व्यंग्य // दुःख दर्द की दास्ताँ // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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दुःख दर्द की दास्ताँ

डा. सुरेन्द्र वर्मा

सुख को भला कौन पूछता है। वह तो चाट के पत्ते की तरह है, खाया और फेंका। लेकिन दुःख-दर्द भला कोई इस तरह फेंकता है ? बड़े संभाल के रखते हैं हम उसे। वर्तमान में जो है, उसे तो भुगतते ही हैः, जो भुगत चुके हैं उसे भी याद करते रहते हैं, मौक़ा मिलते ही दोहराते रहते हैं कि कहीं भूल न जाएं।

दुःख चीज़ ही ऐसी है। दार्शनिकों के चिंतन में वह पसरा पडा है। कवियों की कविताओं में वह बिखरा हुआ है। राजनेताओं के जुबान पर वह बड़े ठाट से विराजमान है। समाजसेवकों के जुमलों में उसने पैठ बना ली है। सब के सब दुःख-दर्द की ही बात करते हैं। हर जगह व्याप्त दुःख की मानों जुगाली करते हैं। इधर यह जुगाली कुछ ज्यादह ही बढ़ गई है। राजनीति में तो दुःख-दर्द ने मानों कब्ज़ा ही कर लिया है। कोई ऐसी पार्टी नहीं है जो दुःख-दर्द से कराह न रही हो। ख़ासतौर पर किसानों का दुख-दर्द, बेरोजगारों का, गरीबों का दुःख-दर्द, दलितों, वंचितों का दुःख-दर्द, स्त्रियों का, आदिवासियों का दुःख-दर्द, संक्षेप में जनता का दुःख-दर्द - हर दल के दुःख-दर्द की कहानी है। इसे बड़े भावुक होकर बताया जाता है। संवेदनाएं प्रकट की जाती हैं। निवारण की प्रस्तावित कोशिशों और उपायों की चर्चा की जाती है। आरोप प्रत्यारोप लगाए जाते हैं। क्यों है और क्यों नहीं गया यह अभी तक। जुमलेबाज़ी शबाब पर है। दुःख-दर्द पर इतनी चिंता व्यक्त की जा रही है, और जनता है कि फिर भी नायिका की तरह रूठी हुई है।

सामान्यत: दुःख और दर्द एक दूसरे में व्याप्त ‘जुड़वां भाई’ हैं। ठीक इस तरह जैसे शरीर और मन हैं, देह और आत्मा है। हम मन को शरीर से और शरीर को आत्मा से अलग नहीं कर सकते, उसी तरह दुःख और दर्द को भी अलग नहीं कर सकते। दर्द शरीर है तो दुःख आत्मा है। दर्द शरीर में होता है, दुःख मन में विराजता है। दुःख-दर्द एक मनो-दैहिक अवधारणा है। दुःख दर्द जुड़वां हैं, माना। लेकिन उन्हें अलग अलग भी देखा जा सकता है। तमाम ऐसे लोग हैं जो शारीरिक रूप से स्वस्थ होने के बावजूद मानसिक रूप से दुखी हैं। दुख पालने में, दुःख मनाने में उन्हें मज़ा आता है। इसके विपरीत ऐसे लोग भी मिल जाएंगे जिनकी टांग टूट गई है, ल्रेकिन पहाड़ की चोटियों पर चढ़ने का माद्दा रखते हैं, टूटी टांग का दुःख नहीं मनाते।

दार्शनिक चिंतन में तो दुःख का बोलबाला है। सुखवादी दार्शनिकों को तो कोई पूछता ही नहीं। उनकी तो मज़ाक उडाई जाती है। गंभीरता से सोचने का विषय तो दुःख दर्द ही है। एक बूढ़े का, एक बीमार का दुःख-दर्द देखकर और किसी एक मौत को देखकर गौतम बुद्ध इतने भावुक हो गए कि राजसी जीवन और छोटे बच्चे के साथ सोई अपनी पत्नी को छोड़ कर जीवन के इन अनिवार्य दुखों के निवारण मार्ग की तलाश में वे घर छोड़ कर चले गए। उनकी अनुपस्थिति का दुख-दर्द बेचारी पत्नी ने आजीवन सहा। और किसी का हो न हो, बुद्ध की पत्नी का दुःख पहला “आर्य- सत्य” हो गया। सांख्य दर्शन में तो दुख का पूरा एक प्ररूप-शास्त्र ही विकसित कर डाला – आध्यात्मिक दुःख, आधिभौतिक दुःख और आधिदैविक दुःख। अरे भले मानुस, सुख भी तो आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक हो सकता है। सुख के इन रूपों पर कभी किसी चिन्तक की निगाह पडी ही नहीं। कैसे पड़ती ? दार्शनिक चिंतन को तो दुख की चिंता में ही घटित होना चाहिए ना !

साहित्य में तो और भी बुरा हाल है। नाटक, उपन्यास और कहानियां बेशक सुखान्त भी लिखे जाते हैं। लेकिन जो बात दुखांत साहित्य की है, उसका कहना ही क्या ? पड़ने के बाद अंत में आंसू तो ज़रूर ही बहना चाहिए। तभी साहित्य की गरिमा है, उपलब्धि है। इससे भावनाओं का रेचन होता है, रेचन। जानते हैं आप रेचन का अर्थ – यह दुःख से सुख की अनुभूति है, लाजवाब अनुभूति है। उर्दू-शायरी में तो दुख दर्द भरा पडा है, मुहब्बत का दर्द। होती है मुहब्बत, तो दर्द; टूटती है मुहब्बत, तो दर्द। दर्दे दिल दर्दे जिगर। सहते रहते हैं, सहने में ही मज़ा है। मुहब्बत का मारा, अपने दिल और जिगर का दर्द लेकर किसी हकीम के पास नहीं फटकता। दर्द ही में मुब्तला रहता है –मुब्तला-ए-गम।

लोग दुःख-दर्द पालते हैं, सहते हैं, उठाते हैं, बताते हैं, गिनाते हैं, बढ़ाते हैं। भाषा भी तो हमारी कमाल की है। दुःख दर्द का साथ देने के लिए सदैव तत्पर रहती है। कहीं राहत नहीं है।

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---सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड, इलाहाबाद -२११००१

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1 टिप्पणी "व्यंग्य // दुःख दर्द की दास्ताँ // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा"

  1. दुख का दर्द और उसका गम शायरों के लिए अतिव प्रेरक हैं। कहते हैं न वो है हमारे सब से मधुर गीत जो है सब से दर्दीले। सुना है लोग दीवाने हो जाते हैं। अपने जीवन तक की परवा नहीं करते। कुल मिला के जीवन में दुख दर्द की मात्रा इतनी होती है कि लोग भूल जाते हैं। विषय और आलेख अनूठे नहीं होते हुए भी अपने आप में कोई अनूठापन लिए हुए हैं।दुख दर्द का रिश्ता है जीवन से और जीवन बनता है रिश्ते से।

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