लघुकथा // डाँगर // ज्योत्सना सिंह

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लघुकथा

डाँगर

ज्योत्सना सिंह

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शम्भु गोड़ा की साफ़-सफ़ाई कर जानवरों का चारा-पानी करने लगा।

तसला भर-भर सभी जानवरों को देने के बाद बचा खुचा चारा लाल वाली गाय के पास ले चला और दालान में बैठे बापू से बोला।

“बापू! ई ललकई गैया अब डाँगर हो गई है। दूध तो सात कोस लौ नाही दिखाई पर रहा है। कहो तो इका हाँक देई?”

बापू कोई जवाब न दे अपनी सेई-पाली गाय को करुण नेत्रों से निरखने लगे। बापू की चुप्पी को भाँप शम्भु बोला।


“अरे! बापू अब कसाई न काटे पायी। बड़ी सख़्ती है। ऊ देखो रामदीन की ग़ैया को।

नगर-निगम वाले कान में ये बिल्ला पहना देते हैं। जो इनकी सुरक्षा के लिये होवे है।”

समझाते हुए शम्भु ने पिता की सहमति चाही।

जब रोटी खाने बाप-बेटा बैठे तो बापू दूध की कटोरी थाली से खिसका कर कहा।


“बहु! दूध अपनी माई को दे देना।”

और फिर घरवाली को आवाज़ दे बोले।

“बुढ़िया! दूध पी लियो ताकी डाँगर न होये पायो और हाँ,अपने कान के बूँदे भी सम्भाले रहियो। का पता किसका बुलावा पहले आ जाए और मेरे पीछे ये लोग तुझे डाँगर समझ हाँक दें।”

बापू की चुप्पी का जवाब शम्भु को मिल चुका था। और वह ललकई ग़ैया को अगराशन देने उसके खूँटे तक जा पहुँचा।


ज्योत्सना सिंह

गोमती नगर

लखनऊ

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1 टिप्पणी "लघुकथा // डाँगर // ज्योत्सना सिंह"

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन प्लास्टिक मुक्त समाज के संकल्प संग ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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