था। उसकी माँ इसी धूप में और औरतों के साथ कभी चक्की पीसती, कभी कपड़ा बुनती, कभी बाँस की टोकरी बनाती, तो कभी पत्थर तोड़ती। इसी बीच उसे प्याज, चटनी या किसी दाल के साथ सूखी चार मोटी-मोटी रोटियाँ मिलतीं। उन रोटियों को माँ खाती, और उनके कुछ टुकड़े नन्ही रस्बी को मिलते, जिसका नाम तब रस्बी नहीं, रसबाला था।

रसबाला के लिए इस सारे सहरा में एक छोटा-सा नखलिस्तान, अमृत जैसे दूध की बूँदों का एक प्यारा-सा झरना था, जो उसकी माँ की छाती से बहता था, बाकी दुनिया सूखी और बदरंग थी।

रसबाला के जन्म की कहानी भी अजब थी। नन्ही बच्ची अभी गर्भ में ही थी, कि एक दिन गाँव के बाहर ऊँट पर पीने का पानी बेचनेवाला आया। सुबह से उसके इन्तजार में खड़ी रसबाला की माँ का पारा तब एकाएक चढ़कर सातवें आसमान पर पहुँच गया, जब उसके आगे खड़ी औरत ने दो हाँडियाँ खरीद लीं, और ऊँटवाले का डोल खाली हो गया। पानी की कीमत चुकाने के लिए लाए गए अण्डे उसके हाथ में न होते तो रसबाला की माँ दोनों का मुँह नोंच लेती - मुए ऊँटवाले का भी, और कलमुँही पानी की उस लुटेरी का भी। मुनाफाखोरों की तरह पानी की कालाबाजारी करने चली थी! लेकिन दोनों हाथों में पानी भरी हाँडियाँ लिए इतराती वो मटक्को जैसे ही पलटी, उसकी कोहनी रसबाला की माँ के हाथ से टकरा गई, और तीनों अण्डे हाथ से छूटकर रेत में गिर गए। एक तो ऐसा फूटा, कि मिट्टी पर जलती धूप में आमलेट ही बन गया। बाकी दोनों भी फूटकर मिट्टी में जा मिले।

रसबाला की माँ ने आव देखा न ताव, पहले तो बाल पकड़े उस औरत के, और फिर झटके से उसकी दोनों हाँडियाँ फोड़ डालीं। ऊँट घबराकर लीद करता हुआ आगे भागा। भगदड़ मच गई।

अब एक तरफ फूटे अण्डे, दूसरी तरफ बिखरा पानी, दोनों तरफ पैनी प्यास...जमकर लड़ाई हुई दोनों में। बात केवल मार-पीट पर ही नहीं रुकी, हाथ में पहने मोटे कडे़ के वारों से रसबाला की माँ ने उस अण्डे फोड़नेवाली को बेदम करके ही छोड़ा। थोड़ी ही देर में गर्म रेत ने उबलते लहू के थक्के भी देखे। तमाशबीन तितर-बितर और रसबाला की माँ की कलाई में हथकड़ी भी आ गई। जो हाथ पानी लेने गए थे, वो हथकड़ी पहनकर लौटे। रसबाला की माँ के हाथों उस औरत का कत्ल हो गया।

उसका आदमी तो पैदाइशी मजदूर था। हथकड़ियों को जमानत के झमेलों से तोड़ पाता, तब तक तो रसबाला की माँ जेल में आ गई।

और इस तरह रसबाला का जन्म भी जेल में ही हुआ। दादी ने पोती का मुँह नहीं देखा था, बस, नाम रख दिया रसबाला। वह भी इतनी समर्थ नहीं थी कि बच्ची को अपने साथ रख सके। बीमार, कृशकाय व जर्जर।

और अपने बचपन को रसबाला ने सूखी धूप में खेलते और सूरज ढलते ही अँधेरी बैरकों में बन्द हो जाते देखा।

कैदियों के बच्चों की सार-सम्हाल करनेवाली किसी संस्था के कदम जब उस जेल में पड़े, तब रसबाला चार साल की थी। एक समाज-सेविका ने जेल में ही सब औरतों से मिलकर उन्हें समझाया कि अपने साथ-साथ अपने बच्चों का भविष्य तबाह मत करो। नसीब की मारी उन माँओं को भला इसमें क्या ऐतराज होता, कि उनके बच्चों को कोई अँधेरी सुरंग से उजाले की दुनिया में निकाल ले जाए।

रसबाला कैदियों के बच्चों की एक आवासीय पाठशाला में चली गई। बच्ची इसी आसरे में पलने लगी। रसबाला की माँ का कारावास जब तक पूरा होता, कैदी औरतों की इन बच्चियों का जीवन सड़क पर पलते कुत्ते-बिल्लियों जैसा ही था।

समय पर सूखी रोटियाँ इन्हें जरूर नसीब हो जाती थीं, बाकी ऐसा कुछ न था जो उनके लिए कोई भविष्य मुकर्रर करे। घने जंगल में पथरीली झाड़ियों जैसी बैरकें थीं और वहाँ काम करनेवालों, सेवा करनेवालों, हुकूमत करनेवालों, किसी के लिए भी चार साल की बच्ची और चौबीस साल की औरत में कोई अन्तर नहीं था। मानो कुदरत ने मादा शरीर बस एक-सी नजर के लिए ही बनाया हो। न वहाँ कोई किसी से कुछ कहनेवाला था और न ही कोई किसी की सुननेवाला। बच्चियाँ कच्ची दाल पीने के बाद दाल का टपकता पानी जैसे कोहनियों से पोंछती थीं, वैसे ही जाँघों से टपकता खून हथेलियों से रगड़कर। साथ खेलने-कूदनेवाले कैदी औरतों के बच्चे हों, चाहे जेलखाने के मुलाजिम, जो जब चाहता बदन के लत्ते हटा देता। अपने भी और बच्चियों के भी। ऐसा नारकीय जीवन न जाने कब तक चलता, कि रसबाला के नसीब से एक सैलानी मुस्लिम परिवार कहीं से ढूँढता-खोजता किसी बेसहारा बच्ची को गोद लेने की गरज से वहाँ चला आया। रसबाला के नसीब ने उसे भी दावेदारी की लाइन में लगा दिया।

ये काम आसान न था। रसबाला को मुस्लिम परिवार के लिए गोद लेना आसान न था। कई पेचीदगियाँ थीं। लेकिन बच्चों के भविष्य को देखते हुए, जब अनाथालय के अधीक्षक ने पाया कि कोई सम्पन्न महिला बार-बार रसबाला को ले जाने के लिए ही आग्रह कर रही है, तो उन्होंने रुचि लेकर मुस्लिम दम्पति की मदद की। थोड़ा हेर-फेर अभिलेख में भी किया गया। और इस तरह रसबाला एक दिन ‘रसबानो’ हो गई। उसे कैदी महिला की पुत्र के स्थान पर अनाथ बताया गया।

जब किस्मत लिखने में विधाता से भूल होती आई है तो इन्सानों का क्या? और मुस्लिम दम्पति ने भी ‘पाठशाला’ के इस सहयोग का भारी इनाम दिया। पाठशाला में बच्चों के लिए पीने के पानी का एक बड़ा टैंक बनवाया।

हजारों रुपए इसमें खर्च हुए।

अब रसबानो एक सम्पन्न परिवार में आ गई। उसके इस नए ‘पिता’ का घोड़ों और ऊँटों का बड़ा कारोबार था। एक से एक बढ़िया नस्ल के अरबी घोड़े छोटी उम्र में खरीदे जाते थे, और उन्हें प्रशिक्षित करके ऊँचे दामों में बेचा जाता था। पश्चिम की माँग के अनुसार बढ़िया जानवर तैयार करने में उन्हें भारी मुनाफा होता था, क्योंकि ऊँट और घोड़े पूर्वी पिछड़े इलाकों में सस्ते मिल जाते थे। उनसे उन्नत किस्म के जानवरों की हायब्रिड नस्लें तैयार होती थीं। अच्छे खान-पान के साथ नफासत की ट्रेनिंग उन्हें उम्दा माल बनाती थी। जबकि पूर्वी क्षेत्रों में तो इन्हें कभी चारे-पानी की कमी या दुर्भिक्ष के चलते वैसे ही छोड़ दिया जाता था, जहाँ ये कुछ औपचारिकताओं के बाद मुफ्त के माल की तरह मिल जाते थे।

रसबानो का परिवार साल-दो साल में खाड़ी देशों में जाता रहता था। बारह साल की होने तक तो रसबानो ने अपने माँ-बाप के साथ हज यात्रा भी कर डाली।

मक्का-मदीना और जेद्दाह में उसे बहुत आनन्द आता था। वह अपने पिता के कारोबार को बहुत कौशल और ध्यान से देखती। अपनी माँ की तरह उसकी रुचि घर और लड़कियोंवाले कामों में नहीं थी।

परिवार इतना बड़ा था कि खुद रसबानो की माँ को भी पता नहीं था, कितने शहरों में कितने रिश्ते-नातेदार फैले हैं। जहाँ जाती, रसबानो अपनों को पाती। फिर उसकी उम्र भी धीरे-धीरे ऐसी आ रही थी, जिसमें हर कोई लड़की को अपना समझता है। घरवाले चाहते हैं, कि वह दायरों में रहे, बाहरवाले चाहते हैं कि वह बेलगाम हर कहीं आती-जाती उपलब्ध रहे, और खुद मन चाहता है कि दुनिया क्यों न देखी जाए? रसबानो सोचती, कि ये मुकाम लड़कों की जिन्दगी में क्यों नहीं आता? रसबानो ने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। न उसने अपनी पिछली जिन्दगी के बारे में किसी से कुछ कभी पूछा, और न ही किसी ने कभी उसे कुछ बताया।

इतना जरूर था, कि जब भी रसबानो भारत में अपने घर आकर वापस लौटती, तो घर-गाँव की हर चीज उसे न जाने क्यों अपनी ओर खींचती। ये लगाव कैसा था, क्यों था, रसबानो कभी न जान पाती।

हाँ, एक बार इस लगाव की सीरत, फितरत और खलिश किसी खुशबू की शक्ल में उसके मन के झरोखों से झाँकी, जब सोमालिया से ... आए एक युवक से उसके मन का रिश्ता जुड़ गया। केवल एक, और एक बात थी कि रसबानो ने विदेशी युवकों के झुण्ड में उसे पसन्द किया। दूर से आए ये बेलगाम सैनिक जहाँ औरतों को देखकर तरह-तरह की हरकतें करते थे, एक अकेला यही युवक ऐसा था जो रसबानो को देखकर आँखें नीची कर लेता था। इस बात ने रसबानो को चौकन्ना किया। वह उफनते दूध की तरह उसे देखकर अपना चेहरा उठाती और उधर सोमालिया का वह शर्मीला नौजवान अँधेरे के सूरजमुखी की तरह नजरें झुकाकर अपने आपमें सिमट जाता।

बस, यही कहानी थी रसबानो के रस्बी बन जाने की... ...कुछ सैनिक आकर उस फार्म हाउस से थोड़ी ही दूर पर ठहरे, जिसमें उन दिनों रसबानो अपनी माता और कुछ अन्य रिश्तेदारों के साथ छुट्टियाँ मना रही थी। फार्म हाउस में काम करनेवाले लड़कों से रसबानो को पता चला कि अमेरिकी सेना का एक तेल-वाहक जहाज कुछ ही दूरी पर डेरा डाले हुए है, जिसके कामगारों और सैनिकों से उनकी जब-तब बातचीत होती रहती है।

सैनिकों को स्थानीय बाजारों और देखने लायक जगहों में दिलचस्पी रहती, और फार्म हाउस के कर्मचारियों को अमेरिका के बारे में जानने की जिज्ञासा रहती।

सैनिकों के साथ आया छोटा-मोटा सामान भी उन्हें लुभाता।

जिस तरह आसमान के तारे क्षितिज पर आकर धरती के पेड़ों की फुनगियों को येन-केन-प्रकारेण छू ही लेते हैं, जिस तरह सागर और धरती किसी तट पर एक-दूसरे को नम कर ही देते हैं, जिस तरह लहरों पर तैरते पोत एक मुल्क से चलकर दूसरे मुल्क की सीमा चूम ही लेते हैं, वैसे ही एक बदन पर चस्पाँ नयन-खंजन किसी-न-किसी तरह दूसरे जिस्म पर उगी आँखों के काजल की डाल पर घड़ी-दो घड़ी बैठ ही लेते हैं।

किसी डाल पर कोई पंछी आ बैठे, तो फिर तिनकों के नशेमन बनने में भला कितनी देर लगती है? आशियाने जमीन पर भी बनते हैं, पानी में भी, और आसमान की हवाई गलियों में भी।

ऐसे ही, हल्की-हल्की बहती हवा में उड़ते पराग-कणों की तरह रसबानो का नसीब भी अमेरिकी सेना में भर्ती एक सोमालियाई सैनिक के साथ वाबस्ता हो गया। कुछ महीनों बाद रसबानो को भी अमेरिका आने का मौका मिल गया।

सोमालिया की पहचान केवल पति के मुल्क के रूप में बनी रह गई। और इस तरह एक देश की धरती पर जन्मी रसबाला, बरास्ता खाड़ी रसबानो बनी, फिर अपने सैनिक पति के साथ हमेशा के लिए यहाँ आ गई।

इस धरती ने उसे रस्बी नाम दिया और इससे भी बढ़कर उसे बेटे के रूप में किन्जान दिया।

वह बूढ़ा, जो अपने आपको रस्बी का भाई बताकर अब किन्जान से मामा का सम्मान पा रहा था, उसी फार्म हाउस में किन्जान के पिता से भी केवल एक बार मिला था। वह रस्बी का रिश्ते का भाई था। क्योंकि रस्बी के पिता ने दो शादियाँ की थीं। यह बूढ़ा घोड़ों की खरीद-फरोख्त में भी माहिर था और इसी काम में अपने पिता की मदद करता रहा था। इसका आना-जाना कारोबार के सिलसिले में अक्सर होता ही रहता था।

बूढ़े ने किन्जान से आग्रह किया कि वह एक बार उसके साथ जेद्दाह चले, जहाँ उसे उसके और भाई-बन्धु भी मिलेंगे। लेकिन किन्जान को यह सब किस्से-कहानियों की बातें लगती थीं। क्योंकि इन सबके बारे में उसने अपनी माँ रस्बी से कभी कुछ नहीं सुना था। वह तो केवल इतना जानता था कि उसकी माँ अपने देश अमेरिका को दिलो-जान से चाहनेवाली महिला थी, जो अमेरिकी सेना में काम करते हुए अपने पति को खो देने के बाद अपने बेटे को भी उसी सेना में भेजना चाहती थी। और अब अपना अधूरा आग्रह साथ लिए दुनिया से ही कूच कर गई। किन्जान की नजर तो खुद उसके अधूरे सपने पर भी थी। विधाता दुनिया में अधूरा कुछ भी कैसे छोड़ पाता है?...दुनिया का ब्ल्यू-प्रिंट उसने पहले से बनाकर रखा होता तो किन्जान का सपना भी एक दिन जरूर सच होता।

सपने आँखों में लकीर छोड़ जाते हैं। जब तक पूरे न हों, आँखों में नींद के साम्राज्य को जमने नहीं देते। किन्जान ने भी नसीब को पड़ाव दिया था, आत्म-समर्पण नहीं। कुछ दिन बाद वह बूढ़ा, किन्जान का मामा और रस्बी का सौतेला भाई वापस लौट गया।

किन्जान ने एक दिन अपने घर के भीतर एक बहुत विचित्रा बात नोट की।

उसने देखा, कि घर में अकेले उसके रहते हुए भी जब-तब ऐसी बातें होती हैं, जिनकी जानकारी उसे नहीं होती। एक सुबह उसने अपने फ्रिज में कुछ ऐसी चीजें रखी देखीं, जो वह खुद कभी नहीं लाया था। उसने बहुत दिमाग दौड़ाया कि ऐसा कैसे हो सकता है? कहीं ऐसा तो नहीं, कि किन्जान की याददाश्त कमजोर हो गई हो? वह बाजार से कुछ चीजें ले आया हो, और उसे खुद यह याद न रहा हो। बुढ़ापे में तो फिर भी ऐसा होना कोई अनोखी बात नहीं मानी जाती, पर किन्जान तो अभी नौजवान था। उससे भला ऐसी भूल-चूक कैसे हो सकती है? किन्जान का मित्र अर्नेस्ट जब आता तो किन्जान सोचता कि उसे इस बारे में बताए। पर वह कुछ सोचकर रुक जाता। वैसे भी युवावस्था में अपने दोस्तों को भी अपना मखौल उड़ाने का मौका कोई दोस्त नहीं देता।

और क्या, ऐसी बात सुनकर कोई भी किन्जान का मजाक ही तो उड़ाता? लेकिन धीरे-धीरे किन्जान को लगा कि यह अवश्य कोई गंभीर बात है। ऐसा अक्सर होने लगा। किन्जान सुबह उठता तो ध्यान देता कि उसके बिस्तर के किनारे पानी की बोतल रखी हुई है। जबकि वह अच्छी तरह सोचता कि उसने पानी वहाँ नहीं रखा था। हाँ, नहीं ही रखा था।

कभी-कभी किन्जान को थोड़ा भय भी लगता, यह सब क्या है? इन बातों से उसे कभी कोई नुकसान नहीं हुआ, किन्तु कोई भी ऐसे घर में भला कैसे रह सकता है, जिसमें वह होता हो जो आप न करें। खासकर तब जबकि घर में केवल आप ही रहते हों।

किन्जान अब घर में कम-से-कम देर रहने की कोशिश करता, वह अपना समय मित्रों के साथ बिताता। फिर अब उसने इस बारे में भी गम्भीरता से सोचना शुरू कर दिया था, कि वह कोई काम करे। उसे यह खयाल आता कि उसकी माँ रस्बी उसे सेना में भेजना चाहती थी। लेकिन सेना से अब उसका मन उचाट हो गया था।

उसने बफलो में ही छोटा-मोटा कारोबार करने की सोची। मुख्य सड़क से थोड़ा हटकर एक गली में पर्यटकों को पसन्द आनेवाले छोटे-मोटे सामान की छोटी-सी दुकान जमाने में उसे ज्यादा परेशानी नहीं आई। किन्जान के स्टाल पर खरीददारों की अच्छी आवक-जावक होती थी। इससे उसे ज्यादा कुछ सोचने का अवसर नहीं मिलता था, लेकिन जब भी वह थोड़ा फुर्सत में होता तो यह देखता कि उसकी दुकान से वह मशहूर झरना नायग्रा फाल्स साफ दिखाई देता था।

कभी-कभी मन-ही-मन किन्जान यह सोचकर मुस्करा देता कि बर्फीले सफेद पानी का यह तूफान साँस की तरह उसके जीवन से कैसे जुड़ गया है...और न जाने कब किन्जान के मन में हौसला इस तरह उमड़ने लगा कि उसने नायग्रा झरने को पार करने का दुस्साहसी सपना देखना शुरू कर दिया।

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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