ऐनगोम्बा और उसकी टोकरी // अफ्रीका की लोक कथाएँ // सुषमा गुप्ता

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देश विदेश की लोक कथाएँ —


अफ्रीका की लोक कथाएँ–1

अफ्रीका, अंगोला, कैमेरून, मध्य अफ्रीका, कौंगो, मोरक्को

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संकलनकर्ता

सुषमा गुप्ता


8 ऐनगोम्बा और उसकी टोकरी[1]

यह लोक कथा अफ्रीका महाद्वीप के कौंगो देश की है।

एक बार की बात है कि एक दिन बहुत सुबह सुबह दिन की रोशनी फूटते ही चार छोटी लड़कियों ने एक बड़ी नदी में मछली पकड़ने जाने का प्रोग्राम बनाया।

उन चार लड़कियों में एक एनगोम्बा थी – गरीब, बीमार, घावों से भरी हुई। वह गाँव की सबसे ज़्यादा गरीब लड़की थी।

सो चारों लड़कियाँ मछली पकड़ने चलीं। पर कुछ दूर चलने के बाद ही दूसरी तीन लड़कियों ने ऐनगोम्बा से कहा — “तुम अपने घर जाओ। तुम हमारे जैसी नहीं हो। ”

एनगोम्बा तुरन्त बोली — “नहीं मैं वापस नहीं जाऊँगी। मैं भी अपनी माँ के लिये मछली पकड़ना चाहती हूँ। ”

बाकी तीनों लड़कियाँ एक साथ बोलीं — “तुम? तुम क्या मछली पकड़ोगी? तुम तो बीमार हो। जाओ जाओ, तुम वापस घर चली जाओ। ”

यह सुन कर ऐनगोम्बा की आँखों में आँसू आ गये पर वह चुप रही। उसने दूसरी लड़कियों को आगे आगे जाने दिया और वह झील के बराबर के रास्ते से नदी की तरफ चल दी।

वह अपना मछली पकड़ने का प्लान छोड़ने वाली नहीं थी। वह चलती रही चलती रही जब तक कि वह बड़ी नदी के किनारे तक नहीं पहुँच गयी।

वहाँ जा कर उसने एक मछली पकड़ने वाला डंडा गाड़ा और मछली पकड़ना शुरू किया। उसने गाया —

मैं एक गरीब लड़की हूँ

जैसे ही उसने यह गाया और अपना मछली पकड़ने वाला काँटा पानी में फेंका तो तुरन्त ही एक मछली ने उसमें अपना मुँह मारा। उसने उस मछली को पकड़ कर अपनी टोकरी में रख लिया और फिर गाया —

मेरी कोई परवाह नहीं करता

यह सुन कर एक दूसरी मछली ने काँटे में अपना मुँह मारा तो उसने उसको भी अपनी टोकरी में रख लिया। उसने फिर गाया —

दूसरी लड़कियों ने कहा कि “घर जाओ”

एक और मछली ने काँटे में अपना मुँह मारा और वह मछली भी ऐनगोम्बा की टोकरी में गयी। उसने फिर गाया —

मैं बिल्कुल अकेली हूँ

और फिर एक और मछली ऐनगोम्बा की टोकरी में गयी।

जब वह इस तरह से मछलियाँ पकड़ रही थी कि तभी एक डाकू वहाँ से गुजर रहा था।

उसने उस लड़की का गीत सुना और छिप कर उसे देखने लगा कि उसने कितनी मछलियाँ पकड़ी हैं। फिर वह अपनी छिपने की जगह से बाहर निकल आया और उसके पास गया।

उसने उससे पूछा — “तुम यहाँ पर अकेली क्या कर रही हो?”

ऐनगोम्बा बोली — “क्या आपको दिखायी नहीं देता कि मैं यहाँ मछलियाँ पकड़ रही हूँ? पर आप कौन हैं?”

डाकू ने जवाब दिया — “उफ, मैं भी क्या चीज़ हूँ? मैं एक डाकू हूँ और हर आदमी मुझसे डरता है। ”

“ओह डाकू जी मुझे माफ करना। मैं आपसे प्रार्थना करती हूँ कि आप मुझे मारना नहीं। मैं बीमार जरूर हूँ पर मैं मछली पकड़ने में बहुत अच्छी हूँ। देखिये ज़रा मैं कैसे मछली पकड़ती हूँ। ”

कह कर उसने अपना काँटा पानी में फेंका और फिर से गाना शुरू किया —

यह आदमी मुझे मारना चाहता है

एक मछली ने उसके काँटे में अपना मुँह मारा और ऐनगोम्बा ने उसे तुरन्त अपनी टोकरी में रख लिया। उसने फिर गाया —

मेरी कोई परवाह नहीं करता

एक और मछली उसकी टोकरी में गयी। उसने फिर गाया —

मैं रोती हूँ और उससे दया की भीख माँगती हूँ

एक और मछली उसकी टोकरी में गयी। उसने फिर गाया

वह कहता है कि तुम्हारे ऊपर कोई दया नहीं

और एक और मछली उसकी टोकरी में गयी।

बच्ची की मछली पकड़ने की यह असाधारण योग्यता देख कर डाकू उससे बोला — “तुम डरो नहीं। अब तुम मेरे साथ आ रही हो। ”

पर ऐनगोम्बा बोली — “नहीं, मैं आपके साथ नहीं आ सकती। मुझे ये मछलियाँ अपनी माँ के पास ले जानी हैं। ”

डाकू बोला — “या तो तुम मेरे साथ चलो नहीं तो मैं तुमको मार डालूँगा। ”

सो बच्ची ने फिर से अपना मछली पकड़ने वाला काँटा पानी में डाला और गाया —

यह डाकू मुझे मार डालने की धमकी देता है

एक मछली ने फिर से काँटे में अपना मुँह मारा और वह भी ऐनगोम्बा की टोकरी में गयी। उसने फिर गाया —

मेरी कोई परवाह नहीं करता

एक और मछली ऐनगोम्बा की टोकरी में गयी। उसने फिर गाया —

पर ये मछली मेरी माँ के लिये छोड़ दो

और फिर एक और मछली ऐनगोम्बा की टोकरी में गयी। उसने फिर गाया —

मैं तुम्हारे लिये कुछ और मछली पकड़ दूँगी तुम देखना

और फिर एक और मछली ऐनगोम्बा की टोकरी में गयी।

डाकू ने एक बार फिर कुछ देर तक सोचा और बोला — “ठीक है, हम ये मछलियाँ तुम्हारी माँ के पास ले चलेंगे पर उसके बाद तुम मेरे साथ चलोगी और मेरे साथ रहोगी। तुम वहाँ मेरे पास बड़ी इज़्ज़त के साथ रहोगी और फिर जब तुम बड़ी हो जाओगी तब मैं तुमसे शादी कर लूँगा। ”

बच्ची को पता नहीं था कि वह क्या कहे। पर उसको उस समय लगा कि उसकी ज़िन्दगी डाकू का कहना मानने में ही सुरक्षित है सो उसने वही किया जो वह डाकू चाहता था।

उन्होंने वे मछलियाँ बच्ची की माँ को दे दीं और वे दोनों साथ साथ डाकू के गाँव चले गये।

बाद में ऐनगोम्बा की वह भयानक बीमारी ठीक हो गयी। वह उस डाकू के घर में सुख में बड़ी होने लगी। उसको वहाँ वे सब सुख मिले जिनका उस डाकू ने उससे वायदा किया था। समय निकलता गया। अब वह इतनी बड़ी हो गयी थी कि अब वह शादी के लायक हो गयी थी।

पर ऐनगोम्बा का उस डाकू से शादी करने का कोई इरादा नहीं था इसलिये उसने अपने आपको उससे आजाद करने का एक प्लान बनाया।

उसने अपने कुछ वफादार नौकरों को इकठ्ठा किया और उनको जंगल में रोज सबसे ज़्यादा खुरदरी पाम की पत्तियाँ इकठ्ठी करने के लिये भेजा। उसने उन पत्तियों को गाँव से दूर एक साफ जगह पर सुखाया।

जब उसको लगा कि उसके पास वे पत्तियाँ काफी हो गयीं तो उसने उसकी वैसी ही एक बहुत बड़ी टोकरी बनायी जैसी कि उसके पास मछली पकड़ने वाली थी।

दिन बीतते गये। डाकू को कुछ भी शक नहीं हुआ हालाँकि उसको कई बार पाम के रस की खुशबू हवा में तैरती लगी। पर उसकी यह समझ में नहीं आया कि वह खुशबू आ कहाँ से रही थी।

वह अपनी डाकू की ज़िन्दगी जीता रहा। लोगों को लूटता रहा, उनके ऊपर हमले करता रहा और उनको मारता रहा। पर साथ में वह अपनी शादी के दिन के बारे में भी बराबर सोचता रहा।

आखिर ऐनगोम्बा की टोकरी बन कर तैयार हो गयी। अब वह समय आ गया था जब ऐनगोम्बा को अपना प्लान शुरू करना था।

एक दिन सुबह को जब वह डाकू बाहर जा रहा था तो जाने से पहले वह उससे बोला — “तुम तैयार हो जाओ। हम लोग आज दोपहर को शादी कर रहे हैं। ”

सो ऐनगोम्बा और उसके नौकर उस बड़ी टोकरी को एक पहाड़ की चोटी पर ले गये और वहाँ ले जा कर उसको उस चोटी के किनारे पर रख दिया।

फिर वे सब उस टोकरी में कूद कर बैठ गये और उसको हिलाने लगे जब तक वह इतनी खराब तरीके से नहीं रखी गयी कि वह एक ही झटके से नीचे खाई में गिर पड़ती।

उस टोकरी को इस तरह से रख कर उन्होंने उसको खाई में गिराया पर वह खाई में नहीं गिरी बल्कि हवा में रुक गयी जैसे हवा के छिपे हुए हाथों ने उसको रोक लिया हो।

और ऐनगोम्बा ने गाया —

ओ टोकरी घर चल, जैसा मैं कहती हूँ

यह सुन कर वह टोकरी ऐनगेम्बा की माँ के घर की तरफ चल दी। उसने फिर गाया —

जल्दी उड़ और मुझे यहाँ से दूर ले चल

और टोकरी जल्दी जल्दी उड़ चली। उसने फिर गाया —

बहुत दूर, जितनी तेज़ तू उड़ सकती है

और वह टोकरी बहुत तेज़ उड़ चली। उसने फिर गाया —

जल्दी, जल्दी, उस आदमी से दूर

और वह टोकरी उड़ती गयी और उड़ती गयी।

पर कुछ ऐसा हुआ कि वह टोकरी उस डाकू के सिर के ऊपर से उड़ी। वह डाकू एक पेड़ की एक शाख पर छिपा हुआ बैठा था ताकि वह किसी आने जाने वाले के ऊपर हमला कर सके।

डाकू ने ऊपर आसमान मे एक टोकरी उड़ती देखी तो उसके मुँह से निकला “ओह”।

उस टोकरी को देख कर उसने सोचा कि काश उसकी होने वाली पत्नी वहाँ उस अच्छी चीज़ को देखने के लिये होती – एक बहुत ही बड़ी टोकरी, हवा में लटकी हुई, शान्ति से जाती हुई।

उसी समय वह टोकरी थोड़ी सी नीची हुई और उसके सिर के पास से निकल गयी। उसी समय डाकू ने देखा कि उस टोकरी में तो लोग बैठे हुए थे। उसने पहचान लिया कि उन लोगों के बीच में तो उसकी होने वाली पत्नी भी बैठी थी।

यह देख कर उसको बहुत आश्चर्य हुआ। वह उसका पीछा करने के लिये एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर होता हुआ उसके पीछे पीछे चल दिया। वह जब तक चलता गया जब तक उसको दोबारा से वह टोकरी दिखायी नहीं दे गयी थी। वह ऐनगोम्बा के गाँव की तरफ जा रही थी।

इस बीच ऐनगोम्बा की टोकरी एक दो गाँव पार कर उसकी माँ के पुराने घर के सामने जा कर रुक गयी। ऐनगोम्बा तुरन्त ही टोकरी से नीचे उतरी और जा कर अपनी माँ से लिपट गयी।

उसकी माँ ने पहले तो उसको पहचाना नहीं पर फिर जब उसकी आँखों में देखा तब उसको लगा कि वह तो उसकी बीमार बेटी थी जिसको बहुत समय पहले एक डाकू अपने साथ ले गया था। वह अब कितनी बड़ी हो गयी थी और कितनी सुन्दर और तन्दुरुस्त भी।

बस तभी अपनी होने वाली पत्नी के पीछे पीछे उसके लिये चिल्लाता हुआ वह डाकू भी वहीं आ पहुँचा। वह उसको मारने की धमकी भी दे रहा था।

ऐनगोम्बा की माँ बोली — “यह सच है कि मेरी बेटी के ऊपर तुम्हारा यह बहुत बड़ा ऐहसान है कि तुमने उसको ठीक किया है। और हम भी तुमको उसके लिये बहुत बहुत धन्यवाद देते हैं पर अगर ऐनगोम्बा तुम्हारे साथ रहना नहीं चाहती तो तुम उसको जबरदस्ती अपने पास नहीं रख सकते। ”

डाकू गुस्से में भर कर बोला — “बेकार की बातें मत करो। यह लड़की मेरी है। मैने इसको ठीक किया है और यह मेरे पास ही रहने वाली है। ”

माँ ने महसूस किया कि इस जिद्दी से बात करने के लिये होशियारी से काम लेना पड़ेगा। यह ऐसे नहीं मानेगा। सो उसने ऐनगोम्बा को ले जाने के लिये उस डाकू को शाम तक इन्तजार करने के लिये कहा और कहा कि वह शाम का खाना खा कर उसको ले जा सकता था।

इस बीच उसने अपने रसोईघर में एक गड्ढा खोदा। उस गड्ढे में उसने एक बड़ा बरतन रख दिया जिसमें वह साबुन बनाया करती थी। उसको उसने उबलते पानी से भर दिया।

फिर उसने वह गड्ढा कुछ डंडियों पत्तों और एक चटाई से ढक दिया और डाकू को शाम का खाना खाने के लिये रसोईघर में बुलाया।

अब यह सोचना तो बहुत आसान है कि यह कहानी किस तरह खत्म हुई होगी। वह डाकू उस गरम पानी से भरे बरतन में गिर गया और उबल गया।

इस कहानी से यह हम सबको यह सीख मिलती है कि तुम अगर किसी का भला करते हो तो इसका यह मतलब नहीं है कि तुम उसको अपनी इच्छाओं का दास बना लो।



[1] Ngomba and Her Basket – a folktale from Bakongo Tribe, Congo, Central Africa.

Adapted from the book “African Folktales” by A Ceni. English Edition in 1998.

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं के संकलन में से सैकड़ों लोककथाओं के पठन-पाठन का आनंद आप यहाँ रचनाकार के  लोककथा खंड में जाकर उठा सकते हैं.

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