ज़ंज़ीबार की लोक कथाएँ // बन्दर, शार्क और धोबी की गधी // सुषमा गुप्ता

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clip_image001देश विदेश की लोक कथाएँ — पूर्वी अफ्रीका–ज़ंज़ीबार :

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ज़ंज़ीबार की लोक कथाएँ

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संकलनकर्ता

सुषमा गुप्ता

Cover Page picture: Red Colobus Monkey of Zanzibar

Published Under the Auspices of Akhil Bhartiya Sahityalok

E-Mail: sushmajee@yahoo.com

Website: www.sushmajee.com/folktales/index-folktales.htm

Read More such stories at: www.scribd.com/sushma_gupta_1

Copyrighted by Sushma Gupta 2014

No portion of this book may be reproduced or stored in a retrieval system or transmitted in any form, by any means, mechanical, electronic, photocopying, recording, or otherwise, without written permission from the author.

Map of Zanzibar

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विंडसर, कैनेडा

फरवरी 2017

Contents

सीरीज़ की भूमिका 4

ज़ंज़ीबार की लोक कथाएँ 5

1 बन्दर, शार्क और धोबी की गधी 7

2 खरगोश और शेर 17

3 खरगोश, हयीना और शेर 28

4 काइट चिड़ियें और कौए 33

5 गोसो मास्टर जी 39

6 बन्दर, साँप और शेर 50

8 जादूगर और सुलतान के बेटे 81

9 हामदानी 90

10 डाक्टर का बेटा और साँपों का राजा 136

सीरीज़ की भूमिका

लोक कथाएँ किसी भी समाज की संस्कृति का एक अटूट हिस्सा होती हैं। ये संसार को उस समाज के बारे में बताती हैं जिसकी वे लोक कथाएँ हैं। आज से बहुत साल पहले, करीब 100 साल पहले ये लोक कथाएँ केवल ज़बानी ही कही जातीं थीं और कह सुन कर ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दी जाती थीं इसलिये किसी भी लोक कथा का मूल रूप क्या रहा होगा यह कहना मुश्किल है।

आज हम ऐसी ही कुछ अंग्रेजी और कुछ दूसरी भाषा बोलने वाले देशों की लोक कथाएँ अपने हिन्दी भाषा बोलने वाले समाज तक पहुँचाने का प्रयास कर रहे हैं। इनमें से बहुत सारी लोक कथाएँ हमने अंग्रेजी की किताबों से, कुछ विश्वविद्यालयों में दी गयी थीसेज़ से, और कुछ पत्र्किाओं से ली हैं और कुछ लोगों से सुन कर भी लिखी हैं। अब तक 1200 से अधिक लोक कथाएँ हिन्दी में लिखी जा चुकी हैं। इनमें से 400 से भी अधिक लोक कथाएँ तो केवल अफ्रीका के देशों की ही हैं।

इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है कि ये सब लोक कथाएँ हर वह आदमी पढ़ सके जो थोड़ी सी भी हिन्दी पढ़ना जानता हो और उसे समझता हो। ये कथाएँ यहाँ तो सरल भाषा में लिखी गयी है पर इनको हिन्दी में लिखने में कई समस्याएँ आयी है जिनमें से दो समस्याएँ मुख्य हैं।

एक तो यह कि करीब करीब 95 प्रतिशत विदेशी नामों को हिन्दी में लिखना बहुत मुश्किल है, चाहे वे आदमियों के हों या फिर जगहों के। दूसरे उनका उच्चारण भी बहुत ही अलग तरीके का होता है। कोई कुछ बोलता है तो कोई कुछ। इसको साफ करने के लिये इस सीरीज़ की सब किताबों में फुटनोट्स में उनको अंग्रेजी में लिख दिया गया हैं ताकि कोई भी उनको अंग्रेजी के शब्दों की सहायता से कहीं भी खोज सके। इसके अलावा और भी बहुत सारे शब्द जो हमारे भारत के लोगों के लिये नये हैं उनको भी फुटनोट्स और चित्रों द्वारा समझाया गया है।

ये सब कथाएँ “देश विदेश की लोक कथाएँ” नाम की सीरीज के अन्तर्गत छापी जा रही हैं। ये लोक कथाएँ आप सबका मनोरंजन तो करेंगी ही साथ में दूसरे देशों की संस्कृति के बारे में भी जानकारी देंगी। आशा है कि हिन्दी साहित्य जगत में इनका भव्य स्वागत होगा।

सुषमा गुप्ता

मई 2016

ज़ंज़ीबार की लोक कथाएँ

संसार में सात महाद्वीप हैं – एशिया, अफ्रीका, उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका, अन्टार्कटिका, यूरोप और आस्ट्रेलिया – सबसे बड़े से सबसे छोटा।

इस प्रकार अफ्रीका इस संसार का साइज़ में और जनस्ंख्या में भी दूसरे नम्बर का महाद्वीप है। इसमें 54 देश हैं। इस महाद्वीप के बारे में लिखित साहित्य और दूसरे महाद्वीपों की तुलना में बहुत कम मिलता है इसी कारण से हमने इस महाद्वीप की लोक कथाएँ हिन्दी भाषा में प्रस्तुत करने का विचार किया है। इस महाद्वीप से लगभग 400 से अधिक लोक कथाएँ इकठ्ठी की गयीं हैं। इस महाद्वीप के साथ साथ और महाद्वीपों की लोक कथाएँ भी “देश विदेश की लोक कथाएँ” नाम की सीरीज़ में छापी जा रहीं हैं।

अफ्रीका के 54 देशों में से इथियोपिया[1], मिश्र, नाइजीरिया, घाना, ज़ंज़ीबार और दक्षिण अफ्रीका देशों की लोक कथाएँ काफी संख्या में मिल जाती है इसलिये उन देशों की लोक कथाएँ “अफ्रीका की लोक कथाएँ” में शामिल नहीं की गयीं हैं। उन देशों की लोक कथाएँ उन देशों के नाम से ही दी गयीं हैं। दूसरे, अफ्रीका में नाइजीरिया और घाना देशों की लोक कथाओं में अनन्सी मकड़े, खरगोश और कछुए का अपना एक अलग ही स्थान है इसलिये इन तीनों की लोक कथाएँ भी अलग से ही दी गयीं है।

अफ्रीका की लोक कथाएँ चार भागों में बाँट दी गयीं हैं – अफ्रीका, पूर्वीय अफ्रीका, दक्षिणी अफ्रीका, और पश्चिमी अफ्रीका। “अफ्रीका की लोक कथाएँ” पुस्तक में वे लोक कथाएँ दी गयी हैं जिनके देशों का या तो पता नहीं है या फिर उन देशों की लोक कथाएँ इतनी कम हैं कि उनको अलग पुस्तक में नहीं छापा जा सकता। इसमें उत्तरी अफ्रीका के देशों की लोक कथाएँ भी शामिल हैं। “पूर्वीय अफ्रीका की लोक कथाएँ” पुस्तक में पूर्वी अफ्रीका के देशों की लोक कथाएँ हैं। “दक्षिणी अफ्रीका की लोक कथाएँ” पुस्तक में दक्षिणी अफ्रीका के 11 देशों की लोक कथाएँ हैं। “पश्चिमी अफ्रीका की लोक कथाएँ” पुस्तक में पश्चिमी अफ्रीका के उन देशों की लोक कथाएँ हैं जो नाइजीरिया और घाना से सम्बन्धित नहीं हैं।

ज़ंज़ीबार पूर्वीय अफ्रीका का एक द्वीप समूह है जो उसके तन्ज़ानिया नाम के देश में आता है और उसके पूर्व में हिन्द महासागर में स्थित है। इसमें दो बड़े टापू हैं – ज़ंज़ीबार और पैम्बा और बहुत सारे छोटे छोटे टापू हैं। यहाँ लौंग, काली मिर्च, जायफल, दालचीनी बहुत होती है इसलिये इसको स्पाइस द्वीप भी कहते हैं। एक लाल रंग का बन्दर यहाँ की खासियत है। ज़ंज़ीबार द्वीप समूह ऐतिहासिक दृष्टि से एक बहुत ही मशहूर जगह है। आज से करीब 500 साल और उससे भी ज़्यादा पहले से सब समुद्री जहाज़ यूरोप यहीं से हो कर जातेेे थे इसके अलावा यहाँ से मसाले भी बहुत खरीदे जाते थे।

सो प्रस्तुत है यहाँ “ज़ंज़ीबार की लोक कथाएँ”। इस पुस्तक में हम वहाँ की 10 लोक कथाएँ दे रहे हैं। ये लोक कथाएँ जौर्ज डबल्यू बेटमैन ने सन 1901 में अंग्रेजी में अनुवाद करके छापी थीं। वे ही कहानियाँ यहाँ अब अपने हिन्दी भाषा जानने वालों के लिये हिन्दी में इस पुस्तक में छापी जा रही हैं। [2]

आशा है कि ये कहानियाँ पूर्वीय अफ्रीका के जीवन की एक झलक प्रस्तुत करने में सहायता करेंगीं।

1 बन्दर, शार्क और धोबी की गधी[3]

एक बार की बात है कि कीमा बन्दर[4] और पापा शार्क बहुत गहरे दोस्त बन गये। बन्दर तो एक बहुत बड़े कूयू[5] के पेड़ पर रहता था जो समुद्र के किनार ही उगा हुआ था। उसकी कुछ शाखें जमीन की तरफ थीं और कुछ शाखें समुद्र के ऊपर थीं और पापा शार्क समुद्र में रहता था।

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हर सुबह जब बन्दर कूयू पेड़ की गिरी का नाश्ता कर रहा होता तो पापा शार्क किनारे पर पेड़ के नीचे आता और आवाज लगाता — “मुझे थोड़ी सी गिरी दो न कीमा भाई। ” और बन्दर उसके लिये कई सारी गिरी नीचे फेंक देता।

यह सिलसिला कई महीनों तक चलता रहा कि एक दिन पापा शार्क ने बन्दर से कहा — “कीमा भाई, तुमने मेरे ऊपर बहुत मेहरबानियाँ की हैं। मैं चाहता हूँ कि एक दिन तुम मेरे घर चलो ताकि मैं तुम्हारी उन मेहरबानियों का कुछ बदला चुका सकूँ। ”

बन्दर बोला — “मैं तुम्हारे साथ कैसे जा सकता हूँ पापा शार्क। हम जमीन पर रहने वाले लोग हैं पानी में नहीं जा सकते। ”

शार्क बोला — “तुम उसकी चिन्ता मत करो। मैं तुमको पानी में ले भी जाऊँगा और एक बूँद पानी भी तुमको नहीं छू पायेगा। ”

बन्दर बोला — “तब ठीक है। चलो चलते हैं। ”

सो पापा शार्क ने कीमा बन्दर को अपनी पीठ पर बिठाया और नदी में तैर गया। जब वे लोग बीच पानी में पहुँच गये तो शार्क बोला — “तुम मेरे दोस्त हो इसलिये मैं तुमको सच सच बताता हूँ। ”

बन्दर यह सुन कर आश्चर्य में पड़ गया और बोला — “क्या बात है पापा शार्क क्या बात है? वह क्या सच है जो तुम मुझे बताना चाहते हो?”

पापा शार्क बोला — “सच तो यह है बन्दर भाई कि हमारा राजा बहुत बीमार है और हमारे डाक्टर ने हमें बताया है कि उसकी दवा केवल बन्दर के कलेजे से ही बन सकती है। ”

कीमा बन्दर एक पल सोच कर बोला — “तुम तो बहुत ही बेवकूफ हो। तुमने यह बात मुझे चलने से पहले क्यों नहीं बतायी?”

पापा शार्क ने पूछा — “पर वह क्यों?”

कीमा बन्दर थोड़ी देर तो चुप रहा उसने कोई जवाब नहीं दिया क्योंकि वह अपने बचाव का कोई तरीका सोच रहा था।

कीमा बन्दर को चुप देख कर पापा शार्क ने पूछा — “अरे तुम बोलते क्यों नहीं?”

कीमा बन्दर बोला — “अब मैं क्या बोलूँ क्योंकि अब तो बहुत देर हो गयी पापा शार्क। अगर तुमने यह बात मुझे चलने से पहले बतायी होती तो मैं अपना कलेजा अपने साथ ले कर आता। ”

पापा शार्क ने आश्चर्य से पूछा — “क्या मतलब? क्या तुम्हारा कलेजा तुम्हारे पास नहीं है?”

कीमा बन्दर बोला — “ओह तो तुम हमारे बारे में कुछ भी नहीं जानते क्या? हम बन्दर लोग जब बाहर जाते हैं तो अपना कलेजा पेड़ पर ही छोड़ आते हैं और बिना कलेजे के ही इधर उधर घूमते रहते हैं। तुमको मेरा विश्वास नहीं हो रहा? तुम समझ रहे हो कि मैं डर रहा हूँ?

तो फिर चलो, हम तुम्हारे घर ही चलते हैं। वहाँ तुम मुझे मार सकते हो और मेरा कलेजा ढूँढ सकते हो पर वह सब बेकार ही रहेगा क्योंकि वह तो वहाँ है ही नहीं तो वह तुमको मिलेगा कहाँ से। ”

बन्दर शार्क का दोस्त था सो शार्क को बन्दर पर विश्वास हो गया। वह बोला — “अगर ऐसा है तो चलो फिर वापस तुम्हारे घर ही चलते है तुम्हारा कलेजा लाने। ”

कीमा बोला — “नहीं नहीं, पहले अब हम तुम्हारे घर ही चलते हैं। ”

लेकिन शार्क बोला — “नहीं नहीं, पहले तुम्हारे घर चलते हैं तुम्हारा कलेजा लाने के लिये। ”

आखिर बन्दर ऊपर से अपने घर जाने के लिये अनमनापन दिखाते हुए अपने घर ही चलने को तैयार हो गया और शार्क बन्दर के घर की तरफ वापस लौट पड़ा।

शार्क के किनारे पहुँचते ही बन्दर जमीन पर कूद गया और जल्दी से पेड़ पर चढ़ गया। वहाँ से वह बोला — “शार्क पापा, मेरा इन्तजार करो। मैं जरा अपना कलेजा ले लूँ फिर चलते हैं। ”

जब वह पेड़ पर काफी ऊँची टहनियों पर पहुँच गया तो वहाँ जा कर वह चुपचाप शान्ति से बैठ गया। शार्क बेचारा काफी देर तक इन्तजार करता रहा फिर बोला — “कीमा भाई, आओ चलें। ”

पर कीमा बन्दर चुपचाप वहीं बैठा रहा। शार्क ने फिर कीमा को आवाज लगायी पर इस बार बन्दर बोला “कहाँ?”

“मेरे घर। ”

कीमा बन्दर चिल्लाया — “क्या तुम पागल हो?”

शार्क ने पूछा — “क्यों, मैं पागल क्यों हूँ?”

बन्दर बोला — “क्या तुमने मुझे धोबी की गधी समझ रखा है?”

शार्क ने पूछा — “धोबी की गधी में क्या खास बात है भाई?”

बन्दर बोला — “उसकी खासियत यह है कि न तो उसके कलेजा होता है और न ही उसके कान होते हैं। ”

अब शार्क अपनी उत्सुकता नहीं रोक पाया उसने बन्दर से उस धोबी की गधी की कहानी सुनाने के लिये कहा जिसके न तो कलेजा था और न कान थे। बन्दर ने शार्क को धोबी की गधी की कहानी कुछ ऐसे सुनायी —

धोबी की गधी की कहानी

एक धोबी के पास एक गधी थी। उसका नाम पूँडा[6] था। वह धोबी अपनी गधी को बहुत प्यार करता था पर किसी वजह से वह गधी घर से भाग गयी और जंगल चली गयी।

वहाँ जा कर कोई काम न होने की वजह से वह सुस्ती की ज़िन्दगी बिताने लगी और सुस्ती की ज़िन्दगी बिताने की वजह से वह बहुत मोटी भी हो गयी।

एक दिन सूँगूरा[7] नाम का बड़ा खरगोश जंगल में घूमते घूमते पूँडा गधी के पास से गुजरा। अब बड़ा खरगोश तो बहुत ही चालाक जानवर होता है। अगर तुम ध्यान से देखो तो उसका मुँह हमेशा चलता ही रहता है। ऐसा लगता है जैसे वह हमेशा अपने आपसे हर तरीके की बातें करता रहता है।

सो जब सूँगूरा बड़े खरगोश ने पूँडा गधी को देखा तो सोचा “ओह यह गधी तो बहुत मोटी है। इसमें से तो हमको बहुत सारा माँस मिलेगा। ”

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तो अब वह खुद तो गधी को मार नहीं सकता था सो वह तुरन्त ही सिम्बा शेर[8] के पास गया।

सिम्बा शेर काफी बीमार था और बेचारा अभी पूरी तरह से ठीक भी नहीं हो पाया था सो काफी कमजोर भी था। वह शिकार के लिये भी नहीं जा सकता था और वह भूखा भी बहुत था।

सूँगूरा बड़ा खरगोश उससे बोला — “ंमैं कल तुम्हारे लिये काफी माँस ला सकता हूँ जो हम दोनों के लिये काफी से भी ज़्यादा होगा पर तुमको उस शिकार को मारना पड़ेगा। ”

सिम्बा शेर बोला — “दोस्त यह तो बड़ी अच्छी बात है। ठीक है, तुम उसे ले कर आओ फिर मैं देखता हूँ। ”

यह सुन कर सूँगूरा बड़ा खरगोश तुरन्त ही जंगल में भाग गया। वह गधी के पास पहुँचा और उससे बोला — “ओ मिस पूँडा, मुझे तुम्हारा हाथ माँगने के लिये तुम्हारे पास भेजा गया है। ”

पूँडा गधी ने पूछा — “किसने भेजा है तुम्हें? किसने माँगा है मेरा हाथ?”

“सिम्बा शेर ने। ”

यह सुन कर तो गधी बहुत ही खुश हो गयी। वह बोली — “ओह यह तो बहुत ही अच्छा रिश्ता है चलो जल्दी चलें। ”

सो दोनों शेर के घर आ पहुँचे। शेर ने उनको प्रेम से अन्दर बुलाया और बैठाया। सूँगूरा बड़े खरगोश ने सिम्बा शेर को यह बताने के लिये अपनी भौंहों से इशारा किया कि यही है वह शिकार जिसकी मैं कल बात कर रहा था। मैं बाहर जाता हूँ और मैं वहीं इन्तजार करता हूँ।

फिर उसने पूँडा से कहा — “मिस पूँडा, मुझे थोड़ा काम है, वह काम करके मैं अभी वापस आता हूँ। तब तक तुम अपने होने वाले पति के पास बैठ कर गपशप करो। ” और यह कह कर वह बड़ा खरगोश वहाँ से बाहर भाग गया।

जैसे ही बड़ा खरगोश बाहर गया शेर गधी के ऊपर कूद पड़ा। दोनों में बहुत ज़ोर की लड़ाई हुई। गधी ने शेर को बहुत ज़ोर से मारा। शेर उस समय बहुत कमजोर था। काफी कोशिशों के बाद भी शेर गधी को न मार सका और वह गधी शेर को नीचे पटक कर जंगल में अपने घर भाग गयी।

थोड़ी ही देर में बाहर से बड़ा खरगोश आ गया और शेर से पूछा — “सिम्बा शेर जी क्या हुआ? क्या तुमने उस गधी को मार दिया?”

शेर बोला — “नहीं, मैं उसको नहीं मार सका। बल्कि वह मुझे ठोकर मार कर चली गयी। हालाँकि मैं अभी ज़्यादा ताकतवर नहीं हूँ फिर भी मैंने भी उसकी खूब धुनाई की। ”

बड़ा खरगोश बोला — “कोई बात नहीं। इस बात के लिये तुम अपने आपको दोष मत दो। मैं फिर देखूँगा। ”

फिर खरगोश काफी दिनों तक इन्तजार करता रहा जब तक कि शेर और गधी दोनों ही ठीक नहीं हो गये।

एक दिन खरगोश ने फिर पूछा — “क्या कहते हो सिम्बा शेर? अब ले आऊँ उस गधी को?”

शेर बोला — “हाँ अब ले आओ तुम उसको। अब की बार मैं उसको फाड़ कर रख दूँगा। ”

सुन कर खरगोश फिर जंगल की तरफ चला गया।

गधी ने खरगोश को अपने घर में बुलाया और उससे जंगल की खबर पूछी। खरगोश बोला — “तुम्हारे प्रेमी ने तुमको फिर बुलाया है, चलो। ”

पूँडा बोली — “उस दिन तुम मुझे उसके पास ले गये थे न। उसने मुझे बहुत खरोंचा। अब तो मुझे उसके पास जाते में भी डर लगता है। ”

खरगोश बोला — “श श श। वह तो उसके तुमको सहलाने का एक ढंग था। वह तो तुमको बहुत प्यार करता है। ”

गधी बोली — “अच्छा? तो चलो मैं फिर चल कर देखती हूँ। ”

सो वे दोनों फिर शेर के पास चले। जैसे ही शेर ने उनको आते देखा तो वह गधी के ऊपर उछला और अब की बार उसने उस गधी के दो टुकड़े कर दिये।

फिर शेर ने खरगोश से कहा — “यह माँस ले जाओ और इसे भून कर ले आओ। और देखो, मुझे तो केवल इसका कलेजा और कान चाहिये। ”

खरगोश बोला “ठीक है” और गधी को ले कर चला गया।

उसने माँस को एक ऐसी जगह ले जा कर भूना जहाँ शेर उसको देख नहीं सकता था।

उसने गधी का कलेजा और कान निकाल कर एक तरफ रख दिये। बचे हुए माँस में से उसने पेट भर कर माँस खाया और फिर उसमें से भी जो बचा वह उठा कर रख दिया। इतने में ही शेर आ गया और उसने गधी का कलेजा और कान माँगे।

खरगोश बोला — “कलेजा और कान? वे कहाँ हैं?”

शेर गुर्राया — “क्या मतलब?”

खरगोश हँसा और बोला — “मैंने तुम्हें बताया तो था कि वह धोबी की गधी थी। ”

शेर बोला — “तो इससे क्या होता है। क्या धोबी की गधी के कलेजा और कान नहीं होते?”

खरगोश अपने सिर पर हाथ मार कर बोला — “तुम इतने बड़े हो गये सिम्बा और तुमको अभी तक यह पता नहीं चला कि अगर इसके कलेजा और कान होते तो क्या यह दोबारा तुम्हारे पास आती?”

यह तो शेर ने कभी सोचा ही नहीं था। शेर को खरगोश पर विश्वास हो गया कि इस धोबी की गधी के कलेजा और कान तो थे ही नहीं।

सो कीमा बन्दर ने शार्क से कहा — “क्या तुम मुझे धोबी की गधी समझते हो? जाओ जाओ और अपने घर चले जाओ। अब तुम मुझे कभी नहीं पा सकते और हमारी तुम्हारी दोस्ती भी खत्म। ”

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[1] Two books – “Ethiopia Ki Lok Kathayen-1” and “Ethiopia Ki Lok Kathayen-2” have been published by Prabhat Prakashan, India, 2017.

[2] These stories have been taken from the book : “Zanzibar Tales: told by natives of the East coast of Africa” written by various authors in Swahili and translated by George W Bateman in English. Chicago, AC McClurg. 1901. All the 10 tales are given here. Since this book is old, it is widely available freely on Internet but the text is in English. Here these stories are given in Hindi. One of the sites to download this book in English is http://www.forgottenbooks.com/books/Zanzibar_Tales_Told_By_Natives_of_the_East_Coast_of_Africa_1000655761

[3] The Monkey, the Shark and the Washerman’s Donkey – a folktale from Zanzibar, Eastern Africa.

[Surprisingly this story has been told and heard in several other countries too, India, Ethiopia etc.]

[4] Keema Monkey

[5] Mkooyoo tree

[6] Poonda the she donkey

[7] Soongooraa hare – in Eastern and Southern African countries hare’s name is Soongooraa. Poondaa is the she-donkey. Hare is like a rabbit but is bigger than the rabbit. See its picture above.

[8] Simba lion – in Eastern and Southern African countries lion’s name is Simba

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं के संकलन में से सैकड़ों लोककथाओं के पठन-पाठन का आनंद आप यहाँ रचनाकार के लोककथा खंड में जाकर उठा सकते हैं.

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सुषमा गुप्ता का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में सन् 1943 में हुआ था। इन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र में ऐम ए किया और फिर मेरठ विश्वविद्यालय से बी ऐड किया। 1976 में ये नाइजीरिया चली गयीं। वहां इन्होंने यूनिवर्सिटी औफ़ इबादान से लाइब्रेरी साइन्स में ऐम ऐल ऐस किया और एक थियोलोजीकल कौलिज में 10 वर्षों तक लाइब्रेरियन का कार्य किया।

वहां से फिर ये इथियोपिया चली गयीं और वहां एडिस अबाबा यूनिवर्सिटी के इन्स्टीट्यूट औफ़ इथियोपियन स्टडीज़ की लाइब्रेरी में 3 साल कार्य किया। तत्पश्चात इनको दक्षिणी अफ्रीका के एक देश़ लिसोठो के विश्वविद्यालय में इन्स्टीट्यूट औफ़ सदर्न अफ्रीकन स्टडीज़ में 1 साल कार्य करने का अवसर मिला। वहॉ से 1993 में ये यू ऐस ए आगयीं जहॉ इन्होंने फिर से मास्टर औफ़ लाइब्रेरी ऐंड इनफौर्मेशन साइन्स किया। फिर 4 साल ओटोमोटिव इन्डस्ट्री एक्शन ग्रुप के पुस्तकालय में कार्य किया।

1998 में इन्होंने सेवा निवृत्ति ले ली और अपनी एक वेब साइट बनायी- www.sushmajee.com <http://www.sushmajee.com>। तब से ये उसी वेब साइट पर काम कर रहीं हैं। उस वेब साइट में हिन्दू धर्म के साथ साथ बच्चों के लिये भी काफी सामग्री है।

भिन्न भिन्न देशों में रहने से इनको अपने कार्यकाल में वहॉ की बहुत सारी लोक कथाओं को जानने का अवसर मिला- कुछ पढ़ने से, कुछ लोगों से सुनने से और कुछ ऐसे साधनों से जो केवल इन्हीं को उपलब्ध थे। उन सबको देखकर इनको ऐसा लगा कि ये लोक कथाएँ हिन्दी जानने वाले बच्चों और हिन्दी में रिसर्च करने वालों को तो कभी उपलब्ध ही नहीं हो पायेंगी- हिन्दी की तो बात ही अलग है अंग्रेजी में भी नहीं मिल पायेंगीं.

इसलिये इन्होंने न्यूनतम हिन्दी पढ़ने वालों को ध्यान में रखते हुए उन लोक कथाओं को हिन्दी में लिखना प्रारम्भ किया। इन लोक कथाओं में अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिका के देशों की लोक कथाओं पर अधिक ध्यान दिया गया है पर उत्तरी अमेरिका और यूरोप के देशों की भी कुछ लोक कथाएँ सम्मिलित कर ली गयी हैं।

अभी तक 1200 से अधिक लोक कथाएँ हिन्दी में लिखी जा चुकी है। इनको "देश विदेश की लोक कथाएँ" क्रम में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि इस प्रकाशन के माध्यम से हम इन लोक कथाओं को जन जन तक पहुंचा सकेंगे.

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(कहानियाँ क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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