‘वन्देमातरम्’ – गीत का शीर्षक ही नहीं, एक मन्त्र है // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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‘वन्देमातरम्’ – गीत का शीर्षक ही नहीं, एक मन्त्र है

डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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बंकिमचंद्र चटोपाध्याय द्वारा रचित “वन्देमातरम्” भारत का राष्ट्र-गीत है। यह राष्ट्र-गान होते होते रह गया, लेकिन इसे नज़रंदाज़ नहीं किया जा सका और इसे राष्ट्र-गीत का दर्जा दे दिया गया। जन-गन-गण राष्ट्रगान हो गया। राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत यह गीत साहित्यिक दृष्टि से भी भारत का अद्वितीय गीत है। यह गीत संस्कृत बांग्ला मिश्रित भाषा में रचित है। सन २००३ में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस द्वारा आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय सर्वेक्षण में उस समय के सबसे प्रसिद्ध दुनिया के लगभग ७००० गीतों में से इसे न केवल पहले दस गीतों में स्थान मिला बल्कि दस में से इसे दूसरे स्थान पर रखा गया था।

बंकिम चन्द्र चटर्जी ने ‘वन्दे मातरम’ शीर्षक से यह एक स्वतन्त्र गीत के रूप में लिखा था। ओर मूल रूप से इसके दो ही पद रचे गए थे जो संस्कृत में थे। इन दोनों पदों में केवल मातृभूमि की वन्दना है। कवि ने यह गीत सन अठारह सौ के अस्सी के दशक में लिखा था जब ब्रिटिश शासकों ने सरकारी समारोहों में ‘गोड सेव द किंग’ गीत गाया जाना अनिवार्य कर दिया था। इस आदेश से बंकिम चन्द्र को, जो उस समय डिप्टी कलेक्टर के एक सरकारी पद पर थे, बहुत आघात लगा अत: उन्होंने ‘गोद सेव द किंग’ के विकल्प के रूप में सभी समारोहों में गाने के लिए ‘वंदेमातरम्’ गीत की रचना की।

इस गीत की रचना के लगभग छ: वर्ष बाद बंकिम चन्द्र ने इसे अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंद मठ’ में अन्तर्निहित कर दिया और इसमें कई और पद बांग्ला भाषा के जोड़ दिए। वह गीत जो बांगला भाषा में आनन्द मठ में सम्मिलित हुआ है, हम उसकी बात नहीं कर रहे हैं। यह मूल गीत का परिवर्तित / परिवर्धित संस्करण है। मूल गीत से आनंद मठ के गीत को जोड़ना दुर्भाग्यपूर्ण है। इससे मूल गीत की स्वतन्त्र सत्ता पर आघात पहुंचा है। एक स्वतन्त्र गीत के रूप में इस पर प्रश्न चिह्न सा लग गया है। उपन्यास का गीत भावानंद नामक एक संन्यासी द्वारा गाया गया है और यह केवल उपन्यास की मांग को पूरा करता है।

मूल गीत के दोनों पद संस्कृत भाषा के हैं पर इन्हें मूलत: बांगला लिपि में लिखा गया था। भारत की स्वतंत्रता के सन्दर्भ में इसी गीत और उसके शीर्षक, वन्देमातरम, का बड़ा महत्व है। दिसंबर १९०५ में कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में इसी गीत को राष्ट्रीय दर्जा प्रदान किया गया था। बंग-भंग आन्दोलन के दौरान ‘वन्दे मातरम्’ राष्ट्रीय नारा बन गया था। १९२३ कांग्रेस अधिवेशन में वन्दे मातरम के विरोध में जो स्वर उठे उसका कारण यही था की इसे आनंद-मठ उपन्यास, जो किसी कदर मुस्लिम विरोधी था, के साथ जोड़ कर देखा गया। बाद में १९३७ के कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में, रवीन्द्रनाथ ठाकुर के मार्ग दर्शन में यह स्पष्ट कर दिया गया कि इस गीत के पहले दो पद जो मूल गीत में हैं, वे ही प्रासंगिक हैं।

गांधी जी इस गीत से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने लिखा है, आज लाखों लोग एक साथ एकत्रित होकर वन्दे मातरम् गाते हैं। इसने हमारे राष्ट्रीय गीत का दर्जा हासिल कर लिया है यह एक पवित्र, भक्ति परक और भावनात्मक गीत है। इसमे मातृभूमि के लिए जो सार्थक विशेषण प्रयुक्त किए गए हैं वे एकदम अनुकूल है, इनका कोई सानी नहीं है

१४ अगस्त १९४७ को संविधान सभा की पहली बैठक का प्रारम्भ ‘वन्दे मातरम्’ के साथ ही हुई था। समापन जन-मन-गण के साथ संपन्न हुआ था। १९५० में वन्दे मातरम् राष्ट्रीय गीत और जन-मन-गण राष्ट्रीय गान बना।

वन्दे मातरम् गीत सर्व प्रथम बांग्ला लिपि में लिखा गया था, और यह स्वाभाविक था क्योंकि इसके रचयिता बंकिमचंद्र जी स्वयम एक बंगाली कवि थे।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के आदर्श को छोड़ कर, वंदेमारतम से ज्यादह प्रेरक शायद ही कुछ और रहा हो। “वन्देमातरम” एक गीत या गीत का शीर्षक न रहकर एक मन्त्र बन गया था। इस मन्त्र ने राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक पक्ष और प्रत्येक भौगोलिक स्थल को स्पर्श किया है। इतना ही नहीं, सच पूछा जाए तो इस मन्त्र में केवल बंगाल या भारत के ही लिए नहीं बल्कि जैसा की रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा है, विश्व माता की वन्दना है| पृथ्वी की मातृरूप में कल्पना हमारे संस्कृत साहित्य में मिलती है। अथर्ववेद का ‘माता भूमि: पुत्रोहंपृथिव्या” मातृ वन्दना ही तो है। भारत में इसी मन्त्र को लेकर इसी के नाम पर अनेक क्रांतिकारी संगठन बने; इसी का जाप करते हुए स्वतंत्रता सेनानी तिरंगे झंडे को लेकर आगे बढ़ाते गए और इसी का उच्चारण करते हुए वे जेल गए और फांसी के समय भी यही मन्त्र उनकी ज़बान पर रहा। मदन लाल धींगरा, फुल चाकी, खुदीराम बोस, रामप्रसाद बिस्मिल और अन्य बहुत से क्रान्तिकारियों ने ‘वन्देमातरम्’ कह कर फांसी के फंदे को चूमा। सुभाष चन्द्र बोस की आज़ाद हिन्द फ़ौज ने भी इस गीत को अंगीकार किया था।

यह बड़े गर्व की बात है कि इस वर्ष (२०१८) के गणतंत्र दिवस पर क्रांतिकारियों की धरती कानपुर के ५०००० से अधिक देश प्रेमियों ने ऐतिहासिक ग्रीन-पार्क स्टेडियम में एकत्रित होकर बड़ी शिद्दत से, सामूहिक रूप से, वन्देमातरम गीत गाया और अपनी राष्ट्रीय भावनाओं और संस्कारों को प्रदर्शित किया। लगा की सारा देश माँ भारती को नमन कर रहा है।

‘वन्दे मातरम’ गीत के कई भारतीय भाषाओं में - मराठी, तमिल, तेलगू, कन्नड़ आदि - अनुवाद हुए हैं। मूल गीत जो संस्कृत भाषा में लिखा गया और बंगालालिपि में प्रकाशित हुआ उसके हिन्दी में अनुवाद की कभी आवश्यकता ही नहीं पडी। उसे जब देवनागरी लिपि में लिखा जाता है तो वह हिन्दी का एक गीत ही प्रतीत होता है। इसका अंग्रेज़ी में सुन्दर अनुवाद डा. नरेशचन्द्र सेनगुप्त ने सन १९०६ में ही “ Abbey of Bliss शीर्षक से कर दिया था बाद में श्रीअरविन्द ने भी इसका अंग्रेज़ी अनुवाद किया। हाल ही में इसका एक उर्दू अनुवाद भी प्रकाशित हुआ है। यह अनुवाद आरिफ मोहम्मद खान ने शाह बानो केस के बाद लिखा था। अनुवाद इस प्रकार है –

तसलीमात, माँ तसलीमात

तू भरी है मीठे पानी से - फल फूलों की शादाबी से

दक्खिन की ठंडी हवाओं से - फसलों की सुहानी फिजाओं से

तसलीमात, माँ तसलीमात

तेरी रातें रोशन चाँद से - तेरी रौनक सब्ज़-ए-फाम से

तेरी प्यार भरी मुस्कान है - तेरी मीठी बहुत जुबान है

तेरी बाहों में मेरी राहत है – तेरे कदमों में मेरी जन्नत है

तस्लीमात, माँ तस्लीमात

वन्दे मातरम् की वह धुन जिसमें इसे आज सर्वाधिक गाया जाता है रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने तैयार की थी। इस गीत को भारत के अनेक प्रतिष्ठित गायकों ने गाया है, जिनमें विष्णु दिगंबर पलुस्कर का नाम भी सम्मिलित है। हिन्दी सिनेमा में भी यह गीत प्रतिष्ठित गायक/गायिकाओं द्वारा खूब गाया गया है। धुनें बदलती रहीं हैं। लेकिन एक गायक का नाम जो सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है, वह है ए आर रहमान का जिसने इस गीत पर पूरा एक एल्बम ही तैयार किया है – माँ तुझे सलाम !

‘वन्देमातरम्’ - यह शब्द एक मन्त्र है, यह शक्ति का ऐसा स्रोत है जिसने जनता को न केवल प्रेरित किया है बल्कि जो हमारी देशज स्मृति में भी रच-बस गया है।

- डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड , इलाहाबाद -२११००१

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गीत

वन्दे मातरम्

सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम – सस्य श्यामलां मातरम्

शुभ्र ज्योत्सनाम पुलकित यामिनीम

फुल्ल कुसुमित द्रुमदल शोभनीम

सुहासिनी सुमधुर भाषिणीम - सुखदां वरदां मातरम्

सप्त कोटि कंठ कलकल निनाद कराले

द्विसप्त कोटि भुजैर्व्रत खरकरवाले

बहुबल धारणीम नमामि तारणीम - रिपुदलवारणीम मातरम्

वन्दे मातरम्।

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3 टिप्पणियाँ "‘वन्देमातरम्’ – गीत का शीर्षक ही नहीं, एक मन्त्र है // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा"

  1. बहुत ही बढ़िया आलेख।वर्तमान में ही यह ऐतिहासिक आलेख बन चुका है। इस लेख में मातृवंदना है और नारी सशक्तिकरण का नारा भी है, उत्साह भी है, उमंग भी है। नमन, वंदन।

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  2. बहुत ही बढ़िया आलेख।वर्तमान में ही यह ऐतिहासिक आलेख बन चुका है। इस लेख में मातृवंदना है और नारी सशक्तिकरण का नारा भी है, उत्साह भी है, उमंग भी है। नमन, वंदन।

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  3. आशा चौधरी9:33 pm

    बहुत सटीक और प्रेरणा दायक जानकारी दी है आपने । बधाई और धन्यवाद आदरणीय सर।

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रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

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